The Mysterious Bell – Chapter 45
टिंकू ने बाहर देखा।
"कौन?"
"वो तेरा उस्ताद," शबनम आपा ने कहा। "आज वो बूढ़ों की तरह बात कर रहा था। और जब बूढ़े बात करते हैं तो चाय का पैसा कोई नहीं लेता।"
उन्होंने दोनों गिलास खिड़की पर रख दीं, और ये देखे बिना चली गईं कि हम क्या कर रहे हैं।
मैंने एक गिलास टिंकू को दिया। वो फूँककर पीने लगा, जबकि चाय बहुत गरम थी और उसने अपनी जीभ जला ली।
"आह!"
"धीरे कर," मैंने कहा। "चाय में जल्दबाज़ी नहीं करते। उससे बात करते हैं।"
टिंकू ने धीरे-धीरे पीना शुरू किया।
और मैंने अपनी चाय पीते-पीते साइकिल की तरफ़ देखा।
वो काली साइकिल। अब पूरी जुड़ी हुई। अब खड़ी हुई। मुझे देखती हुई, जैसे कोई पुरानी चीज़ जो पूरी हो गई हो।
मेरी जेब में घंटी गरम हो गई।
फिर बजी।
और इस बार आवाज़ मेरे कान में साफ़ आई।
"पहला अंक मिल गया। दस।"
मैंने चाय का गिलास नीचे रख दिया।
"दस?" मैंने धीरे से पूछा।
घंटी बोली।
"ये उन दोनों का नहीं, तेरा है। आज तक जो भी जोड़ा तुमने, वो सिर्फ़ यहीं आकर रुका था। पहले तुम आए थे, अब तुम्हारा हिस्सा आया है। पहला अंक। दस।"
"क्या मतलब?"
"ये तेरा पहला। बाहर की चीज़ों से नहीं आया, लोगों के बीच से आया। जब रोज़ दुकान पर सुबह सात बजे लड़का आएगा, और तेरे हाथों से औज़ार छीनकर सीखेगा — ये तेरे अपने हाथों की कमाई होगी। इसे तू जिस चीज़ पर खर्च करेगा, वो शुरू हो जाएगा।"
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। वो चाय पीने में लगा था। उसने कुछ सुना नहीं था। उसके लिए ये सिर्फ़ एक दुकान थी, एक गिलास चाय, और उसके उस्ताद का चुप होना।
फिर मेरे कान में घंटी की आवाज़ फिर आई।
"बाकी खर्च क्या, आगे देख लेंगे। पर पहले ये याद रख।"
"क्या?"
"जो तुम आज सुबह उस कमरे में थे, वो तुम थे। जो अब अपनी दुकान में खड़े होकर सोच रहे हो कि पैसे कहाँ से आएँ, ये तुम्ही हो। कोई बदल नहीं गया। कोई जादू नहीं हुआ। सिर्फ़ दो लोगों ने एक बात कही, और उनका रास्ता जुड़ गया। इसे तुम अपने हाथ की मेहनत मत कहो। इसे उनका तोहफ़ा कहो।"
मैं चुप हो गया।
"और अब सोच," घंटी ने कहा, "इस पहले अंक को किस चीज़ पर खर्च करेगा।"
मैंने उसकी आवाज़ को अपने अंदर जाने दिया। खर्च करना। दस अंक। मेरे पास पहली बार कुछ था। और मेरे पास पहली बार ये भी था कि मैं जानता था इसका इस्तेमाल कैसे होता है — या मैं यही सोचता था।
दस अंक में मैं क्या खरीद सकता था? टूटी चीज़ की आवाज़ — चौबीस घंटे पहले पता चल जाए कि क्या टूटने वाला है। बस दस अंक।
मेरी दुकान के बाहर से आवाज़ आई।
"टिंकू! टिंकू!"
उसकी माँ थी।
टिंकू ने चाय का गिलास मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"रख लो," मैंने कहा।
"नहीं," उसने कहा। "आधी छोड़ना नहीं चाहिए। माँ कहती है पूरी पीना।"
वो खड़ा हो गया। दौड़कर बाहर गया।
मैं अकेला रह गया। मेरी दुकान के बीच में वो काली साइकिल खड़ी थी, उसका पहिया अब भी धीरे-धीरे घूम रहा था — जैसे उस्ताद ने इतनी ज़ोर से घुमाया हो कि उसे रुकने का इंतज़ार हो। और मेरी जेब में पीतल की घंटी ठंडी थी।
फिर वो ठंडी नहीं रही।
गरम हो गई।
और बजी।
"अंकुश।"
"हाँ।"
"ये अंक करने से पहले एक बात याद रख। जब तक तू किसी को खुद से जोड़ने की हिम्मत नहीं करेगा, तेरे हाथ में बाकी अंक बस काग़ज़ होंगे। जो चीज़ तू आज सीख रहा है, वो किताबों में नहीं लिखी होती। वो सिर्फ़ उस कमरे में मिली है, जहाँ दो भाई रोए थे।"
मैंने अपना हाथ जेब से बाहर निकाला और घंटी को मुट्ठी में बंद कर लिया।
"कहाँ खर्च करूँ?" मैंने पूछा। "उसी की तरफ़ इशारा कर रही है तू?"
