The Mysterious Bell466 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 466

7 min read November 5, 2026

"वो बस पुरानी सख्त टीचर हैं," उसने कहा, बहुत जल्दी, बिना मेरी तरफ़ देखे। "हर बच्चे को डाँटती थीं। सबको। मुझे भी। बस इसीलिए…" उसने हाथ हिलाया। "इसीलिए मुझे उनका चेहरा देखकर अजीब लगा। कुछ नहीं है।"

मैंने कुछ नहीं कहा।

क्योंकि मैंने देखा था — रमा मैडम ने मीरा को उस तरह देखा था जैसे कोई आदमी अपने घर की जली हुई दीवार देखता है।

और मीरा ने अभी मुझसे झूठ बोला था। पहली बार, इतने सीधे, इतने साफ़, इतने जल्दी। जैसे तैयार रखा हो।

मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी ठंडी थी। मैंने उसे दबाने के लिए अँगूठा रखा और फिर हटा दिया।

क्योंकि घंटी का काम टूटी चीज़ें जोड़ना है, और मीरा कोई टूटी चीज़ नहीं थी। वो मेरी दोस्त थी। और दोस्त के अंदर झाँकने के लिए किसी को ज़बरदस्ती नहीं करते। उसके लिए बैठकर इंतज़ार करते हैं।

दफ़्तार का कर्मचारी खाँसा।

"नकल का काग़ज़?" उसने कहा। "रखूँ, या तुम लोग फिर आओगे?"

"रख लो," मैंने कहा। "हम मुख्याध्यापक साहब का इंतज़ार करेंगे।"

हम गलियारे में बाहर आ गए। मीरा बेंच पर बैठ गई, कैमरा गोद में रखा, और सामने दीवार पर बच्चों के बनाए चित्र देखने लगी — जैसे उनमें कोई जवाब छिपा हो।

मैं उसके पास खड़ा रहा।

कुछ देर बाद मैंने धीरे से कहा, "तूने मुझसे झूठ बोला।"

"मैंने कहा, पुरानी बात है।"

"उसने तेरा नाम नहीं लिया। उसने कहा — तुम अब भी वही कैमरा लेकर घूमती हो।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "इसका मतलब वो तुझे पहले से जानती हैं। इसका मतलब वो पहले भी तुझे कैमरे के साथ देख चुकी हैं। और इसका मतलब ये है कि उन्हें उस कैमरे से कोई दर्द जुड़ा हुआ है।"

मीरा ने कैमरे के ऊपर अपनी हथेली रख दी, जैसे उसे ढक रही हो।

"तू बहुत सवाल पूछता है।"

"मेरा काम ही यही है। टूटी चीज़ें देखना, और ये देखना कि कहाँ से टूटी हैं।"

"तो मेरी तरफ़ मत देख।" उसकी आवाज़ कड़क हुई। "मैं टूटी चीज़ नहीं हूँ।"

"मैंने कब कहा?"

"तूने नहीं कहा।" उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें भरी हुई थीं, पर उसमें पानी नहीं था — बस वो चमक जो रोने से ठीक पहले आती है और फिर किसी ज़िद से रुक जाती है। "तूने नहीं कहा। तू बस वैसे देख रहा था जैसे कोई मिस्त्री टूटी साइकिल देखता है। और मुझे वो देखना पसंद नहीं है।"

मैं चुप हो गया।

क्योंकि वो सच कह रही थी। मैं वैसे ही देख रहा था।

गलियारे के आख़िर में स्टाफ रूम का दरवाज़ा खुला था। अंदर से पानी की केतली की आवाज़ आ रही थी, कप की खनक, और दो मैडमों की धीमी बातचीत।

फिर केतली चुप हुई।

रमा मैडम दरवाज़े पर आईं।

वो बाहर नहीं निकलीं। दरवाज़े की चौखट पर खड़ी रहीं, दोनों हाथ शॉल के नीचे, और बहुत देर तक मीरा को देखती रहीं।

गलियारे में सुबह की धूप खिड़कियों से आ रही थी और धूल के कण उसमें तैर रहे थे। मीरा की बेंच पर मैंने देखा — उसकी उँगलियाँ कैमरे पर सफ़ेद पड़ गई थीं, इतनी कसकर पकड़ा हुआ था कि नाखून की जगह सफ़ेद हो गई थी।

"पाँच साल पहले," रमा मैडम ने कहा।

गलियारा चुप। पहली मंज़िल पर बच्चों की पढ़ाई भी जैसे धीमी हो गई।

"तुमने जो लिखा था," उन्होंने कहा, "उसका एक कोना आज भी मेरे घर में रखा है।"

और वो अंदर चली गईं और दरवाज़ा बंद कर दिया।

मैंने मीरा की तरफ़ देखा।

वो बेंच पर बैठी थी, कैमरा गोद में, और उसका चेहरा वैसा था जैसे किसी ने उसके सामने से ज़मीन खींच ली हो।

मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी अपने आप, बहुत हल्का, बजी — इतना धीमा कि जैसे किसी ने साँस के अंदर टन कहा हो।

"कोना," घंटी ने कहा। "आधा काग़ज़। आधा सच।"

