The Mysterious Bell – Chapter 472
"तुम इस मोड़ पर बैठे हो, मुझे देख रहे हो, पान चबा रहे हो। इस गली में तुम्हें पहले कभी नहीं देखा। तो हिसाब क्या है?"
वो मुस्कुराया। दाँत पान से लाल।
"मेरा नाम नहीं पूछा तुमने।"
"नाम नहीं चाहिए। हिसाब चाहिए।"
"अच्छा।" उसने हैंडल पकड़कर थोड़ा झुका। "साहब ने कहा था — रोज़ शाम इस मोड़ पर बैठ जाना। देखना। बस देखना। बात नहीं करनी, डराना नहीं, कुछ माँगना नहीं। सिर्फ़ देखना।"
"कौन साहब?"
"जिसके पास इतना वक़्त है कि आदमी बैठाकर देख सके।" उसने कहा। "मैं तो खुद देख रहा हूँ कि जिसे साहब देख रहे हैं, वो क्या कर रहा है।"
"तो देखते रहो।" मैंने कहा। "पर एक बात याद रखना। इस गली में लोग चाय पर बैठते हैं और देखने वालों की खबर रखते हैं। तुम चौथे दिन यहाँ बैठोगे, तो पहले दिन की तुम्हारी शक्ल गुमटी के बोर्ड पर चिपकी होगी।"
वो हँसा। छोटी हँसी, जैसे किसी फटे पुराने रेडियो से निकले।
"तुम ठीक हो, लड़के। साहब ने कहा था तुम सीधे आओगे। मैंने कहा था — पहले गाली देगा, फिर भागेगा।"
"किसने जीता?"
"अभी तो तुम जीते।" उसने कहा और स्कूटर का पहिया सड़क पर घसीटकर मोड़ लिया। "पर गली का हिसाब लंबा होता है।"
वो चला गया। धुआँ पीछे छोड़कर। मैं कुछ देर वहीं खड़ा रहा और मुझे अचानक एहसास हुआ कि आज सुबह से कितनी चीज़ें एक साथ खुल रही हैं — शालिनी की रिपोर्ट, बबलू का बैग, सलीम बक्श की घंटी — और अब ये नया आदमी, जो कुछ माँगने नहीं, सिर्फ़ देखने आया था।
देखना सबसे खतरनाक होता है। मारने वाले की ज़ुबान खुल जाती है। देखने वाले की नहीं।
दुबे अंकल थाने के दरवाज़े पर खड़े थे। उन्होंने आदमी के जाने तक इंतज़ार किया, फिर अपनी कुर्सी की तरफ़ बढ़े और बैठने से पहले बोले, "नाम पूछा?"
"नहीं।"
"अच्छा किया।" उन्होंने कुर्सी के पैर के नीचे पड़ी पुरानी ईंट ठीक से रखी। "अजनबी का नाम जान लेना उससे नाता जोड़ लेना होता है। नाता जुड़ गया तो बदलना मुश्किल हो जाता है।"
"आप जानते हैं वो कौन था?"
दुबे अंकल ने नीली शर्ट का कॉलर सीधा किया और कुछ देर गली के मोड़ की तरफ़ देखते रहे।
"सालों में एक बात सीखी है, बेटा। जो आदमी सामने आकर धमकी नहीं देता, वो मिट्टी कम खोदता है। पर उसकी खुदाई ज़्यादा गहरी होती है।"
"मतलब?"
"मतलब — वो आया, देखा, चला गया। आज रात गली में कोई गाड़ी आई, तो तुम्हें पता नहीं चलेगा। और यही उसकी जीत है।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "और हाँ, वो पीला लिफ़ाफ़ा जो मेरी कॉपी में रखा है, आज रात नहीं खोलूँगा। कल सुबह, सूरज निकलने के बाद। जो काग़ज़ रात में खुलते हैं, वो नींद नहीं लेने देते।"
"अंकल, उसमें क्या है?"
"पता होता तो अब तक खोल चुका होता।" वो हँस दिए, फिर गंभीर हो गए। "पच्चीस साल पहले तेरे दादा जगदीश यादव इस थाने में आए थे। मेरी कॉपी में वो लाइन आज भी है — बस इतना लिखा है, वो रात दो बजे आए, कुछ काग़ज़ जमा करवाया और सुबह होने से पहले चले गए। मैं तब सिपाही था, नई वर्दी में, और मुझे लगा था कि ये कोई आम काग़ज़ है।"
"और अब?"
