The Mysterious Bell – Chapter 477
टिंकू ने कहा, "उस्ताद, इसका मतलब कोई हमें बता रहा है कि सच कहाँ है?"
उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा। लंबा देखा।
"लड़के," उन्होंने कहा, "कोई हमें बता नहीं रहा। कोई हमसे डर रहा है, इसलिए बता रहा है। और जो डरकर बताता है, वो कभी पूरा सच नहीं बताता।"
मैंने उस्ताद को देखा। उनके हाथ अभी भी मेज़ के किनारे पर रखे थे और उनके हाथ की नसें उभरी हुई थीं।
"उस्ताद," मैंने धीरे से कहा, "आप उस आदमी को जानते हैं।"
उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।
"आप जानते हैं, है ना?" मैंने फिर कहा। "जिसका ये अँगूठा है। जो पचास साल पहले आपकी दुकान पर श्याही की डिब्बी लेकर आया था।"
उस्ताद ने आँखें बंद कर लीं। एक पल के लिए।
"मैं उसे जानता हूँ," उन्होंने कहा। "और मैं उसे पचास साल से नहीं जानता। दोनों बातें सच हैं।"
मीरा ने काग़ज़ नीचे रखा।
"उस्ताद, ये वक्त सुलझाने का नहीं है। कल सुबह दस बजे पीपल के नीचे सलीम बक्श रजिस्टर लाएगा और उसमें सात नामों के साथ एक मजबूरी का अँगूठा है। अगर ये काग़ज़ और वो अँगूठा एक ही आदमी का है, तो हमें उसका नाम जानना होगा।"
उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा।
"तुम्हें नाम चाहिए या सच?" उन्होंने कहा।
"सच।"
"तो पहले ये सुनो — पचास साल पहले मेरे भाई इलियास ने मुझसे जो कहा था।" उन्होंने लैंप की बत्ती थोड़ी नीची की, जैसे रोशनी कम करके कमरे को छोटा कर रहे हों। "उसने कहा था — भाई, इस शहर में दो तरह के आदमी होते हैं। एक जो काग़ज़ पढ़कर अँगूठा लगाता है। और दूसरा जो काग़ज़ पढ़े बिना अँगूठा लगाता है। पहला कभी नहीं टूटता, क्योंकि वो जानता है कि वो क्या कर रहा है। दूसरा हमेशा टूटता है, क्योंकि वो सिर्फ़ डरा हुआ है। और डरा हुआ आदमी कभी अकेला नहीं होता — उसके पीछे कोई और खड़ा होता है।"
कमरे में सन्नाटा था।
"तो आप कह रहे हैं कि जिसका अँगूठा है, वो डरा हुआ था?"
"मैं कह रहा हूँ कि उसे डराया गया था," उस्ताद ने कहा। "और जिसने डराया, वो आज भी गली में घूम रहा है। नाम बदलकर। कपड़े बदलकर। मुस्कुराहट बदलकर।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"रणवीर?"
उस्ताद ने कुछ नहीं कहा।
टिंकू ने अपनी जेब से वो टूटा हुआ पेचकस निकाला, जो वो रात भर सोते वक्त पकड़े रहता था, और उसे मेज़ पर रख दिया।
उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा।
"ये क्या है?"
"मेरा औज़ार," टिंकू ने कहा, थोड़ी शर्म से। "रात में मैं इसे पकड़कर सोता हूँ।"
उस्ताद ने उसे उठाया और लैंप के नीचे किया। उनकी उँगलियाँ हत्थे पर फिरीं।
और फिर उन्होंने कुछ कहा, जो मुझे समझ नहीं आया, पर जिससे मेरी रीढ़ ठंडी हो गई।
"ये औज़ार उसी साँचे से बना है," उन्होंने कहा। "जिस साँचे से मेरे भाई का औज़ार बना था।"
"क्या मतलब?"
"मतलब ये कि इस औज़ार को बनाने वाला आदमी हमारे बाज़ार का था। और उस आदमी के पास सिर्फ़ उतने औज़ार बनाने का हुकुम था जितने एक तिजोरी में आ सकें।" उन्होंने टिंकू की तरफ़ देखा। "इसका मतलब, बेटा, ये औज़ार कहीं और नहीं, बल्कि उसी शहर की उसी ज़मीन के नीचे बना है जिस पर तेरा उस्ताद आज खड़ा है।"
टिंकू की आँखें बड़ी हो गईं।
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
"उस्ताद," मैंने कहा, "आप आज कुछ ज़्यादा बता रहे हैं और कम बता रहे हैं। साफ़ बोलिए।"
वो मेरी तरफ़ मुड़े।
"साफ़ बात यह है," उन्होंने कहा, "कि कल सुबह तेरे पास जो रजिस्टर खुलेगा, उसमें तेरे दादा का नाम सिर्फ़ एक नाम नहीं है। वो एक गवाही है। और जिसने उस गवाही के नीचे अँगूठा लगाया था, वो अब सबके सामने आएगा — चाहे वो चाहे या ना चाहे।"
"कौन?"
