The Mysterious Bell – Chapter 465
"काग़ज़ नहीं," घंटी ने कहा। "आदमी ढूँढ।"
"कौन सा आदमी?"
चुप।
मैंने फिर दबाया।
टन।
"पाँच साल।" बस इतना। फिर चुप।
मैंने उसे तकिये के नीचे रखा और आँखें बंद कर लीं। नींद नहीं आई। दिमाग़ में बस एक ही चीज़ घूम रही थी — मीरा ने अपने चैनल का नाम रखा था "बस्ती की आवाज़"। और मैंने कभी नहीं पूछा कि उससे पहले उसने क्या किया था।
सुबह सात बजे मैं दुकान का शटर आधा उठाकर बाहर निकला। आसमान साफ़ था, हवा में वो ठंडक जो भोपाल में फ़रवरी के आख़िर में आती है, और पीपल के पत्तों पर सुबह की धूप।
मीरा गुमटी पर बैठी थी।
एक कटोरी में चाय, आधी पी हुई। कैमरा उसके सामने मेज़ पर रखा था, और वो उसे छू नहीं रही थी। मैं जब पहुँचा तो उसने ऊपर भी नहीं देखा।
"आठ बजे कहा था," मैंने कहा, मेज़ के दूसरी तरफ़ बेंच खींचकर बैठते हुए।
"सात बजे आ गई।"
"क्यों?"
"क्योंकि घर में बैठकर मैं तीन बार कैमरा उठा चुकी थी और तीनों बार रख दिया।"
शबनम आपा ने मेरी तरफ़ चाय बढ़ाई और बिना कुछ कहे चिमटी उठाकर तवे की तरफ़ मुड़ गईं। उनकी चुप्पी भी एक तरह का सवाल थी।
"मीरा," मैंने कहा, "कल की बात।"
"कल की बात नहीं है।" उसने चाय खत्म की और कटोरी दूर सरका दी। "स्कूल चल। काग़ज़ लेना है। और सुन — वहाँ मुझे कुछ मत पूछना, किसी के सामने। ये मेरी बात है, तेरी नहीं।"
"मैं तेरा दोस्त हूँ, अजनबी थोड़े ही हूँ जो तू मना कर रही है।"
"दोस्तों को भी कभी-कभी बाहर खड़ा रहना पड़ता है।" वो उठी। "चल।"
हम स्कूल की गली में मुड़े।
स्कूल की इमारत पुरानी है, ये मैंने पहले भी सोचा था, पर आज सुबह उसकी उम्र दिख रही थी। पीली दीवार पर नमी की लकीरें नीचे से ऊपर तक चढ़ी हुईं, जैसे किसी ने उँगली से पानी में रेखाएँ खींची हों। लोहे का गेट, जिसके कब्ज़े टूटे हुए थे, खुलते वक़्त बूढ़े आदमी की खाँसी जैसी आवाज़ करता था। उसके ऊपर पुराना बोर्ड — अक्षर उखड़े हुए, नीला रंग हरा पड़ गया।
रामलाल चौकीदार गेट के अंदर अपनी कोठरी के बाहर बैठा था और चाय के गिलास पर फूँक मार रहा था। उसने हमें देखा, उठा, और फिर बैठ गया, जैसे बीच में उठने का फ़ैसला बदल दिया हो।
"दफ़्तर खुल गया?" मैंने पूछा।
"दस मिनट में खुलेगा।" उसने मेरी तरफ़ नहीं, मीरा की तरफ़ देखा। "मैडम स्कूल में हैं।"
"कौन सी मैडम?"
"रमा मैडम।" उसने गिलास नीचे रखा। "काग़ज़ के काम से आई हैं। पेंशन… इधर ही सालों से कोई काग़ज़ अटका हुआ है।"
मीरा ने कुछ नहीं कहा। उसने सिर्फ़ अपना कैमरा उठाया और गर्दन तक कसकर उसका पट्टा लपेट लिया।
दफ़्तार गलियारे के आख़िर में था। गलियारा लंबा, छत ऊँची, और फ़र्श पर चाक की धूल पड़ी हुई। दीवारों पर बच्चों के काम टँगे थे — रंग-बिरंगे काग़ज़, कुछ पर सूरज, कुछ पर घर, कुछ पर आधे अधूरे चेहरे जिनके बाल बादल जैसे बने थे। पहली मंज़िल से बच्चों के पढ़ने की आवाज़ आ रही थी — एक साथ, बिना रुके, जैसे कोई ताला खुलने से पहले कुंडी हिला रहा हो।
दफ़्तार में एक मोटा मेज़, दो लोहे की अलमारियाँ, और पुरानी फाइलों का ढेर था। बैठा कर्मचारी चश्मा पहने हुए था और रजिस्टर पर कुछ लिख रहा था, धीरे-धीरे, जैसे उँगली से शब्द उठाकर रख रहा हो।
"रिपोर्ट की नकल चाहिए," मीरा ने कहा। "स्कूल की छत की सुरक्षा रिपोर्ट। कल तक जो काग़ज़ था।"
"किसके कहने पर?"
"सभा में सबके सामने कहा गया था कि नकल सबको मिलेगी।"
कर्मचारी ने ऊपर देखा। इतना धीरे कि जैसे गर्दन हिलाने में उसे तकलीफ़ हो रही हो।
"तुम वो लड़की हो ना? जो कल वीडियो बना रही थी?"
"काम है," मीरा ने कहा।
कर्मचारी ने कुछ कहना चाहा, फिर अलमारी की तरफ़ मुड़ गया। चाबियों का गुच्छा जेब से निकाला, पुरानी चाबी खोजी, अलमारी खोली। अंदर से काग़ज़ों की एक फाइल निकाली जिसका किनारा मुड़ा हुआ था और जिस पर नीला गोल निशान हल्का हो गया था।
"नकल पंद्रह रुपये," उसने कहा। "और मुख्याध्यापक का हस्ताक्षर चाहिए।"
"वो तो लेंगे ही।"
"वो दस बजे आते हैं।"
उसी वक़्त गलियारे में पैरों की आवाज़ आई।
धीमी चाल, पर पक्की। चप्पल की नहीं, सैंडल की आवाज़। हमारी तरफ़ आ रही थी। मीरा दफ़्तार के दरवाज़े के सामने खड़ी थी, मेरी तरफ़ पीठ किए। मैंने उसकी गर्दन में तनाव देखा, फिर बाहर देखा।
रमा मैडम आ रही थीं।
कल उन्हें मैंने खिड़की के पीछे से देखा था, धूप में, पर्दे के पीछे। आज वो पूरी आ रही थीं। सफ़ेद बाल साफ़ कंघी किए, कंधों पर वही सफ़ेद शॉल, हाथ में काग़ज़ों का पुराना पारदर्शी बैग जिसमें फाइल दिख रही थी। मोटा चश्मा नाक पर फिसला हुआ, और चेहरे पर वो झुर्रियाँ जो इंसान के साथ अकेलेपन में आती हैं, उम्र से पहले।
वो गलियारे में दो कदम आईं और रुक गईं।
उन्होंने मीरा को देखा।
बस देखा। एक पल, दो पल।
मीरा का हाथ हिला।
कैमरा उसकी पकड़ से फिसला — गोल, चिकना शरीर, और उसकी उँगलियाँ जैसे अचानक किसी और ही बात में उलझ गई हों। कैमरा नीचे जाने लगा।
मैंने हाथ बढ़ाया और झट से पकड़ लिया। पट्टा मेरे हाथ पर लिपटा। कैमरा फ़र्श से एक इंच ऊपर आकर रुक गया।
गलियारा चुप था। दूर, पहली मंज़िल पर, बच्चों की पढ़ाई चल रही थी, बिना वक़्त पहचाने।
रमा मैडम ने कैमरे की तरफ़ देखा, फिर मीरा की तरफ़।
"तुम अब भी वही कैमरा लेकर घूमती हो।"
आवाज़ ठंडी थी। गुस्से वाली नहीं। ठंडी — जैसे किसी ने सालों पहले आवाज़ को फ्रीज़ में रख दिया हो और अब निकाली हो, और उस पर जमी बर्फ़ पिघलने का नाम न ले रही हो।
मीरा का चेहरा पीला पड़ गया। ऐसा पीला जो पल भर में नहीं आता, जो कई दिन का होता है और अब बाहर निकलता है।
वो पलटी।
"पुरानी बात है, मैडम।" उसकी आवाज़ में वो कोशिश थी जो आदमी अपने ही कानों को धोखा देने के लिए करता है। "अब कुछ मतलब नहीं रखती।"
"मतलब तुम तय करती हो?" रमा मैडम ने पूछा।
मैंने कैमरा मीरा के हाथ में रख दिया। वो उसे पकड़ नहीं रही थी, इसलिए मैंने उसकी उँगलियों में थमा दिया और उसके कंधे पर हल्का हाथ रखा। वो हिली नहीं।
मैं आगे बढ़ा।
"मैडम," मैंने कहा, आवाज़ में वो नरमी रखकर जो मैं कभी-कभी ही लाता हूँ, "मैं अंकुश हूँ। इसी गली में साइकिल की दुकान है। मामला क्या है? अगर मीरा से कोई पुरानी बात जुड़ी है और वो आज हमारे रास्ते में आ रही है, तो मुझे पता होना चाहिए।"
रमा मैडम ने मेरी तरफ़ देखा।
उनकी नज़र में वो स्कूल वाली बात नहीं थी। वो देख रही थीं कि मैं कौन हूँ, किसका हूँ, किस गली का हूँ। उन्होंने मेरी कमीज़ देखी, मेरे घुटने की फटी जीन्स देखी, मेरे हाथों पर ग्रीस के निशान देखे। फिर उन्होंने कुछ ऐसा देखा जो उन्होंने कहा नहीं।
"मामला," उन्होंने कहा, "तुम्हारा नहीं है।"
और वो चल दीं।
शॉल उनके कंधे से खिसक रहा था, उन्होंने उसे उठाया और आगे बढ़ीं। गलियारे के आख़िर में स्टाफ वाले कमरे का दरवाज़ा था। वो वहाँ पहुँचीं, दरवाज़े का हैंडल पकड़ा, और रुक गईं।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
वो दीवार से सटी खड़ी थी, कैमरा उसके हाथ में लटक रहा था, और उसकी आँखों में वो सूनापन था जो आदमी के अंदर तब आता है जब उसका पुराना झूठ उसके सामने खड़ा हो जाए और उससे हाथ न मिलाए।
"मीरा?"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno