The Mysterious Bell – Chapter 471
"मैं हूँ।" मैंने कहा। "मैं खुद को कायर नहीं कहता, क्योंकि यह कहना आसान होता है। मैं कहता हूँ कि मैं डरा हुआ हूँ। डरा हुआ आदमी भी काम कर सकता है, मीरा। बस उसे अपने डर का नाम पता होना चाहिए। तेरी गलती यह नहीं थी कि तू डरी। तेरी गलती यह थी कि तूने अपने डर को 'समझदारी' का नाम दे दिया।"
वो चुप बैठी रही। बल्ब गुनगुनाता रहा।
फिर उसने बहुत धीरे से कहा, "अब क्या करूँ?"
"मैं तुझे यह नहीं बताऊँगा कि सब ठीक हो जाएगा। यह झूठ होगा और जोड़ के वक़्त मुझे झूठ बोलने की इजाज़त नहीं है। सच यह है कि तेरे हाथ में दो ही चीज़ें हैं। एक, यह काग़ज़। दो, तेरी ज़ुबान। और में तुझे एक बात पक्की बता सकता हूँ — जो आदमी अपनी गलती सबके सामने बोल देता है, उसे लोग माफ़ करें या न करें, वो खुद को माफ़ करने लगता है। और वही एक जगह है जहाँ से घर लौटने का रास्ता शुरू होता है।"
"और अगर रमा मैडम मुझे माफ़ न करें?"
"तो भी।" मैंने कहा। "माफ़ी माँगना सिक्का नहीं है जो तूने डाला और बदले में माफ़ी निकली। माफ़ी माँगना तेरा अपना काम है। वो चाहें माफ़ करें, चाहें दरवाज़ा बंद कर दें। तुझे फिर भी खड़ा रहना पड़ेगा। एक बार, दो बार, जितनी बार ज़रूरत हो।"
मीरा ने काग़ज़ मेज़ पर रखा। फिर उसने अपना थैला उठाया, जो उसने अब तक कंधे से उतारा भी नहीं था, और उसमें हाथ डाला।
उसने एक लिफ़ाफ़ा निकाला। नीला-सा, ज़र्द पड़ा, कोना मुड़ा हुआ।
"यह मैंने पाँच साल पहले लिखा था। रमा मैडम के नाम।" उसने कहा। "डाक में कभी नहीं डाला। हर बार डाकखाने तक गई, हर बार डिब्बे के सामने खड़ी रही, हर बार लौट आई।"
उसने लिफ़ाफ़ा मेज़ पर रखा, काग़ज़ के बगल में।
"आज मैं इसे खुद देने जाऊँगी।"
"आज नहीं।"
उसने सिर उठाया।
"आज रात अस्पताल की सीढ़ी बंद हो रही है और घर में पापा हैं, जिनसे मैं आज एक सवाल पूछने वाला हूँ।" मैंने कहा। "पर सुबह। सुबह पहले तेरा काम। मैं तेरे साथ चलूँगा, शबनम आपा भी चलेंगी, और अगर वो दरवाज़ा बंद कर दें तो हम दरवाज़े के बाहर बैठकर इंतज़ार करेंगे।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने वो लिफ़ाफ़ा उठाया, अपने दोनों हाथों में पकड़ा, और सीने से लगा लिया, उसी तरह जैसे अभी काग़ज़ को लगाया था।
"अंकुश।" उसने कहा।
"क्या?"
"तू मुझे डाँट क्यों नहीं रहा? तू मुझे डाँट सकता है। तेरी दुकान पर नोटिस चिपका है, तेरी दस दिन की मोहलत है, तेरी सड़क पर मशीन खड़ी होने वाली है। और मैं बैठी हूँ यहाँ अपनी पाँच साल पुरानी बात लेकर। तू चाहे तो कह सकता है — अपनी बात कर हमारी बात क्यों कर रही है।"
मैंने ट्रंक बंद किया। फिर उसकी तरफ़ देखकर कहा —
"क्योंकि मेरी दुकान पर जो था, वो सिर्फ़ साइकिल का हिसाब नहीं है। मेरे पापा ने भी एक दिन किसी के डर के आगे अपना अंगूठा लगाया था। और उस दिन से यह घर चुप है। तेरी कहानी मेरी कहानी जैसी है, मीरा। बस फ़र्क़ इतना है कि तूने झूठ लिख दिया और पापा ने झूठ पर हस्ताक्षर कर दिए।"
कमरे में ऐसी चुप्पी आई जो बोलती है।
और उसी चुप्पी में मेरी जेब से आवाज़ आई।
घंटी की। एक छोटी, साफ़ आवाज़। जैसे किसी ने भीतर से उँगली रखकर हल्का-सा छुआ हो।
मैंने जेब से घंटी निकाली। वो मेरी हथेली पर थी और उसमें एक हल्की-सी कँपकँपी थी।
और फिर मैंने वो आवाज़ सुनी जो सिर्फ़ मैं सुनता हूँ।
"आधा काग़ज़, आधा घर।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "फिर से बोली?"
"हाँ।"
"क्या कहा?"
