The Mysterious Bell – Chapter 456
मैं अंदर गया।
"पापा।"
"हूँ।"
"ये क्या कर रहे हो?"
"औज़ार।"
"क्यों?"
"बंद है दुकान।"
"दस दिन के लिए है। दस दिन। बारह भी हो सकते हैं। पर बंद है तो बंद है। औज़ार समेटने की क्या ज़रूरत?"
उन्होंने एक पुराना पेचकस उठाया, उसे कपड़े से पोंछा, और उसे ध्यान से ट्रंक में रखा। फिर बोले, "बंद दुकान में औज़ार पड़े रहें तो ज़ंग लगती है।"
और ये बात उन्होंने ऐसे कही जैसे कोई और बात कह रहे हों। मैं उनके सामने खड़ा रह गया। उनका चश्मा कान पर टेप से बँधा था। उनकी कमर झुकी थी। हाथ काँप रहे थे, पर काँपते हुए भी वो हर औज़ार को सीधा रख रहे थे।
"पापा," मैंने कहा, "आप डर रहे हो।"
उनका हाथ रुका।
"डरना अलग बात है," उन्होंने कहा, "और तैयार रहना अलग। मैं तैयारी कर रहा हूँ।"
"किसकी?"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें कमज़ोर थीं, पर उस पल उनमें वो चीज़ थी जो मुझे पहले नहीं दिखी थी।
"उसकी जो आज नहीं आया," उन्होंने कहा, "पर आएगा।"
फिर वो चुप हो गए, और मैं जानता था कि आगे कुछ नहीं कहेंगे। पापा की चुप्पी ऐसी ही है। एक दरवाज़ा है जो अंदर से बंद है, और आप उसे खटखटा सकते हैं, पर वो खुलेगा तब जब वो खुद खोलें।
शाम चार बजे शालिनी आई।
वो अकेली नहीं थी। उसके साथ उसके पापा थे। दुबले, थके, चालीस-पचास के बीच, हाथ में एक मोटा बैग जिसमें काग़ज़ भरे हुए थे। उनकी आँखों में वो डर था जो आदमी के चेहरे पर तब आता है जब उसका पूरा जीवन किसी एक काग़ज़ पर टिका हो।
वो उस्ताद की दुकान के बाहर रुके, और शालिनी ने कहा, "पापा, अंदर चलिए।"
वो अंदर नहीं आए। वो बाहर खड़े रहे, और फिर बोले, "शालिनी, एक बात कहूँ?"
"कहिए।"
"कल की सभा में तुम चुप रहना।"
शालिनी रुक गई।
"क्या?"
"मैंने सोचा है," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ धीमी थी, धीमी और टूटी। "अगर तुम बोल दोगी, तो साहब के सारे काम रुक जाएँगे। और अगर उसके काम रुके तो…" उन्होंने अपना बैग देखा। "…तो मेरी कंपनी का क्या होगा? बाईस मज़दूर हैं। तीन महीने की मज़दूरी बाकी है। उनके बच्चे हैं। मैं उन्हें क्या कहूँगा?"
शालिनी ने उन्हें देखा। उसकी आँखें भरी हुई थीं।
"पापा," उसने कहा, "और मैं? मैं झूठ पर हस्ताक्षर करती तो आपकी कंपनी बच जाती, पर मैं बचती? उस छत के नीचे बच्चे बैठते हैं। अगर कल वो छत गिरी, तो उन बाईस मज़दूरों के बच्चे भी उसी में होंगे।"
उनके पापा ने मुँह फेर लिया।
"मैं मज़दूरों की बात कर रहा हूँ।"
"मैं भी," शालिनी ने कहा। "मैं भी उन्हीं की बात कर रही हूँ।"
वो दोनों चुप खड़े रहे।
मैं बीच में नहीं आया। कभी-कभी सबसे ज़रूरी काम यही होता है — कुछ न कहना। मैं टिंकू के पास बैठ गया और उससे धीरे से कहा, "देख रहा है? बाप-बेटी की बात।"
"उस्ताद," टिंकू ने धीरे से कहा, "अगर उसके पापा नहीं माने तो?"
"तो कुछ नहीं होगा।"
"मतलब?"
"मतलब ये कि हर बात अपने वक़्त पर होती है। और अभी उस आदमी को मौक़ा देना है। डर को बाहर निकलने देना है। जो डर बाहर आ जाता है, वो अंदर से कमज़ोर हो जाता है।"
टिंकू ने सिर हिलाया। फिर बोला, "उस्ताद, ये बात आपने किस किताब में पढ़ी?"
"किसी में नहीं। साइकिल के पहिये में पढ़ी है। जो पहिया जाम हो, उसे ज़ोर से नहीं घुमाते। उसे थोड़ा ढीला करते हैं। फिर अपने आप घूमने लगता है।"
शालिनी के पापा आख़िरकार अंदर आए। उन्होंने बैग मेज़ पर रखा और बोले, "मैं सच बोलूँगा, पर मुझे एक बात का जवाब चाहिए।"
"पूछिए," मैंने कहा।
"क्या आप मेरे मज़दूरों को बचा सकते हो?"