उस्ताद ने काग़ज़ों की तरफ़ देखा और फिर मेरी तरफ़।
"वो आदमी जिसके हाथ काँपते हैं," उन्होंने कहा, "जो रोज़ सुबह अस्पताल के बाहर नींबू-मिर्ची का हार लेकर खड़ा होता है।"
मेरे मुँह से एक ही नाम निकला।
"गोविंद भाई।"
उस्ताद ने कुछ नहीं कहा। सिर्फ़ लैंप की बत्ती ऊँची कर दी, और कमरा फिर पीला हो गया।
टिंकू ने धीरे से कहा, "तो जो नाम इस फाइल पर ऊपर लिखा है…"
"वो उसका है," उस्ताद ने कहा। "पर वो नाम उसने नहीं लिखा। किसी और ने उसे इस फाइल पर बाद में चढ़ाया है — ताकि जब ये फाइल कभी बाहर आए, तो सबसे पहले उसका नाम दिखे।"
"मतलब?"
"मतलब, कोई चाहता है कि गोविंद भाई सबसे पहले टूटे।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो काग़ज़ थामे बैठी थी और उसके होंठ काँप रहे थे।
"मीरा?"
"मैं ठीक हूँ," उसने कहा। "बस सोच रही हूँ कि जो आदमी रणवीर के लिए अंगूठे लेता था, और जो आदमी डर के मारे चुप है — अगर ये दोनों अलग-अलग बातें हों… तो सच कितना पेचीदा है।"
मैं उठा और कमरे के दरवाज़े तक गया। बाहर गली में हवा चल रही थी और पीपल की डालियाँ हिल रही थीं। शबनम आपा की गुमटी की बत्ती बुझ चुकी थी, पर उस्ताद की दुकान से अभी भी हल्की पीली रोशनी आ रही थी।
मैंने दरवाज़ा बंद किया और वापस आकर बैठ गया।
"उस्ताद," मैंने कहा, "आपने कहा कि वो आदमी आपकी दुकान पर आया था। पचास साल पहले। तो उसने क्या माँगा था?"
उस्ताद ने अपना चश्मा उतारा और उसे कमीज़ से पोंछा। यह उनकी आदत है — जब वो कुछ कहने से पहले सोचते हैं, तो चश्मा पोंछते हैं।
"उसने कुछ नहीं माँगा," उन्होंने कहा। "वो आया और बैठ गया। मेरी दुकान के उस पुराने स्टूल पर, जो आज भी मेरी दुकान में है। बैठकर उसने एक लिफ़ाफ़ा मेज़ पर रखा और कहा कि अगर कल तक वो वापस न आए, तो ये लिफ़ाफ़ा उस आदमी को देना जो साइकिल की घंटी लेकर आए।"
मैं स्तब्ध रह गया।
"और आपने दिया?"
"नहीं," उस्ताद ने कहा। "वो कल तक नहीं आया, पर मैंने वो लिफ़ाफ़ा किसी को नहीं दिया, क्योंकि उस दिन के बाद मेरे भाई और मुझमें फूट पड़ गई। मैंने वो लिफ़ाफ़ा उसी दिन अपने ट्रंक में रख दिया और पचास साल उसे खोला नहीं।"
मीरा उठ खड़ी हुई।
"वो लिफ़ाफ़ा आपके पास है?"
उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा। "है।"
"तो अभी लाइए।"
"नहीं।"
"उस्ताद —"
"नहीं, बेटी," उस्ताद ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो बहस नहीं करती। "वो लिफ़ाफ़ा मैं कल पीपल के नीचे खोलूँगा। सबके सामने। अगर मैं आज इसे तेरे हाथ में दे दूँ, तो मैं कोई गवाही नहीं बचाऊँगा। और इस शहर को आज गवाही चाहिए, तेज़ी से पहले।"
मीरा कुछ कहने को हुई, फिर रुक गई।
मैंने कहा, "उस्ताद ठीक कह रहे हैं, मीरा।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। "तू भी?"
"हाँ," मैंने कहा। "क्योंकि अगर वो लिफ़ाफ़ा एक बार हमारे हाथ में आ गया, तो ये फाइल किसी काम की नहीं रहेगी। और अगर इसे कल सबके सामने खोला जाए, तो एक और सबूत खड़ा होगा, हमारे सबूत के साथ।"
मीरा ने कुछ देर मेरी तरफ़ देखा, फिर उसने थैला उठाया।
"ठीक है," उसने कहा। "पर एक शर्त है।"
"क्या?"
"आज रात मैं इस फाइल की सारी तस्वीरें लूँगी। हर पन्ने की। ताकि अगर कल कुछ हो जाए, तो कम से कम एक कॉपी गली के बाहर रहे।"
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
उन्होंने मीरा को देखा, फिर मेरी तरफ़।
"ये लड़की समझदार है," उन्होंने कहा।
और यह पहली बार था जब उस्ताद ने मीरा के बारे में कुछ ऐसा कहा जो तारीफ़ की तरह लगा।
मीरा ने मेज़ पर पहला पन्ना रखा और अपना कैमरा निकाला। लैंप की रोशनी कम पड़ रही थी, तो मैंने ट्रंक से एक और छोटी टॉर्च निकाली और उसे काग़ज़ के ऊपर पकड़ लिया।
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