"मैं किसी तरफ़ इशारा नहीं करती," घंटी ने कहा। "मैं सिर्फ़ गिनती बताती हूँ। तेरे हाथ में दस हैं। तेरे पास चालीस, सत्तर, सौ का इंतज़ार है। तेरे पास टूटी चीज़ों की सूची बड़ी है। पर तूने आज एक फ़ैसला करके दिखाया है। तेरे पास एक लड़का काम पर रखा है। और वो तेरे अपने जैसा ही भूखा है। सोच, इस दस अंक से पहले क्या करना चाहिए।"
मैंने घंटी को जेब से बाहर निकाला। मेरी हथेली में रखा। वो पीतल की, पुरानी, थोड़ी काली पड़ी हुई।
फिर मैफिर मैंने घंटी को उँगलियों में घुमाया।
हल्की सी खड़खड़ाहट हुई। पीतल ठंडा था, पर उसके अंदर कुछ था — जैसे अभी-अभी कोई बात कही गई हो और उसकी गर्मी अभी बची हो।
"तूने कहा," मैंने धीरे से बोला, "कि मेरे पास एक लड़का काम पर रखा है और वो भूखा है। पर तूने ये नहीं कहा कि मैं उसके लिए क्या करूँ।"
घंटी चुप रही।
"और ये भी नहीं कहा कि उसके अंदर क्या टूटा है।"
फिर भी कोई जवाब नहीं। बस मेरी हथेली पर उसका वज़न — हल्का, पर बोझल।
मैंने घंटी को लकड़ी के तख्त पर रख दिया। दुकान में शाम की रोशनी आ रही थी — बाहर से बल्ब की पीली, थोड़ी झपकती हुई। सामने काली साइकिल खड़ी थी। उसका पहिया अब नहीं घूम रहा था। स्थिर। जैसे किसी बुज़ुर्ग की साँस रुक गई हो।
मैंने उस साइकिल के हैंडल पर हाथ रखा। वो खाली लकड़ी का ब्रैकेट। मेरी जंग लगी साइकिल पर भी वैसा ही था। दो खाली जगहें। दो चीज़ें, जो वहाँ नहीं थीं — पर होनी चाहिए थीं।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। मेरी जंग लगी साइकिल के हैंडल से उतारी हुई घंटी वहाँ थी।
"तू किसकी है?" मैंने बुदबुदाया। "मेरी, या इसकी?"
घंटी बोलती तो शायद कहती — दोनों की नहीं। पर वो चुप थी।
मैंने साइकिल की सीट पर बैठकर टिंकू के बारे में सोचना शुरू किया।
टिंकू। तेरह साल का। घुटने पर पट्टी, आँखों में वो तेज़ी, जो बड़ी उम्र में भी कम लोगों के पास होती है। जब वो पहली बार दुकान पर आया था, तब मैंने उसे सिर्फ़ एक काम दिया था — पंचर वाले टब में पानी भरना। उसने ऐसे भरा था जैसे सारी गली का पानी वही भर रहा हो। हर बार पूछता — "उस्ताद, ये पेचकस किसका है?" "उस्ताद, ये रिंच क्यों दो तरफ़ से खुलती है?" "उस्ताद, तुम रात में सोते हो या काम करते हो?"
मैंने हर सवाल के जवाब में एक-दो शब्द दिए थे। कभी कुछ सिखाया नहीं।
और आज घंटी ने कहा — "तेरे पास एक लड़का काम पर रखा है।"
काम पर रखा है? मैंने उसे कब रखा? मैंने तो उसे कभी एक पैसा नहीं दिया। कभी एक काम नहीं सौंपा, सिवा पानी भरने के। मैंने उसे कभी पूछा भी नहीं कि वो स्कूल जाता है या नहीं। कि घर में कौन है। कि वो यहाँ क्यों आता है।
अब सोचकर लगा — कितना कम जानता हूँ मैं उस लड़के को। और वो मुझे "उस्ताद" कहता है।
मैं उठा। दुकान के बाहर आया। गली में शाम की आख़िरी रोशनी थी। शबनम आपा की गुमटी में भाप उठ रही थी। उस्ताद की बंद दुकान से अब टिक-टिक नहीं आ रही थी। पीपल के नीचे चबूतरी पर बुज़ुर्ग अपनी चादरें समेट रहे थे।
टिंकू नहीं दिख रहा था।
मैं वापस अंदर आया। कुछ देर काली साइकिल के पास खड़ा रहा। फिर मैंने दुकान के पीछे वाले कमरे की तरफ़ देखा। दरवाज़ा खुला था। बल्ब गुनगुना रहा था। और उस बल्ब की हल्की पीली रोशनी में मुझे कुछ दिखा — चारपाई के पास, लोहे की अलमारी की तरफ़, एक परछाई हिली।
मैंने कदम धीमे किए।
दरवाज़े की चौखट पर खड़ा होकर मैंने अंदर झाँका।
टिंकू था।
वो अलमारी के पास झुका हुआ था। उसके हाथ में मेरी नई रिंच थी — वो रिंच जो कल ही मैंने ट्रंक पर रखी थी। उसने उसे कमीज़ के अंदर खोंसने की कोशिश की, पर रिंच बड़ी थी। वो फिसल गई। धातु की आवाज़ हुई — टक।
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