The Mysterious Bell – Chapter 44
पीछे की तरफ़ से साइकिल लाकर खींच रहे थे। वो काली साइकिल। पूरी। दोनों पहियों पर।
मैं खड़ा हो गया। "उस्ताद–"
उन्होंने बिना कुछ कहे साइकिल को दुकान के बीच लाकर खड़ा कर दिया। फिर अपनी जेब से एक चाबी निकाली — वही छोटी जंग लगी चाबी जो बैग में मिली थी — और मुझे चुपचाप दी। फिर पहिये को घुमाया।
पहिया शांत, चिकना, बिना आवाज़ घूमने लगा। बॉल बियरिंग की वो चरचराहट नहीं थी। चेन शांत थी, उस पर ज़ंग का एक भी निशान नहीं।
हम तीनों — मैं, टिंकू, और उस्ताद — चुपचाप उस पहिये को घूमते देखते रहे।
फिर उस्ताद ने पहिया रोक दिया। साइकिल की सीट पर हाथ फेरा और बाहर जाने लगे।
"उस्ताद," मैंने कहा, "आप अंदर आए। आपने कुछ नहीं पूछा। आपको कैसे पता कि—"
"मुझे पता नहीं था," उन्होंने कहा, बिना पलटे। "मैंने बस सुना कि तेरी दुकान से दो आवाज़ें आईं। एक जो टूटने की थी, और एक जो जुड़ने की। दोनों साथ आईं।"
वो दरवाज़े तक गए। फिर वहीं रुककर बोले, "पहिया घूमता रहे, तो चीज़ें टिकती हैं। रुक जाए, तो जंग लगती हैं। इंसान भी वही है।"
और वो चले गए।
उनके जाने के बाद, कमरे में बस मैं, टिंकू, और वो काली साइकिल बची।
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा।
"उस्ताद," वो बोला, "ये साइकिल हमारी है?"
"नहीं," मैंने कहा। "ये उन दोनों की है।"
"तो फिर यहाँ क्यों है?"
"क्योंकि अभी उनके पास रखने की जगह नहीं है," मैंने कहा। "और क्योंकि उस्ताद ने कहा था कि अंदर जो टूटा है, उसे पहले किसी और कमरे में जोड़ना पड़ेगा।"
टिंकू ने साइकिल के हैंडल पर हाथ फेरा, जहाँ वो खाली लकड़ी का ब्रैकेट था।
"उस्ताद," वो बोला, "इसके घंटी वाली जगह…"
"हाँ," मैंने कहा। "मैंने भी देखा।"
"उसी जैसी है?"
"बिल्कुल।"
टिंकू ने अपना हाथ वहाँ से हटा लिया, जैसे छूने पर कुछ होने का डर हो।
और ठीक उसी वक़्त, मेरी जेब से पीतल की घंटी बजी।
एक छोटी, साफ़ आवाज़। कमरे की चुप्पी में फैलती हुई।
टिंकू ने चारों तरफ़ देखा। "ये कौन बजा?"
"मैं," मैंने कहा। "मेरी जेब में है।"
"जेब में है तो बजी कैसे?"
"अच्छा सवाल है," मैंने कहा। "पर इसका जवाब मुझे भी नहीं पता।"
टिंकू ने घंटी को देखने के लिए हाथ बढ़ाया, फिर पीछे हट गया।
"मुझे मत देना," उसने कहा। "मुझे नहीं छूना।"
"क्यों?"
"क्योंकि मैंने आज चोरी की। मेरे हाथ अभी अच्छे नहीं हैं।"
मैंने उसे हैरानी से देखा। ये इतनी छोटी उम्र में इतनी साफ़ बात कैसे कर सकता है।
"ठीक है," मैंने कहा, और घंटी जेब में ही रहने दी।
घंटी ने फिर बजा।
और उस बार जब बजी, तो मेरे कान में आवाज़ आई। वो आवाज़ जो मैंने कुछ दिन पहले पहली बार सुनी थी।
"पहला अंक।"
मेरा दिल धक् से रह गया। मैंने अपना हाथ थाम लिया।
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। "क्या हुआ?"
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "जरा सिर घूम गया।"
"तुम सच नहीं बोल रहे हो," उसने कहा।
"तेरी नज़र बहुत तेज़ होती जा रही है," मैंने कहा। "ये ठीक नहीं है।"
टिंकू हँसा, और मैंने उसके हँसने का फ़ायदा उठाकर कमरे से बाहर आ गया। दुकान की तरफ़।
और जब मैं दुकान की तरफ़ पहुँचा, तो मेरे पैर रुक गए।
दुकान के कोने में, मेरे औज़ारों के ट्रंक के पास, अलमारी थोड़ी खुली हुई थी। और ट्रंक की तरफ़ जाते हुए, टिंकू की परछाई जमीन पर पड़ रही थी।
नहीं।
वो परछाई टिंकू की नहीं थी।
उसकी कमीज़ मेरी जैसी थी, पर कद छोटा था। और उसके हाथ में कुछ चमक रहा था।
मैंने तेज़ी से दुकान में क़दम रखा।
"रुक।"
वो जम गया।
वो टिंकू था।
मेरे हाथ में पीतल की घंटी थी, और उसके हाथ में मेरी नई रिंच।
वो मेरी तरफ़ पलटा, और उसके चेहरे पर वो डर फैल गया जो आदमी अपने सबसे बुरे पल में महसूस करता है। गिराए जाने का डर, पकड़े जाने का डर, शर्म का डर।
"टिंकू," मैंने कहा।
"मैं–" उसने रिंच को नीचे कर लिया। "मैं लेने नहीं आया था।"
"तो?"