और फिर चुप।

मैंने हाथ जेब से बाहर निकाला, और बेंच पर मीरा के पास बैठ गया।

मैंने कुछ नहीं पूछा।

कभी-कभी सबसे बड़ा सवाल यही होता है — बैठ जाना, और कुछ न पूछना। और मैं अब ये धीरे-धीरे सीख रहा था, बहुत धीमे, उस आदमी की तरह जो पहली बार रिंच से नहीं, हाथ से पेंच कसना सीख रहा हो।

मीरा ने कुछ देर बाद, बिना मेरी तरफ़ देखे, बहुत धीमी आवाज़ में कहा —

"भैया, वो कोना मेरे पास नहीं है।"

"पता है।"

"और मैं उसे पाँच साल से ढूँढ रही हूँ, ताकि फाड़ सकूँ।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पानी आ गया था, और इस बार उसने रोका नहीं।

और मैंने पहली बार सोचा — सारे शहर में जो काग़ज़ टूट रहे थे, उनके बीच एक काग़ज़ ऐसा भी था जिसे मीरा ने खुद लिखा था, और जिसका एक कोना, पाँच साल बाद, आज एक बूढ़ी मैडम के घर में, बंद कमरे में रखा हुआ था।

॥

मीरा ने उँगली से आँख के नीचे पोंछा और फिर पूरी हथेली चेहरे पर फेर दी, जैसे सुबह की नींद हटा रही हो। पर वो नींद नहीं थी। वो वो चीज़ थी जो अंदर से निकलकर चेहरे पर बैठ जाती है, और अगर कोई उसे देख ले तो वहीं जम जाती है।

मैं उसकी तरफ़ देखता रहा।

मेरे अंदर एक आवाज़ उठी, वो आवाज़ जो घंटी की नहीं होती, अपनी होती है। वो कह रही थी — पूछ ले। एक सवाल, बस एक। तू क्या है, मिस्त्री है या डरपोक?

पर मैंने नहीं पूछा।

क्योंकि मैंने देख लिया था कि अभी वो सवाल सह नहीं पाएगी। कुछ पेंच ऐसे होते हैं जिनका सिरा पहले से घिसा हुआ होता है। ज़ोर लगाओगे तो बिगड़ जाएगा। पहले थोड़ा तेल, फिर उँगली से हल्का घुमाना, फिर इंतज़ार।

मैंने जेब से रूमाल निकाला और उसकी तरफ़ बढ़ा दिया।

"ये ले। गली के मुँह पर तेरी शक्ल देखकर कोई स्कूल का निरीक्षण समझ लेगा।"

उसने रूमाल छीनकर नाक साफ़ की और मेरी तरफ़ देखा। "तू सोचता है बहुत मज़ाकिया है।"

"मैं सोचता नहीं, मुझे पता है। गली कहती है।"

"गली कहती है कि तू बहुत बड़ा नालायक है।"

"वो भी सच है।"

उसके चेहरे पर हल्की सी हवा चली। रोने के बाद आने वाली हवा। फिर वो अपने कैमरे को उठाकर बैग में रखने लगी, इतने ध्यान से जैसे कोई सलीमा आपा अपनी मुर्गी रख रही हो।

गलियारे के आख़िर में स्टाफ वाले कमरे का दरवाज़ा बंद हो चुका था। अंदर से केतली की आवाज़ आ रही थी, धीमी, बुझी हुई, जैसे कोई चूल्हा बंद कर रहा हो और अब उस पर बात करने का मन न हो।

मैंने उसकी तरफ़ देखा और बहुत हल्की आवाज़ में कहा, "मीरा, तेरे पास जो काग़ज़ है, वो तूने पाँच साल तक फाड़ने के लिए रखा हुआ था। अब जब उसका कोना मिल रहा है, तू उसे फाड़ने से पहले उसे पढ़ना चाहेगी या नहीं — ये तेरी मर्ज़ी है।"

वो रुक गई। उसने बैग का चेन खींचा, फिर छोड़ दिया, और बिना मेरी तरफ़ देखे बोली, "तू कुछ नहीं समझता।"

"हो सकता है। पर इतना समझता हूँ कि अधूरा काग़ज़ अधूरी साइकिल जैसा होता है। उसे ठीक करने के लिए पहले ये देखना पड़ता है कि कौन सी तीली मुड़ी है, और वो मुड़ी थी या तोड़ी गई थी।"

वो उठकर खड़ी हो गई।

"चल। नकल लेनी है। मास्टर जी बारह बजे आएंगे और उनसे पहले एक बार मुझे लगता है कि ये दफ़्तार खाली करना पड़ेगा।"

चपरासी का कमरा छोटा था और उसमें काग़ज़ों की महक और चाय की महक एक ही चीज़ बन चुकी थी।

मोटा कर्मचारी अपने रजिस्टर पर झुका हुआ था। सिर के बाल तेल से चिपके, चश्मे का एक काँच साफ़ और दूसरा अच्छे से पोंछा हुआ नहीं। उसने हमारी तरफ़ देखे बिना हाथ बढ़ाया, और मैंने पंद्रह रुपये उसकी हथेली पर रख दिए।

"नकल," मैंने कहा। "छत की सुरक्षा रिपोर्ट की।"

"मुख्याध्यापक के हस्ताक्षर के बिना नहीं।"

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho