The Mysterious Bell – Chapter 473
तभी घंटी हल्की-सी बजी। बिना हाथ लगाए।
"डर बाँटा था।" उसने कहा। "अब सच बँटेगा।"
"कितना?" मैंने धीरे से पूछा।
"कुछ नहीं।" घंटी ने कहा। "ये जोड़ तुम्हारा नहीं, इनका है। इसमें मैं हिसाब नहीं रखती।"
और फिर वो चुप हो गई, और उस चुप्पी में एक अजीब-सी बात थी — जैसे किसी पुरानी मशीन का पहिया, जो इतने साल बाद पहली बार अपनी असली जगह पर आकर रुका हो।
उस रात मैं घर लौटा तो दो बज रहे थे। माँ जाग रही थीं। उन्होंने दरवाज़े पर ही पूछा, "पापा?"
"नीचे बेंच पर सो रहे हैं। मैंने कंबल ओढ़ा दिया है।"
"चाबी दे दी?"
"दे दी।"
माँ ने कुछ देर मेरी तरफ़ देखा, फिर धीरे से सिर हिलाया और खुद चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े की तरफ़ चल दीं। वहाँ रुककर बोलीं, "कल सुबह छह बजे मैं जाग जाऊँगी। तू तैयार रहना। मुझे भी सुनना है कि उस लड़की ने रमा मैडम से क्या कहा।"
"माँ, तुम आराम करो—"
"जब तक सीढ़ी बंद रहेगी, मैं आराम करूँगी।" उन्होंने कहा। "उससे ज़्यादा नहीं।"
सुबह पाँच बजकर पचास मिनट पर मीरा गुमटी पर पहुँच गई थी। शबनम आपा उस वक़्त चूल्हा जला रही थीं और गुमटी से धुआँ उठ रहा था। मीरा के हाथ में वो पुराना थैला था, जिसमें पाँच साल पुराना बंद लिफ़ाफ़ा रखा था।
"तैयार है?" मैंने पूछा।
"नहीं।" उसने कहा। "पाँच साल से तैयार नहीं हूँ। आज भी नहीं हूँ।"
"तो चल।"
रमा मैडम का घर स्कूल के पीछे पीपल की दूसरी गली में था। नीला दरवाज़ा, ऊपर छोटी खिड़की, बाहर पड़ी ईंटों पर एक गमला जिसमें तुलसी सूख रही थी। दरवाज़े पर पेंट उखड़ा हुआ था।
मीरा ने तीन बार खटखटाया। कोई नहीं आया। फिर तीन बार और। अंदर से चप्पल की आवाज़ आई, और दरवाज़ा आधा खुला।
रमा मैडम सामने खड़ी थीं। चालीस-पैंतालीस के आसपास, सफ़ेद-काले बाल, चश्मा नाक पर, हाथ में चाय का कप। उन्होंने मीरा को देखा, और उनकी आँखों में कुछ बदला — गुस्सा नहीं, कुछ और, जो शायद पाँच साल से वहीं रखा था।
"तुम।" उन्होंने कहा।
"मैडम—"
"सुबह छह बजे?"
"मैडम, ये लिफ़ाफ़ा—"
"मुझे पता है इसमें क्या है।" रमा मैडम ने कहा। उनकी आवाज़ में कड़वाहट नहीं थी, बस बहुत सारी थकान। "पाँच साल से मैं इस दरवाज़े के पीछे हूँ और तुम बाहर। अब तुम लिफ़ाफ़ा लाई हो।"
मीरा ने लिफ़ाफ़ा आगे बढ़ाया। रमा मैडम ने नहीं लिया।
"शाम को।" उन्होंने कहा। "स्कूल के आँगन में अभिभावकों की सभा है। मैं वहाँ बैठूँगी। तुम वहाँ खड़ी होना और सबके सामने बोलना। फिर मैं सुनूँगी। काग़ज़ मेरे हाथ में देकर तुम खुद को हल्का नहीं कर सकती।"
दरवाज़ा बंद हो गया।
मीरा कुछ देर वहीं खड़ी रही, और मुझे लगा कि वो रोएगी। पर वो नहीं रोई। उसने लिफ़ाफ़ा थैले में वापस रखा और मेरी तरफ़ देखा।
"वो ठीक कह रही हैं।" उसने कहा। "काग़ज़ देने से पाप नहीं धुलता। सबके सामने बोलने से शायद कुछ हो।"
शाम को स्कूल का आँगन भर गया।
ये वो छोटी सभा थी, जिसे मुख्याध्यापक ने बुलाई थी — अभिभावक, दो-तीन मास्टर, स्टोर का आदमी, और बाहर खड़े कुछ लोग। लोहे की सीढ़ी के नीचे से बेंच निकालकर लगाई गई थीं। नीम के पेड़ के नीचे एक लकड़ी की मेज़ रखी थी, जिस पर माइक नहीं था — मुख्याध्यापक ने कहा था, आज किसी को चिल्लाने की ज़रूरत नहीं।
मैं पीछे की बेंच पर बैठा था। शबनम आपा मेरे बगल में, हाथ में रूमाल मसलती हुई। टिंकू, सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू दीवार के साथ बैठे थे, और उनकी आँखें मीरा पर जमी थीं।
रमा मैडम सामने की पहली बेंच पर आकर बैठीं। उन्होंने कोई बात नहीं की। शॉल कंधों पर, हाथ गोद में।
मुख्याध्यापक ने खड़े होकर कहा कि आज सभा सिर्फ़ दो बातों के लिए है — छत और स्कूल की सुरक्षा। फिर उन्होंने कहा कि जिसे कुछ कहना है, आगे आकर कहे।
मीरा उठी।
वो आगे गई, मेज़ के सामने खड़ी हुई, और एक पल के लिए उसकी आँखें सब पर फिरीं। मैंने देखा कि उसका हाथ काँप रहा है। उसने कैमरा अपने कंधे से उतारकर मेज़ पर रख दिया — जैसे कह रही हो, आज मैं रिकॉर्ड नहीं करूँगी, आज मुझे सुना जाए।
"मैं मीरा तिवारी हूँ।" उसने कहा। आवाज़ पहले थोड़ी धँसी, फिर साफ़ हो गई। "मैं 'बस्ती की आवाज़' चलाती हूँ। आप में से कई लोग मुझे जानते हैं। और कई लोग मुझसे नाराज़ हैं, जिसका हक़ उन्हें है।"
आँगन में हल्की-सी सरसराहट हुई।
"पाँच साल पहले मैंने इसी स्कूल के बारे में एक खबर छापी थी। उसमें रमा मैडम का नाम था।" उसने आगे देखा, रमा मैडम की तरफ़। "वो खबर अधूरी थी। मैंने आधा सच लिया और उसे पूरा बनाकर छाप दिया। मुझे उस वक़्त लगा कि मैं सही कर रही हूँ। सच बाहर लाना सही काम है। पर जो सच आधा हो, वो सच नहीं होता। वो बातचीत होती है, और बातचीत से घर टूटते हैं।"
किसी ने खाँसा।
"रमा मैडम का घर उस खबर से टूटा। उनके पति चले गए। उनकी बेटी का स्कूल बदला। और जिस दिन मुझे पता चला कि खबर अधूरी थी, उस दिन मैंने डरकर सच दबा दिया। मैंने सोचा — अब सुधारने से क्या होगा। मेरी नौकरी जाएगी, और कुछ नहीं बदलेगा।"
उसकी आवाज़ एक पल के लिए रुकी।
"वो सोच गलत थी। सुधार नहीं हुआ इसलिए नहीं कि सुधार से कुछ नहीं बदलता। सुधार नहीं हुआ इसलिए कि मैंने कोशिश नहीं की।"
वो रमा मैडम की तरफ़ मुड़ी।
"मैडम, मैं आपसे माफ़ी माँगती हूँ। मैं ये नहीं कहूँगी कि मेरी माफ़ी से आपका घर वापस आ जाएगा। वो नहीं आएगा। मैं बस ये कहती हूँ कि जो मैंने किया, वो गलत था, और जो मैंने डरकर छिपाया, वो और गलत था। और आज से मैं ये खबर पूरी छापूँगी — पूरी, जैसी है, सबके नाम के साथ।"
आँगन बिल्कुल चुप हो गया।
रमा मैडम ने कोई जवाब नहीं दिया। वो बस बैठी रहीं, ठीक वैसे ही जैसे पहले बैठी थीं, बस उनके हाथ अब गोद से उतरकर बेंच के किनारे आ गए थे। उन्होंने मीरा को देखा। एक शब्द नहीं बोलीं।
फिर, कुछ देर बाद, वो उठीं। धीरे से। और मेज़ के सामने आकर खड़ी हुईं।
"मैं माफ़ नहीं कर रही हूँ।" उन्होंने कहा। आवाज़ साफ़ थी, बिना काँप। "माफ़ी एक दरवाज़ा है, मीरा। तुमने उसे खटखटाया, और मैंने खोल दिया। पर दरवाज़ा खुलने का मतलब ये नहीं कि अंदर आ जाओ। दरवाज़ा खुला रहेगा तभी तक, जब तक तुम उसे टिकाए रखोगी।"
मीरा ने सिर हिलाया।
"मैं टिकाऊँगी।"
"कैसे?"
"रोज़।" मीरा ने कहा। "रोज़ उस खबर को पूरा करके। हर उस नाम के साथ जो उसमें है। और जब भी आपको लगे कि मैं फिर आधा सच लिख रही हूँ, आप मुझे रोक सकती हैं।"
रमा मैडम ने उसकी तरफ़ देखा, और पहली बार उनके चेहरे पर कुछ और आया — माफ़ी नहीं, पर माफ़ी के बगल वाला कमरा।
"मेरी बेटी का नाम भी खबर में आएगा?" उन्होंने पूछा।
"नहीं।" मीरा ने कहा। "जिनका नाम नुक़सान से जुड़ा है, उनका नाम नहीं आएगा। सिर्फ़ उनका, जिन्होंने नुक़सान किया।"
रमा मैडम ने एक लंबी साँस ली, और फिर वो वापस अपनी बेंच पर बैठ गईं। उन्होंने कुछ और नहीं कहा। पर जब वो बैठीं, तो उनका शॉल उनके कंधे से खिसक गया था, और उन्होंने उसे सीधा नहीं किया।
और मेरी जेब में घंटी बजी। धीमी, बहुत धीमी, जैसे किसी बच्चे ने नींद में हाथ हिलाया हो।
"आधा दरवाज़ा।" उसने कहा।
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