"और अब मुझे लगता है कि मैंने उस रात कुछ ऐसा देखा था जो मेरी समझ से बाहर था।" उन्होंने कहा। "तुम कल आना। सुबह। मैं तुम्हारे सामने खोलूँगा, खुद पहली बार।"
रात ग्यारह बजकर कुछ मिनट पर मैं अस्पताल के गेट पर पहुँचा। पापा वहीं खड़े थे, हाथ में भूरे कपड़े में लिपटी फाइल, और चेहरे पर वो शांति जो डर के बाद आती है — जाने से पहले की शांति।
सीढ़ी के किनारे एक सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी खड़ा था, हाथ में लोहे की लंबी चपटी पट्टी। मैंने उसे पहचाना नहीं, पर उसकी पकड़ पहचानी — वो पकड़ सलीम बक्श के आदमियों की होती है।
"शंकर जी।" उसने कहा। "चाबी।"
पापा ने जेब से चाबी निकाली। मैंने उनका हाथ पकड़ा।
"पापा, रुकिए।"
"बेटा, यह काम आज होना है।" उन्होंने कहा। आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। "आज रोका, तो कल ये रात के दो बजे आएँगे, और तब सीढ़ी के साथ कुछ और भी बंद करके जाएँगे।"
"तो बंद होने दीजिए। हम दूसरा रास्ता—"
"कोई दूसरा रास्ता नहीं है।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। मुझे उनकी आँखों में पहली बार कुछ और दिखा — थकान नहीं, कोई पुराना सवाल। "जब तक सीढ़ी चालू है, मरीज़ ऊपर जा सकते हैं। मरम्मत के काग़ज़ तेरे हाथ में हैं, पर मरीज़ आज रात ऊपर जाना चाहते हैं तो सीढ़ी चाहिए। सीढ़ी के बदले चाबी देना पड़े तो देना पड़ेगा।"
उन्होंने चाबी उस आदमी की हथेली पर रख दी। लोहे की पट्टी आदमी ने सीढ़ी के किनारे से सटाई और एक काग़ज़ निकालकर पापा के हाथ में थमाया।
"आज रात बारह बजे से सीढ़ी बंद। मरम्मत नई इमारत का काम तय होने तक।" उसने कहा और चला गया।
ग्यारह बजकर पचास मिनट पर सीढ़ी पर एक भी मरीज़ नहीं बचा था। मैंने ऊपर जाकर आख़िरी बार उस पुराने पत्थर को छुआ, जिस पर माँ खाँसते हुए बैठी थीं। पत्थर ठंडा था।
बारह बजते ही उस आदमी ने लोहे की पट्टी सीढ़ी के रास्ते पर आड़ी लगा दी।
फिर मैं और पापा अस्पताल की सीढ़ी के नीचे बनी बेंच पर बैठ गए। मेरी जेब में घंटी थी। मैं उसे निकालकर हथेली में रख लिया, और वो हल्की-सी गरम थी, जैसे किसी ने अभी उसे हाथ में लेकर सुना हो।
"पापा।" मैंने कहा।
"हाँ।"
"एक सवाल है। पंद्रह साल से मेरे अंदर फँसा हुआ है।"
पापा ने फाइल अपनी गोद में रख ली, और उनकी उँगलियाँ कुछ देर काग़ज़ों पर थीं, फिर रुक गईं।
"पूछ।"
"आपने अंगूठा क्यों लगाया था?"
अस्पताल के पीछे मशीन की आवाज़ आ रही थी। धीमी, रुक-रुक कर, जैसे सोते हुए आदमी की साँस।
पापा ने एक लंबी साँस ली। और फिर वो बोले — उतनी ही धीमी आवाज़ में, जितनी में बारिश की आहट आती है।
"तेरी माँ अस्पताल में थीं। पैसे खत्म थे। डॉक्टर ने कहा था — दो हफ़्ते, और साथ देना पड़ेगा। मैंने तीन जगह हाथ फैलाए। किसी ने दो रुपये नहीं दिए। फिर एक आदमी आया, सफ़ेद कुर्ते में, और उसने काग़ज़ रखा। कहा — अंगूठा लगाओ, इलाज चालू।"
मैं चुप रहा।
"मैंने पढ़ा नहीं।" पापा ने कहा। "इतना डर था कि पढ़ता तो भी समझ नहीं पाता। और मैंने अंगूठा लगा दिया। आधी रात को, किसी दफ़्तर में, जहाँ बत्ती कम थी और काग़ज़ ज़्यादा।"
"आपने मुझे क्यों नहीं बताया?"
इस पर पापा कुछ देर चुप रहे।
"क्योंकि जिस दिन तुम्हें पता चलता, उस दिन तुम मुझे देखते और तुम्हारी आँखों में एक बात आ जाती — कि बाप कायर है। और मैं उस आँख को सह नहीं पाता।"
"मैं वो बात आपकी आँखों में देखता रहा, पापा। पंद्रह साल।" मैंने कहा। "आप हमेशा चुप रहे, और मैंने सोच लिया कि आपको फ़र्क़ नहीं पड़ता। मुझे नहीं पता था कि आप चुप नहीं, डरे हुए हैं।"
पापा ने अपनी हथेली मेरे घुटने पर रखी। उनका हाथ पतला था और उँगलियों पर पुराने औज़ारों की कालिख लगी थी।
"माफ़ कर दे।"
"आप माफ़ी माँग रहे हैं?" मैंने कहा। "पापा, मैं आपके सामने बैठा हूँ, आप मुझसे माफ़ी माँग रहे हैं। मैं कौन होता हूँ?"
"तुम मेरा बेटा हो। और बेटे से माफ़ी माँगने में शर्म नहीं आती। जो इंसान इससे शरमाए, वो उम्र भर अकेला रहता है।"
मैंने घंटी जेब में रखी और कुछ देर सामने देखता रहा। अस्पताल का गेट सुनसान था। एक बूढ़ी औरत गली के मोड़ से गुज़री, सिर पर सूखे कपड़ों का गट्ठर। कहीं दूर किसी कुत्ते ने एक बार भौंका और चुप हो गया।
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