The Mysterious Bell47 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 47

7 min read November 5, 2026

उस्ताद ने उसे घूमते देखा। फिर वो पलटे। मेरी आँखों में देखा।

"चेन?" उन्होंने पूछा।

"जुड़ गई," मैंने कहा।

"कैसे?"

"सच से," मैंने कहा। "गिरधारी ने बताया कि पंद्रह साल पहले पिता के बक्से से पैसे चुराए थे, पर वो पैसे मोहन की स्कूल फीस के लिए थे। शर्म के मारे कभी नहीं बता पाया। मोहन रोया। उसने कहा कि उसे पता था — पर उसने गुस्से में साइकिल यहीं छोड़ दी, ताकि भाई को तकलीफ़ हो।"

उस्ताद की आँखें भर आईं। उन्होंने पलक नहीं झपकी। फिर उन्होंने सिर हिलाया।

"पचास साल," उन्होंने कहा, बहुत धीरे। "मैंने पचास साल सोचा कि मेरे भाई ने मुझसे झूठ बोला था। आज तुझसे सुनकर लगा — शायद उसने भी कोई ऐसी ही बात छुपाई थी। शर्म के मारे।"

"उस्ताद—"

"मैं नहीं जानता," उन्होंने कहा। "अब जानूँगा कैसे? वो तो नहीं है।" उन्होंने साइकिल के पहिये को देखा। "पर ये साइकिल जानती है। ये चल पड़ेगी, तो शायद वो भी कहीं से आएगा।"

वो पलटे। मेरी तरफ़ देखा।

"तूने उसको काम पर रखा?" उन्होंने टिंकू की तरफ़ इशारा किया।

"हाँ।"

"अच्छा किया," उन्होंने कहा। "पर एक बात सुन ले। जब किसी का टूटा हुआ तू जोड़े, तो ये मत सोच कि तूने उसका उपकार किया। वो तुझे भी जोड़ता है। तेरे अंदर कोई चीज़ जो तेरे पापा के पास जाकर चुप हो गई है — वो भी उस लड़के के साथ थोड़ी नरम पड़ेगी।"

वो दरवाज़े की तरफ़ चले। फिर रुके। बिना पलटे।

"मैंने उस लड़के को पहले भी देखा है," उन्होंने कहा, टिंकू की तरफ़ इशारा करके। "पीछे की गली में। तेरी दुकान के औज़ार बेचने आया था, तीन महीने पहले। एक चश्मे वाले को। मैंने उसे रोका नहीं। मैंने सोचा, कोई तो हो जो इसे रोके। आज देख लिया। तूने रोका।"

वो चले गए।

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। डरा हुआ।

"उस्ताद, मैं— वो सच है। तीन महीने पहले मैंने एक पेचकस बेचा था। एक चश्मे वाले को। मुझे पैसे चाहिए थे, माँ को बुखार था—"

"टिंकू," मैंने कहा। "अब नहीं। अब कुछ नहीं। अब सिर्फ़ काम है। समझा?"

उसने सिर हिलाया। फिर रिंच को कमीज़ से निकालकर ट्रंक पर रख दिया। सीधी लकीर में। जैसे कोई बुज़ुर्ग अपना हिसाब रखता है।

वो अपनी माँ के बुलावे पर घर गया।

मैं अकेला रह गया। मेरी दुकान के बीच में वो काली साइकिल खड़ी थी, उसका पहिया धीरे-धीरे घूमता रहा — जैसे उस्ताद ने इतनी ज़ोर से घुमाया हो कि उसे रुकने का इंतज़ार हो।

मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली। मुट्ठी में बंद कर लिया। ठंडी थी। फिर गरम हुई।

बजी।

"पहला अंक," घंटी ने कहा। "दस।"

मैं चुप रहा।

"अब सोच," घंटी ने कहा। "इसे किस च

॥

घंटी ने अपना सवाल अधूरा छोड़ दिया था। मैंने उसे मुट्ठी में दबाकर रखा, पर वो फिर चुप हो गई। जैसे कोई बुज़ुर्ग बात कहकर मुँह फेर लेता है और तुम्हें अकेला छोड़ देता है खुद सोचने के लिए।

मैंने घंटी को जेब में रखा। काली साइकिल की तरफ़ देखा। उसका पहिया अब भी धीरे-धीरे घूम रहा था, जैसे रुकने की ज़िद ही न हो।

मैंने हाथ बढ़ाकर उसे रोका। धातु ठंडी थी। उँगलियों पर ग्रीस लग गई।

दुकान का शटर उस वक़्त तक आधा खुला हुआ था। बाहर से गली की आवाज़ें आ रही थीं — कोई बच्चा साइकिल की घंटी बजा रहा था, कहीं पानी का नल छूटा हुआ था, और दूर किसी के घर से भजन की आवाज़ आ रही थी।

मैंने स्टूल खींचकर बैठना चाहा।

तभी टिंकू दौड़ता हुआ अंदर आया।

अरे, वो तो अपनी माँ के बुलावे पर घर गया था ना? मुझे लगा कि वो अब कल सुबह आएगा। पर वो लौट आया था। पसीना-पसीना। घुटने पर पट्टी फिर से खुल गई थी और उसे बाँधे हुए था, जैसे रास्ते में ही उसे सँभाला हो।

"उस्ताद," उसने कहा, साँस फूली हुई। "मैंने माँ को सब बता दिया।"

मैं सीधा हो गया।

"क्या बताया?"