"मैं बस देख रहा था। बस छू रहा था।"
"मेरे हाथ में जो घंटी है ना," मैंने धीरे से कहा, "वो झूठ पकड़ती है। तेरी बात सुनकर भी वो चुप है। इसका मतलब क्या है?"
उसने अपना सिर झुका लिया।
फिर वो फूट पड़ा।
"उस्ताद, मुझे काम चाहिए।"
"काम? तेरे पास काम है।"
"और नहीं, उस्ताद। और ज़्यादा। मैं स्कूल छोड़ चुका हूँ। माँ को नहीं बताया। तीन हफ़्ते से नहीं गया। मास्टर जी ने दो बार बुलाया, मैंने कहा बुखार है। तीसरी बार तो कहा कि माँ बीमार है। अब क्या कहूँ?"
मैंने उसे देखा। उसकी आँखों में वो धुआँ था जो मैं अपनी आँखों में नहीं देखना चाहता था।
"क्यों छोड़ा?"
"क्योंकि किताब के पैसे नहीं हैं," उसने कहा। "और उस्ताद, मैं भीख नहीं माँगना चाहता था। तुमसे भी नहीं।"
ये सुनकर मेरी छाती में कुछ हुआ। कुछ जो मैं नाम नहीं दे सकता, पर वो वही था जो मैंने आज से पहले सुबह की अपनी जेब में महसूस किया था — यही जानते हुए कि जवाब मेरे पास नहीं है।
मैं उसके पास गया। उसके हाथ से रिंच लिया।
"ये रिंच तेरी है," मैंने कहा।
"पर मैंने चोरी की।"
"तूने इस रिंच से चोरी की? नहीं। तूने इस रिंच को उठाया। उठाना चोरी नहीं होता, टिंकू। चुपचाप रखना चोरी होता। और तू चुपचाप रख नहीं रहा था। तू मेरे सामने खड़ा था। मैंने तुझे देख लिया।"
"तुमने पीछे से देखा।"
"मैंने पीछे से देखा," मैंने कहा, "क्योंकि मैं दुकान की तरफ़ आ रहा था। और तू मेरी दुकान में था। तेरा वहाँ होना चोरी नहीं है, टिंकू। तेरा वहाँ रोज़ होना, मेरे बिना, यही तो मेरी कमाई है।"
उसकी आँखें फिर भर आईं।
"उस्ताद," वो बोला, "मैं स्कूल वापस जाना चाहता हूँ। पर मेरे पास कोई रास्ता नहीं है।"
मैंने उसे कंधे से पकड़ा और खींचकर उस स्टूल पर बैठा दिया जिस पर मैं खुद बैठता हूँ।
"मेरे पास एक रास्ता है," मैंने कहा। "और वो तेरे सामने है, तुझे दिखता नहीं।"
"क्या?"
"तू रोज़ सुबह सात बजे मेरी दुकान पर आएगा। दो घंटे औज़ार साफ़ करेगा। दो घंटे पंचर लगाना सीखेगा। फिर नौ बजे स्कूल जाएगा।"
"पर स्कूल…"
"मैंने कब कहा कि तुझे स्कूल जाने के लिए पैसे चाहिए? तेरे स्कूल के मास्टर मेरे पास साइकिल लाते हैं, टिंकू। उनका एक बटन बिगड़ा पंखा मेरे पास पड़ा है। उनकी साइकिल की चेन महीने में एक बार टूटती है। मैं उनसे बात करूँगा।"
"उस्ताद—"
"रुक। मैं बात करूँगा ये मैंने कहा, और मैं ये भी कह रहा हूँ कि हो सकता है वो न मानें। पर मैं माँ से भी बात करूँगा। तेरी माँ। उससे कहूँगा कि पहले तीन महीने का जो भी खर्च है, चाय के पैसे में जोड़ देना। और तेरे पास जवाब होगा। कोई बहाना नहीं।"
टिंकू ने अपना मुँह खोला। फिर बंद कर दिया। फिर बोला, "तुम मेरी माँ से डरते नहीं हो?"
"डरता हूँ," मैंने कहा। "पर शबनम आपा से ज़्यादा नहीं। और आज सुबह शबनम आपा ने मुझे एक चाय के पैसे में छोड़ दिया। इसे कहते हैं रोज़गार।"
टिंकू ने अपनी आँखें पोंछीं, और इस बार वो हँसा। पूरे दिन की दूसरी हँसी। उसकी नाक से बजाय आँखों से निकल रही थी, पर हँसी हँसी थी।
उसी वक़्त दुकान के बाहर से आवाज़ आई।
"अंकुश भाई, चाय!"
शबनम आपा की आवाज़ थी। मैंने बाहर झाँका। वो गुमटी से मुड़कर दुकान की तरफ़ देख रही थी और हाथ में दो गिलास थीं।
"आपा, आज पैसे नहीं हैं।"
"पैसे कल के लिए," उन्होंने कहा। "आज मैंने तेरे दोस्त को देखा है।"
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