The Mysterious Bell – Chapter 46
टिंकू जैसे बिजली के झटके से सीधा हो गया।
उसने पलटकर देखा। मैं दरवाज़े पर खड़ा था।
उसका चेहरा — मैं वो चेहरा कभी नहीं भूलूँगा। वो डर नहीं था। डर से बढ़कर कुछ था। शर्म। शर्म और डर एक साथ। जैसे किसी ने उसका पूरा शरीर गलत साबित कर दिया हो।
उसने रिंच को फर्श पर गिरा दिया। टन्न। फिर उसके हाथ ऊपर उठ गए — जैसे कोई पकड़ा हुआ चोर अपने आप को सामने वाले के हवाले कर देता है, ये सोचकर कि शायद मार कम पड़े।
"उस्ताद—" उसकी आवाज़ फटी हुई थी।
मैं कुछ नहीं बोला।
"मैं— मैं इसे बेचने नहीं ला रहा था," उसने कहा, बहुत जल्दी, शब्द जैसे एक-दूसरे पर गिर रहे हों। "मैं बस— मैं इसे देख रहा था। हाँ, देख रहा था। मैंने सोचा कि अगर पकड़ में आ गई तो कह दूँगा कि मैंने इसे साफ़ करने के लिए उठाया था।"
"टिंकू।"
"मैं झूठ बोल रहा हूँ," उसने तुरंत कहा, और उसकी आवाज़ टूट गई। "मैं इसे बेचने के लिए उठा रहा था।"
मैंने दरवाज़े से हटकर अंदर कदम रखा। मेरे पैरों की आवाज़ सुनकर वो थोड़ा पीछे हटा। उसकी पीठ अलमारी से टकरा गई।
मैं रुक गया। दो कदम की दूरी पर।
"क्यों?" मैंने पूछा।
वो चुप रहा।
"टिंकू, मैंने पूछा क्यों?"
"क्योंकि मेरे पास पैसे नहीं हैं।"
ये इतनी सीधी बात थी कि मैं एक पल के लिए ठिठक गया। जब कोई ऐसी बात कहता है जो सबको पता होती है, तो उसे कहने में सबसे ज़्यादा दर्द होता है। क्योंकि तब तुम्हें ये भी कबूल करना पड़ता है कि तुमने इसे छुपाने की कितनी कोशिश की थी।
"कब से?" मैंने पूछा।
"क्या?"
"कब से पैसे नहीं हैं?"
वो नीचे देखने लगा। उसके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं आई।
"टिंकू, मैं तुझे डाँट नहीं रहा। मैं पूछ रहा हूँ। कब से?"
"छह महीने से," उसने कहा, बहुत धीरे। "जबसे पापा चले गए।"
मैंने पलक नहीं झपकी। मेरे अंदर कुछ ऐसा हुआ जो मैं शब्दों में नहीं बता सकता। मैं टिंकू को रोज़ देखता था। रोज़ वो दुकान पर आता। रोज़ हँसता। रोज़ सवाल पूछता। और मुझे कभी नहीं पता चला कि उसका पापा छह महीने पहले चले गए थे।
"और स्कूल?" मैंने पूछा।
उसने सिर उठाया। उसकी आँखों में पानी था, पर रोया नहीं। रोने से पहले वो आख़िरी हिम्मत जुटा रहा था — जैसे अगर रो दिया, तो सब खत्म।
"स्कूल छोड़ दिया," उसने कहा। "छह महीने पहले। माँ को पता नहीं।"
"माँ को पता नहीं?"
"वो सोचती है मैं रोज़ जाता हूँ। मैं सुबह बस्ता लेकर निकलता हूँ। स्कूल की गली में जाता हूँ। फिर पीछे से मुड़ जाता हूँ। पूरा दिन इधर-उधर।"
"क्यों?"
"क्योंकि स्कूल की फीस नहीं है," उसने कहा। "और माँ बीमार रहती है। दवा चाहिए। मैंने सोचा, कुछ काम करूँगा। कुछ पैसे मिलेंगे। पर कोई काम पर रखता नहीं। कहते हैं, उम्र कम है। कहते हैं, काग़ज़ चाहिए। कहते हैं, बड़ा आदमी भेजो।"
वो फर्श पर बैठ गया। घुटने मोड़कर। सिर झुका। उसके कंधे हिल रहे थे, पर आवाज़ नहीं आ रही थी।
"तो तूने सोचा," मैंने कहा, "कि मेरी रिंच उठा ले, बेच दे, और कुछ दिन का सामान आ जाए।"
उसने सिर हिलाया। "मैंने पहले कभी नहीं चुराया, उस्ताद। मैं कसम खाता हूँ। मैंने सिर्फ़ सोचा—"
"क्यों मुझसे नहीं माँगा?"
वो रुक गया।
"क्यों नहीं कहा, टिंकू को काम चाहिए, टिंकू को पैसे चाहिए?"
"क्योंकि आपके पास भी नहीं हैं," उसने कहा, और ये उसने एक ऐसी आवाज़ में कहा जो मेरे सीने में लगी। "मैंने देखा है, उस्ताद। आप खुद दुकान का किराया नहीं दे पाए, कल। उस सफ़ेद कुर्ते वाले आदमी को। आपकी माँ की दवा महँगी है। आपकी बहन की किताबें हैं। मैंने सोचा — मैं कहूँगा, तो आप पर बोझ बनूँगा। आप मुझे निकाल देंगे।"
"निकाल दूँगा?" मैंने कहा। "मैंने तुझे कभी रखा ही कब था, जो निकालूँगा?"