"कि मैं स्कूल नहीं जाता। कि मैं पीपल के पीछे बैठा रहता हूँ। कि मैंने आपकी दुकान से पेचकस बेचा था।"

"और तेरी माँ ने?"

टिंकू ने नीचे देखा। उसके होंठ काँप रहे थे। फिर उसने मुँह उठाया और एक ऐसी बात कही जो मुझे उम्मीद नहीं थी।

"रोई," उसने कहा। "फिर मेरे सिर पर हाथ रखा। बोली — तूने सच बता दिया, यही बहुत है। अब रोज़ दुकान जाया कर। और हाँ, वो लाल वाली कॉपी में जो पैसे हैं, वो रख ले। मैं दवा फिर से शुरू कर दूँगी।"

मुझे कुछ समझ नहीं आया।

"कौन से पैसे?"

"पापा के," उसने धीरे से कहा। "जो उन्होंने किसी काम के लिए बचाए थे। माँ को पता था, पर उसने कभी नहीं छुआ। बोली — तेरे पापा चाहते थे कि तू कुछ बने। मैं वो पैसे नहीं रखूँगी।"

मैं टिंकू को देखता रहा।

इस छोटे से लड़के ने जो किया, वो मैं कई दिनों से नहीं कर पाया था। मैंने अपनी माँ से सच नहीं कहा था — कि मेरे पास घंटी है, कि मैं जोड़ तंत्र चला रहा हूँ, कि मैं अपने ही घर को बचाने की लड़ाई में उलझा हुआ हूँ। सब छुपा रहा था। और ये लड़का एक शाम में सब कह आया।

"उस्ताद?" टिंकू ने कहा। "आप नाराज़ हो?"

"किस बात पर?"

"कि मैंने बिना पूछे माँ को सब बता दिया।"

मैं हँसा। और मुझे हँसी में यह एहसास हुआ कि मेरी आँखें भीग रही हैं। मैंने हाथ से मुँह पोंछा।

"टिंकू," मैंने कहा। "तू स्टूल लेकर यहाँ आ।"

वो आया। मैंने उसे अपने सामने बैठाया।

"आज से तू यहाँ काम पर है। सुबह आठ बजे आएगा। शाम छह बजे जाएगा। महीने के आख़िर में पैसे मिलेंगे। बीच में कुछ भी चाहिए, मुझसे बोलेगा। पर एक बात पक्की —"

उसने कान सीधा किया।

"पहले औज़ार संभालना सीखेगा।"

वो चुप रहा।

"सुन रहा है? औज़ार। रिंच, पेचकस, हथौड़ा, पाना। इनको संभालना सीखना कोई छोटी बात नहीं है। जब तक तू किसी औज़ार को सही जगह पर सही हाथ से नहीं रख सकता, तब तक तू मशीन को छूने लायक़ नहीं है। समझा?"

"समझा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो कुछ था जो मैंने पहले कभी नहीं सुना — कृतज्ञता जैसा कुछ, पर डर से मिला हुआ।

"और सुन," मैंने कहा। "तेरे पापा के पैसे मत छूना। वो माँ के लिए हैं। तेरी मेहनत की कमाई से तू चीज़ें लेगा। अब चला जा, बोर्ड साफ़ कर। बाहर वो टेढ़ा बोर्ड टँगा है — सुबह से देख रहा हूँ, उस पर धूल जमी है। उसे पोंछ।"

टिंकू खुश होकर उठा। उसकी आँखों में वो चमक लौट आई थी जो सुबह थी — हाँ, जब वो रिंच चुराते पकड़ा गया था, तब भी थी, पर उस वक़्त मैंने उसे देखा नहीं था।

वो दौड़कर बाहर गया। मैंने देखा — उसने कद का दामन बढ़ाया, बोर्ड के नीचे खड़ा हुआ, और अपनी कमीज़ की आस्तीन से उसे पोंछने लगा।

मेरी दुकान के बोर्ड पर लिखा था — "अंकुश साइकिल रिपेयरिंग वर्क्स"। टेढ़ा टँगा हुआ। नीचे छोटे अक्षरों में मेरे पापा का नाम भी था, जो अब मिट चुका था।

टिंकू उसे पोंछ रहा था। धूल उड़ रही थी, और वो छींक रहा था, और फिर भी पोंछ रहा था।

मैंने जेब से घंटी निकाली।

उसे हथेली पर रखा। देखा।

फिर धीरे से कहा, जैसे मैं किसी से नहीं, खुद से बोल रहा हूँ, "दस अंक। क्या मिलेगा इनसे?"

घंटी चुप रही।

"बता ना," मैंने कहा। "तूने खुद कहा — पहला अंक, दस। तो इसका कोई फ़ायदा भी होगा।"

घंटी फिर भी चुप।

मैंने उसे एक बार हल्का सा हिलाया।

और तब वो बोली।

"टूटने से पहले की आवाज़," घंटी ने कहा। "दस अंक। चौबीस घंटे पहले पता चल जाएगा कि कौन सी चीज़ टूटने वाली है।"

मेरा दिल धक् से रह गया।

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