The Mysterious Bell – Chapter 467
"तो हस्ताक्षर करा दो।"
"वो दोपहर दो बजे आएंगे।" उसने रजिस्टर में कुछ लिखा और पन्ना पलट दिया।
मीरा मेरे पीछे खड़ी थी। उसने कहा, "अब से पहले इस नकल के बिना मैं घर नहीं जाऊँगी।"
कर्मचारी ने चश्मे के ऊपर से उसकी तरफ़ देखा। "घर न जाना आपका अपना फ़ैसला है, मैडम। दफ़्तार में दो बजे के बाद ही खुलेगा।"
बाहर आकर मीरा ने बैग को सीने से लगाया और कहा, "मुझे ये दफ़्तार भारद्वाज भवन से भी ज़्यादा पसंद नहीं आया।"
"यहाँ लाल अंगूठा नहीं लगता, बस पंद्रह रुपये लगते हैं। ये तो सस्ता सौदा है।"
उसने मेरी तरफ़ देखा, और पहली बार उस सुबह वो लगभग हँसी।
स्कूल का आँगन खाली था। फुर्सत के दिन भी बच्चे आ जाते हैं — पतंग के लिए, संतरे के छिलके के लिए, और सबसे बड़े कारण के लिए, जो उन्हें कभी नहीं बताया जाता: घर से बाहर की हवा। गेट के पास पाँच जोड़ी चप्पलें थीं और एक जोड़ी किसी ने उतारकर आधी रखी थी, जैसे भागते वक़्त याद आया हो।
टिंकू सीढ़ी के नीचे बैठा जूते का फीता बाँध रहा था। पास में सानिया खड़ी थी, हाथ कमर पर। गुड्डू और रफ़ीक़ ने चिंटू को अपने बीच में खड़ा कर रखा था, जैसे वो कोई गुप्त योजना वाला पुराना नक्शा हो।
"उस्ताद!" टिंकू दौड़कर आया, फीता आधा बँधा। "रामलाल बाबा ने कहा था कि पुराने काग़ज़ और कापियाँ पीछे के स्टोर में जूट की रस्सी से बँधी पड़ी हैं।"
"तो?"
"तो हम देख आएँ?"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो अपने फ़ोन में कुछ देख रही थी, पर उसका एक कान हमारी तरफ़ था।
"जाओ," मैंने कहा। "पर सुनो — कुछ तोड़ना नहीं, कुछ बाहर नहीं ले जाना, और किसी बंद दराज़ में हाथ नहीं डालना।"
"एक दराज़ बंद है," टिंकू ने कहा।
"तो उसी में तुम्हारी किस्मत बंद है। सीधे हाथ आए तो लाओ, और अगर उसमें कुछ ऐसा हो जो तुम लोगों की समझ में न आए, तो उसे यहीं रहने दो और मुझे आकर बताओ।"
"उस्ताद," चिंटू ने कहा, "वो स्टोर में भूत है।"
"है तो बहुत अच्छा। तुम पाँच जाओ और छह हो जाओ। अब वहाँ गिनती में कोई दिक्कत नहीं होगी।"
गुड्डू हँस पड़ा। चिंटू का चेहरा बिगड़ गया।
"भूत तुमसे डरेगा," सानिया ने कहा और उसकी पीठ पर हल्की चोट की। "चल।"
पाँचों दौड़ पड़े और उनकी चप्पलों की आवाज़ जल्दी ही स्कूल के पीछे वाली गली में मिल गई।
स्टोर का दरवाज़ा पुराना था, और उसकी कुंडी को खोलने में टिंकू को अपना पूरा वज़न लगाना पड़ा। अंदर से एक ऐसी गंध निकली जो किताबों की दुकान और बारिश आने से पहले वाली हवा से मिलकर बनती है — पुराने काग़ज़, सीलन, धूल, और चूहे के घर की गंध।
अंदर अंधेरा था, सिवाय एक ऊँची जालीदार खिड़की के, जिससे एक तिरछी रोशनी आकर ज़मीन पर आयत बना रही थी। उस आयत के अंदर धूल के कण नाच रहे थे, हज़ारों, जैसे किसी दर्ज़ी की दुकान से कपड़े के रेशे उड़ रहे हों।
"आह!" रफ़ीक़ ने नाक दबाई। "यहाँ तो कबाड़ी बूढ़े की दुकान भी जन्नत लगेगी।"
"यही तो जगह है," टिंकू ने कहा और अंदर घुसा।
तोड़ी हुई कुर्सियाँ दीवार के साथ टिकी थीं, जैसे एक पुरानी क्लास के बच्चे सज़ा में खड़े हों। एक कुर्सी की टाँग निकलकर अलग पड़ी थी। एक कोने में लोहे की सीढ़ी थी जिस पर ज़ंग ने हरे रंग की परत बना दी थी। ऊपर, किसी चीज़ की ढलकी हुई आलमारी से कुछ तार लटक रहे थे, और उनमें से एक पर एक पुराना गमछा लिपटा था।
"सानिया," टिंकू ने धीमी आवाज़ में कहा, "तू दाई तरफ़ देख। गुड्डू, बाईं तरफ़। रफ़ीक़, ऊपर की शेल्फ़। चिंटू, तू दरवाज़े के पास खड़ा रह — अगर कोई आए तो छींकना।"
"मैं क्या करूँगा यहाँ?"
