The Mysterious Bell – Chapter 469
मैंने अपनी उँगली काग़ज़ के किनारे पर रखी। ये वही काग़ज़ नहीं था जो पाँच साल पहले किसी अख़बार में छपा था। ये उसका एक हिस्सा था। नीचे की तरफ़ से आधा कटा हुआ। जिसने काटा, उसने ऊपर का हिस्सा रखा और नीचे का फेंक दिया। या उलटा।
और जो भी हो, इसे छिपाने वाले ने इसे स्टोर की सबसे ऊँची शेल्फ़ पर रखा था। जहाँ सिर्फ़ वही पहुँच सकता है जिसके पास चाबी हो, या जो सीढ़ी लेकर आए।
मेरी तरफ़ से सबसे पहले निकला, "मीरा।"
वो अपनी चाय से ऊपर देख रही थी और मेरे चेहरे पर कुछ ऐसा देखा जिससे उसका हाथ रुक गया।
उसने काग़ज़ देखा। फिर मेरी तरफ़ देखा। फिर फिर काग़ज़ देखा।
मैंने कुछ पूछा नहीं।
बच्चे गुमटी के पीछे खड़े थे। टिंकू ने मुझे देखा और उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया, जैसे उसे लगा हो कि उसने कोई गलती कर दी है।
मीरा बेंच से उठी।
धीरे से। जैसे कोई बीमार आदमी उठता है।
उसने मेरे हाथ से काग़ज़ लिया और बहुत देर तक उसे देखती रही। उसकी उँगली शीर्षक के आधे कटे हिस्से पर रुकी, फिर नीचे चार शब्दों पर।
शबनम आपा ने कहा, "क्या हुआ? तेरा चेहरा…"
मीरा ने काग़ज़ को सीने से लगाया और फिर नीचे कर दिया।
और उसने बिना किसी की तरफ़ देखे, इतनी साफ़ आवाज़ में कहा कि गुमटी की केतली भी चुप हो गई —
"ये खबर अधूरी थी। और मैंने इसे छाप दिया था।"
॥
गुमटी में केतली की सीटी बंद हो गई थी। मीरा ने काग़ज़ सीने से लगाया हुआ था और उसकी साँस ऐसे चल रही थी जैसे कोई बहुत दूर से दौड़कर आया हो और रुका न हो।
मैंने कुछ नहीं पूछा। मैंने सिर्फ़ उसकी कलाई पकड़ी और कहा, "यहाँ खड़े होकर नहीं। पीछे चलो।"
शबनम आपा ने एक पल को चिमटी उठाई, जैसे कुछ कहेंगी, फिर उसे धीरे से थाली पर रख दिया। उन्होंने बिना कुछ पूछे दो गिलास चाय भरी, एक में चीनी कम, क्योंकि उन्हें याद था कि मीरा चीनी कम लेती है, और मेरी तरफ़ देखकर बस इतना कहा, "पीछे के कमरे में बैठा दे। कोई नहीं आएगा। मैं बाहर हूँ।"
बच्चे गुमटी के किनारे खड़े थे। चारों के चेहरे ऐसे थे जैसे उन्होंने कोई अपराध कर दिया हो। टिंकू सबसे आगे था और उसकी आँखें मुझसे मिलाते ही नीचे हो गईं।
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। "तूने कुछ ग़लत नहीं किया। जो मिला, वो लाकर दे दिया। बाकी मेरा काम है।"
वो कुछ कहना चाहता था। उसके होंठ हिले, फिर रुक गए।
"जाओ, सानिया के घर के सामने बैठो। कोई काग़ज़ चिपकाने आए तो आवाज़ लगाना।"
चारों भाग गए। और मैं मीरा को लेकर दुकान के पीछे वाले कमरे में आया।
उस कमरे में हमेशा एक ही गंध रहती है। ग्रीस की, केरोसिन की, पुराने रबर की और उस लोहे की अलमारी की जिसमें मेरे कपड़े और माँ की दी हुई एक पुरानी कंबल रखी है। बल्ब आज भी गुनगुना रहा था, जैसे बूढ़ा आदमी अपने आप से कोई पुरानी कहानी दोहरा रहा हो।
मैंने चारपाई की तरफ़ इशारा किया।
मीरा बैठी नहीं। वो पहले दीवार से टिकी, फिर धीरे-धीरे फ़र्श पर बैठ गई, चारपाई के पास, घुटने मोड़कर। काग़ज़ उसने अब भी हाथ में रखा हुआ था, और उसकी उँगली उस आधे कटे शीर्षक पर थी।
मैंने औज़ारों का ट्रंक खींचा और उसके सामने बैठ गया। बीच में एक पुरानी साइकिल की चेन पड़ी थी, जिसे मैं सुबह से छोड़ आया था। मैंने उसे उठाया और बिना देखे साफ़ करने लगा। मुझे पता था कि जब कोई अपनी बात कहने बैठता है, तो उसे जगह चाहिए। सीधा सवाल नहीं, थोड़ा वक़्त चाहिए। चेन साफ़ करने का बहाना मुझे सबसे अच्छा लगता है।
चाय की भाप दोनों गिलासों से ऊपर जा रही थी।
आधी चाय ठंडी हो गई। फिर मैंने चेन रख दी।
"मीरा।"
वो उठी नहीं। बस आँखें उठाईं।