मैंने घंटी जेब में रखी।
"कहा कि आधा काग़ज़ आधे घर को वापस नहीं ला सकता। पर आधा सच पूरा हो जाए, तो घर के बंद दरवाज़े खुलने लगते हैं।"
मीरा ने कुछ देर घंटी की तरफ़ देखा, जो अब जेब में थी, फिर मेरे चेहरे की तरफ़।
"अंकुश, तूने अभी कहा कि माफ़ी माँगना सिक्का नहीं है।"
"हाँ।"
"तो फिर माफ़ी माँगने से क्या होगा? अगर रमा मैडम का घर टूट चुका है, उनका पति जा चुका है, बच्ची का स्कूल बदल चुका है — तो मेरी माफ़ी से क्या बदलेगा?"
मैंने कुछ देर उसे देखा। बाहर शबनम आपा किसी को चाय दे रही थीं और गुमटी में किसी की हँसी आ रही थी। गली की आवाज़ें कमरे के दरवाज़े से होकर अंदर आ रही थीं। किसी का बच्चा रो रहा था। कोई पेपर वाला धक्का दे रहा था। बिल्कुल आम शाम।
"कुछ नहीं बदलेगा।" मैंने कहा। "माफ़ी माँगने से टूटा घर वापस नहीं आएगा। उनका पति नहीं लौटेगा। बच्ची का बीता साल नहीं लौटेगा। जो बात एक बार टेढ़ी हो जाए, वो सीधी नहीं होती। उसके आसपास ही काम चलता है।"
मैं उठकर खड़ा हुआ और मेज़ पर रखा पीला नोटिस देखने लगा, जो आज सुबह दुकान के शटर पर चिपका मिला था, बिना नाम, बिना मुहर, बिना तारीख़।
"पर सुन।" मैंने कहा, मुँह उसी तरफ़, और आवाज़ धीमी। "माफ़ी माँगने से तेरा घर वापस नहीं आएगा, मीरा। उसके लिए तुझे कोई और कीमत चुकानी पड़ेगी। पर सच बोलने से तू अपने घर लौट सकती है।"
मीरा ने लिफ़ाफ़ा मेज़ पर रख दिया और उठ खड़ी हुई।
बाहर गली में किसी ने घंटी की आवाज़ जैसी कोई आवाज़ निकाली — शायद कोई बच्चा साइकिल पर। और मैंने अपनी जेब में पड़ी घंटी को महसूस किया, जो अब भी हल्की-सी गरम थी, जैसे अभी-अभी किसी ने उसे हाथ में लिया हो और मुँह से लगाकर सुन लिया हो।
तभी दरवाज़े पर टिंकू का चेहरा दिखा। आधा, क्योंकि वो पूरा आने से डर रहा था।
"उस्ताद।"
"हाँ?"
"बबलू का स्कूटर थाने के सामने रुका है। और पीछे जीप है।"
मीरा ने तुरंत अपना थैला उठाया और उसकी आँखों में वो पुरानी तेज़ी लौट आई, जिसे मैं जानता था — खबर की तेज़ी, बीस कदम पहले पहुँच जाने की तेज़ी।
मैंने उसका हाथ पकड़कर रोका।
"आज रात कोई खबर नहीं।" मैंने कहा। "आज रात सिर्फ़ घर। अस्पताल की सीढ़ी बारह बजे बंद होनी है, चाबी मेरे पापा को सौंपनी है, और मुझे पापा से एक सवाल पूछना है जो पंद्रह साल से मेरे अंदर फँसा हुआ है।"
मीरा ने एक पल मेरी तरफ़ देखा, फिर लिफ़ाफ़ा थैले में रखा और कहा, "ठीक है। सुबह। रमा मैडम के दरवाज़े पर। सात बजे।"
"छह बजे।"
"छह?"
"तेरे पास सोने का वक़्त नहीं है।" मैंने कहा और शटर की तरफ़ बढ़ा।
वो हँसी। पहली बार उस शाम उसकी हँसी में पुराना काँटा नहीं था।
और जब मैंने शटर ऊपर धकेला, तो बाहर की शाम मेरे मुँह पर आ गिरी — चाय की भाप, गली की धूल, पीपल के पत्तों की खड़खड़ाहट, किसी के हाथ में बजती ताली, और सामने थाने के मोड़ पर खड़ा एक स्कूटर, जिस पर बैठा आदमी पान चबा रहा था और मेरी तरफ़ ऐसे देख रहा था जैसे उसने कोई हिसाब बराबर करने आया हो।
॥
वो आदमी स्कूटर पर बैठा पान चबा रहा था और मुझे ऐसे देख रहा था जैसे कोई हिसाब बराबर करने आया हो। मैंने शटर पूरा ऊपर धकेला, गली की धूल में पैर रखा, और सीधा उसकी तरफ़ चल दिया। टिंकू मेरे पीछे आ रहा था, हाथ में छोटा पेचकस पकड़े, जैसे जंगल में कोई लाठी लेकर चलता है।
"अंकुश भैया, रुको ना—"
"तू पीछे रह।"
मैं स्कूटर के पास पहुँचा। आदमी ने पान चबाना बंद नहीं किया। मेरी तरफ़ देखा, फिर मेरे पीछे टिंकू की तरफ़, फिर फिर मेरी तरफ़। उसकी जीभ लाल थी और होंठ के किनारे पान का रस सूख रहा था।
"क्या हिसाब है?" मैंने पूछा।
"हिसाब?" उसकी आवाज़ में हल्की खरोंच थी, जैसे रेत पर पैर घसीटते हैं।
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