वो चुप हो गया। उसने ऊपर देखा। मेरी आँखों में देखा।
"मैं आता था," उसने कहा, बहुत धीमे। "रोज़। आप कभी नहीं पूछते थे कि क्यों आता है। बस एक बार बोले थे, 'पानी भर दे।' फिर एक बार बोले थे, 'ये पेचकस पकड़।' मैंने सोचा, मैं यहीं हूँ। मैं काम पर हूँ।"
मुझे कुछ देर कुछ नहीं सूझा।
उसकी बात सच थी, और सच से बड़ा कोई आरोप नहीं होता। मैंने टिंकू को कभी काम पर नहीं रखा था। मैंने उसे बस आने दिया था। बस दुकान में बैठने दिया था। बस कभी नहीं पूछा कि वो कौन है, कहाँ से आता है, क्यों आता है।
और वो एक तेरह साल का लड़का था। छह महीने से घर पर झूठ बोल रहा था, गली-गली घूम रहा था, किसी तरह ज़िंदा रह रहा था।
मैं उसके सामने बैठ गया। फर्श पर। घुटने मोड़कर। मेरी जीन्स घुटनों पर पहले से फटी हुई थी, अब और फटी।
"टिंकू," मैंने कहा, "मुझे कुछ बात बतानी है।"
"हाँ, उस्ताद?"
"मैं चोर नहीं पकड़ता," मैंने कहा। "मैं मरम्मत करता हूँ।"
वो मुझे देखने लगा। उसकी आँखों में पानी, नाक बह रही थी, और मुँह खुला हुआ था — जैसे उसने कुछ ऐसा सुना हो जो उसकी समझ से बाहर हो।
"मैं ये रिंच लेकर आया था," मैंने कहा, और ज़मीन से रिंच उठाई। "तेरे लिए।"
"मेरे लिए?"
"अगर तुझे ज़रूरत है, तो बेचने के लिए नहीं — कमाने के लिए। मेरी दुकान पर। असली काम पर।"
वो बोला नहीं।
"सुबह आठ बजे आना," मैंने कहा। "शाम सात बजे तक। पंचर, चेन, ब्रेक, हवा — सब सीखेगा। महीने के आख़िर में पैसे मिलेंगे। बहुत नहीं, पर इतने कि तेरी माँ की दवा आ जाए। और हाँ—"
मैं रुका। मैंने उसकी आँखों में देखा।
"स्कूल," मैंने कहा। "शाम की पाठशाला। डॉक्टर इसरानी के अस्पताल के पीछे चलती है। सात बजे के बाद। मैं तेरा नाम लिखवा दूँगा। माँ को सच बताना पड़ेगा।"
उसने अपने हाथ से मुँह ढक लिया। कंधे और ज़्यादा हिलने लगे। वो रो पड़ा — पूरी तरह।
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"मैं—" वो फूट-फूटकर रो रहा था। "मैं डर गया था, उस्ताद। मैं रोज़ डरता था। रोज़ सोचता था, कल माँ पूछेगी, तो क्या बोलूँगा।"
"अब नहीं डरेगा," मैंने कहा। "क्योंकि अब झूठ नहीं है।"
वो उठा। आँखें पोंछीं। फिर उसने देखा — मेरी हथेली में रिंच थी।
"ले," मैंने कहा।
"ये— ये महँगी है, उस्ताद।"
"लेनी है या नहीं?"
उसने दोनों हाथों से रिंच पकड़ी। जैसे कोई पुरानी चीज़ पकड़ता है — संभालकर, धीरे, डर से।
"मैं इसे नहीं बेचूँगा," उसने कहा।
"बेचेगा तो नहीं," मैंने कहा। "पर अब गुस्सा मत आना, जब मैं तुझे रोज़ सुबह छह बजे उठाऊँगा।"
उसने हँसने की कोशिश की। रोने के बीच हँसी — वो अजीब सी आवाज़ निकली। फिर उसने रिंच को सीने से लगाया।
"उस्ताद," उसने कहा।
"हाँ।"
"आपने मुझे नहीं निकाला।"
"निकालता तो क्या करता?" मैंने कहा। "मेरे पास इतने औज़ार हैं कि सारी गली के लड़के रख लूँ। बस काम करने वाले चाहिए।"
उसने सिर हिलाया। फिर वो कमरे से बाहर गया, दुकान की तरफ़। मैं पीछे-पीछे आया।
जब हम बाहर आए, दुकान में एक आदमी खड़ा था।
उस्ताद अली बक्श।
वो चुपचाप खड़े थे। उनके हाथ में कोई औज़ार नहीं था। उन्होंने हम दोनों को देखा — पहले मुझे, फिर टिंकू को। टिंकू के हाथ में रिंच देखकर उनके चेहरे पर कुछ नहीं बदला।
वो काली साइकिल के पास गए। बिना कुछ कहे।
उन्होंने साइकिल के पहिये पर हाथ रखा। और धीरे से घुमाया।
पहिया घूमा। धीरे। बिना आवाज़। जैसे पानी में पत्थर फेंकने पर लहरें उठती हैं।
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