"मैं तुझे कुछ नहीं कह रहा। न डाँट रहा हूँ, न पूछ रहा हूँ कि तूने क्यों छिपाया। मैं सिर्फ़ इतना जानना चाहता हूँ कि पाँच साल पहले उस कमरे में क्या हुआ था। जिस कमरे में तू बैठी थी, उस कमरे में मैं नहीं था। इसलिए मैं अंदाज़ा नहीं लगाऊँगा। तू बता।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। बहुत देर तक। जैसे तय कर रही हो कि ये आदमी सुनने के बाद क्या करेगा।
फिर उसने गिलास उठाया, एक घूँट लिया, और मुँह बनाया।
"चीनी कम है।"
"आपा ने तेरे लिए ही कम रखी है।"
वो हँसी नहीं। बस गिलास नीचे रख दिया और अपने घुटनों पर हाथ रखकर बोली —
"मैं उस वक़्त तेईस साल की थी।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"नई नौकरी थी। नए बाज़ार के उस दफ़्तर में, जिसकी खिड़कियों पर पीली पुट्टी चढ़ी थी और जिसमें बारह आदमी बैठते थे, जिनमें से असली काम चार करते थे। मैं सबसे छोटी थी। मुझे कहा गया था कि पहले महीने में मैं सिर्फ़ छोटी खबरें लिखूँगी — किसी का भाषण, किसी का दान, किसी की नई दुकान का उद्घाटन। जिसे कोई नहीं पढ़ता।"
उसने घुटनों को और कस लिया।
"और मैं उस पहले महीने में एक ही चीज़ से डरती थी — कि मुझे निकाल न दिया जाए। हम चार भाई-बहन हैं। माँ रोज़ पूछती थी कि नौकरी पक्की है ना। और मैं रोज़ हाँ कहती थी, हालाँकि मुझे नहीं पता था।"
मैंने गिलास उसकी तरफ़ सरका दिया।
"फिर एक दिन एक आदमी आया। सफ़ेद कुर्ता, नीली स्याही वाली कलम। उसने मेरी मेज़ पर एक पन्ना रखा और कहा — यह देख लो, बाद में कहना बाद में आया था। मैंने वो पन्ना पढ़ा।"
वो रुकी। उसकी उँगली फ़र्श पर कुछ लिख रही थी, जो काग़ज़ पर नहीं था।
"उस पन्ने पर स्कूल की ज़मीन का हिसाब था। और नीचे एक नीली गोल मुहर थी। और मुहर के ऊपर एक नाम। मैंने वो नाम पढ़ा और मेरे हाथ ठंडे हो गए। क्योंकि वो नाम उस आदमी का था जिसकी तस्वीर शहर में हर तीसरी दीवार पर हाथ जोड़े हुए लगी थी।"
"रणवीर भारद्वाज।"
उसने सिर हिलाया। "उस वक़्त मैंने उसका नाम ज़ोर से नहीं लिया था। ज़ोर से लेने की हिम्मत अभी भी नहीं है, पर अब कम है।"
मैंने चेन फिर उठाई। "फिर?"
"फिर मैंने वो पन्ना अपने संपादक को दिखाया। मैं उस दिन बहुत खुश थी। मुझे लगा कि मैंने बड़ी खबर पकड़ ली है। मुझे लगा कि अब मेरा नाम छपेगा। मैंने सोचा था कि वो मुझे गले लगाएँगे।"
वो हँसी। छोटी, सूखी हँसी।
"उन्होंने पन्ना देखा, फिर मेरी तरफ़ देखा, फिर पन्ना वापस मेरे हाथ में रख दिया और कहा — सबूत पक्का है?"
"और?"
"मैंने कहा, मुहर है। उन्होंने कहा — मुहर काग़ज़ पर होती है, बात में नहीं। तेरे पास ये काग़ज़ कहाँ से आया, किसने दिया, वो आदमी गवाही देगा या नहीं, ये तेरे पास है? मैं चुप हो गई। मेरे पास कुछ नहीं था। सिर्फ़ एक पन्ना था और एक आदमी जो कहीं खो गया था।"
"तो खबर रुक गई।"
"खबर नहीं रुकी, अंकुश। खबर रुकी नहीं थी। मैं रुक गई थी।"
उसने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आवाज़ थोड़ी साफ़ हुई, जैसे कोई पुरानी गाँठ खुल रही हो।
"उसी हफ़्ते मुझे रात में फोन आया। कोई औरत थी या आदमी, पता नहीं। आवाज़ धीमी थी, जैसे मुँह कपड़े से ढका हो। उसने कहा — बेटी, तू नई है। नाम अभी अच्छा है। मत गँवा। और फोन कट गया।"
"तूने किसी को बताया?"
"किसे बताती? माँ को बताती तो वो रात भर रोती और सुबह कहती कि नौकरी छोड़ दे। संपादक को बताती तो वो कहते कि देखा, मैंने कहा था। और मैं अकेली थी। इसलिए मैंने वो पन्ना अपनी कॉपी के बीच रख दिया और सोच लिया कि थोड़ा और सबूत जुटाकर छापूँगी।"
"कितना और सबूत?"
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