"तू खड़ा रहेगा," सानिया ने कहा, "क्योंकि तू सबसे तेज़ भागता है।"
"और सबसे ज़्यादा डरता है," गुड्डू ने कहा। "एक छींक में दोनों काम हो जाएंगे।"
चिंटू ने उसकी तरफ़ जीभ निकाली और दरवाज़े के पास डटकर खड़ा हो गया, बाहों को बाँधकर, जैसे वो स्कूल का चौकीदार हो और सारा स्टोर उसको सौंपा गया हो।
टिंकू जूट की रस्सी वाले बंडलों की तरफ़ बढ़ा। रस्सी मुरझाई हुई थी, रंग गया हुआ, छूने पर हाथ में पीली धूल छोड़ रही थी। उसने पहला बंडल खींचा। अंदर पुराने रजिस्टर थे, जिल्द उखड़ी हुई, किनारे चूहे खा चुके थे। दूसरे में परीक्षा के काग़ज़ — पुराने साल के, काले धब्बे लगे, किसी का नाम आधा दिख रहा था।
"यहाँ तो सब बेकार पड़ा है," सानिया ने कहा, और उसकी आवाज़ में निराशा थी। "किसी ने पाँच साल से इन काग़ज़ों को नहीं छुआ।"
"तभी तो स्टोर कहते हैं," रफ़ीक़ ने कहा। "स्टोर का मतलब — जो किसी काम का नहीं, वो यहाँ रख दिया। जैसे मेरे घर में टूटा पंखा।"
"तेरे घर में टूटा पंखा है?" गुड्डू ने पूछा।
"हाँ। बारह साल से। मेरी अम्मी कहती हैं वो ठीक हो जाएगा।"
टिंकू ने तीसरा बंडल खींचा और वो रस्सी से टूटकर अलग हो गया। अंदर से अख़बारों का ढेर था, जमे हुए, आपस में चिपके हुए, जैसे बारिश में भीगकर सूख गए हों। कुछ पन्ने ज़मीन पर फिसलकर गिर गए और उनकी आवाज़ से चिंटू उछल पड़ा।
"फिर से छींक!" गुड्डू ने कहा।
"मैं तो कुछ नहीं बोल रहा!"
"तभी तो तू ठीक से काम नहीं कर रहा।"
"चुप करो दोनों," सानिया ने कहा। "टिंकू भैया को सोचने दो।"
टिंकू घुटनों के बल बैठ गया और अख़बारों को उलटने लगा। पन्ने ज़मीन पर खुलते और उनसे धूल उड़ती, सूरज की आयत में फैलती, और कमरा एक पल को और भी पुराना लगने लगता।
"ये सब पुराने अख़बार हैं," उसने कहा। "इन पर तारीखें भी हैं। कोई पाँच साल पुराना, कोई छह।"
"किसी में कोई खबर?" चिंटू ने दरवाज़े से पूछा, बिना मुड़े।
"खबरें ही तो खबरें हैं," टिंकू ने कहा। "पता नहीं कौन सी वाली चाहिए।"
तभी रफ़ीक़ ने ऊपर की शेल्फ़ से हाथ नीचे किया और उसकी आवाज़ में कुछ अलग था।
"टिंकू भैया…"
"क्या?"
"ये देखो। ये किताब नहीं है, ये कटा हुआ काग़ज़ है। किसी ने कैंची से काटा है।"
उसने हाथ नीचे बढ़ाया। टिंकू ने लिया।
कतरन पुरानी थी, पीली पड़ी हुई, किनारों से छोटे-छोटे टुकड़े टूट चुके थे। ऊपर की तरफ़ आधा शीर्षक बचा था — बाकी कट गया था, शायद काटा गया था। जो बचा था वो इतना था कि पढ़ते ही कमरे की हवा भारी हो गई:
स्कूल टीचर का घर बिख…
नीचे, काले अक्षरों में कुछ छोटा लिखा था, जो आधा साफ़ था और आधा मिट गया था। नीचे और भी छोटे अक्षरों में चार शब्द साफ़ पढ़े गए — बस्ती की आवाज़।
टिंकू ने उसे दोनों हाथों से पकड़ा और सूरज की रोशनी में ले गया।
"ये क्या है?" गुड्डू ने गर्दन आगे कर पूछा।
"ये किसी अख़बार से काटा हुआ है," टिंकू ने कहा। "और नीचे ये नाम…"
सानिया ने झपटकर देखा और उसका मुँह खुला रह गया। "ये तो मीरा दीदी का नाम है। बस्ती की आवाज़। ये मीरा दीदी का चैनल है ना?"
कमरा एक पल को चुप हो गया। धूल की आयत में अब भी कण नाच रहे थे, पर बच्चों की साँस थम गई थी।
"मीरा दीदी?" चिंटू ने दरवाज़े से कहा, उसकी आवाज़ पतली हो गई थी। "जो रोज़ गुमटी पर चाय पीती हैं? जो हमें समोसा देती हैं?"
"हाँ," सानिया ने कहा।
"तो… फिर ये टीचर का घर कैसे बिखर गया? और उसका नाम नीचे क्यों?"
टिंकू ने काग़ज़ को पलटा। पीछे कुछ नहीं था, सिर्फ़ पुराना, पीला, खुरदुरा काग़ज़। ऊपर की तरफ़ एक छोटी तस्वीर का आधा हिस्सा बचा था — एक औरत का चेहरा, आधा कटा, चश्मा और सफ़ेद बालों की झलक।
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