मैं एक पल रुका। सच बोलना था, और सच बोलना आसान नहीं था।
"नहीं," मैंने कहा। "मैं कोई साहब नहीं हूँ। मेरे पास पैसा नहीं, सत्ता नहीं। जो मेरे पास है, वो ये गली है, ये लोग हैं, और एक घंटी है जो कभी-कभी बोलती है — और सच कहूँ तो वो भी अब कम बोलने लगी है।"
"तो फिर?"
"तो फिर मैं आपसे यह कहूँगा," मैंने कहा। "आपके मज़दूरों की मज़दूरी अगर सच बोलने से रुकती है, तो वो मज़दूरी झूठ से भी नहीं चुकेगी। वो किसी और रास्ते से आएगी। पर उस रास्ते के लिए पहले उस काग़ज़ को सबके सामने खोलना पड़ेगा।"
शालिनी के पापा ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें भरी हुई थीं। उन्होंने बैग खोला और उसमें से काग़ज़ों का बंडल निकाला।
"ये सब है," उन्होंने कहा। "मेरी कंपनी का हिसाब, मज़दूरों की सूची, साहब के काम के काग़ज़, और वो रसीदें जो झूठी लिखी गईं। मैं कल सभा में आऊँगा। पर मैं बोलूँगा नहीं। मैं बस ये काग़ज़ रख दूँगा।"
मैंने शालिनी की तरफ़ देखा। उसने हल्का सिर हिलाया। यही काफ़ी था। पहला कदम हमेशा पूरा नहीं होता, पर वो कदम होता है।
शाम ढलने लगी।
शालिनी और उसके पापा चले गए। मैं दुकान में आया और बैठ गया। दुकान बंद थी, शटर पर पीला काग़ज़ चिपका था, और अंदर अंधेरा था। पापा ट्रंक के पास बैठे थे और उनका हाथ ट्रंक के ढक्कन पर रखा था।
उस्ताद आए। उनकी चाल में वो धीमापन था जो पिछले कुछ दिनों से बढ़ गया था। वो मेरे सामने बैठे और बोले, "घंटी दे।"
मैंने जेब से घंटी निकाली और उनकी तरफ़ बढ़ा दी।
वो उसे दोनों हाथों में लेकर अपनी आँखों के पास उठा लाए। उनका मोटा चश्मा उनकी नाक पर फिसला हुआ था और उन्होंने उसे उँगली से सरका दिया। फिर शुरू हुआ वो काम जिसे मैं कभी नहीं भूलूँगा।
उन्होंने घंटी को घुमाया। उसे उल्टा किया। उसकी खाँच देखी। उनकी उँगली उस छोटे लोहे के टुकड़े पर गई जिसे टिंकू ने पिछली रात फँसाया था — वो टुकड़ा जिससे घंटी ने दोहरी आवाज़ में कहा था, "दो, आधी, जीभ।"
उस्ताद ने टुकड़ा निकाला। उसे रोशनी में रखकर देखा। फिर वापस घंटी में रखा।
"ये गलती से नहीं फँसा," उन्होंने कहा।
"मतलब?"
"मतलब ये कि इसे कोई जान-बूझकर दबाकर फँसाया गया है। देखो — घंटी के अंदर एक खाँच है। ये खाँच उसी कड़ी के लिए बनी है। ये टुकड़ा उसी खाँच में बैठता है। और जब बैठता है, तो घंटी की जीभ आधी हो जाती है। आधी जीभ वाली घंटी पूरी बात नहीं कहती, अंकुश। वो आधी बात कहती है। और आधी बात वो सबसे खतरनाक चीज़ है जो इस दुनिया में है।"
मेरे पेट में कुछ ठंडा हुआ।
"तो जिसने ये टुकड़ा भेजा," मैंने कहा, "वो चाहता था कि मेरी घंटी आधी सच बोले?"
"हाँ," उस्ताद ने कहा। "क्योंकि आधा सच तुम्हें गलत रास्ते पर भेजता है। पूरा सच तुम्हें खड़ा करता है। आधा सच तुम्हें दौड़ाता है — और दौड़ते आदमी को दिशा नहीं दिखती, सिर्फ़ रफ़्तार दिखती है।"
मैंने गहरी साँस ली।
"उस्ताद," मैंने कहा, "पिछली रात टिंकू ने ये टुकड़ा घंटी में फँसाया। उसने खुद किया। किसी ने नहीं कहा।"
"पर उस लड़के को ये टुकड़ा मिला कहाँ से?"
"डिब्बे से।"
"और डिब्बा कहाँ से आया?"
"मनोज लाया। साहब की तरफ़ से।"
"तो?" उस्ताद ने पूछा।
मैं चुप हो गया।
"सोच," उन्होंने कहा। "सोच की उस डिब्बे में पेचकस क्यों था? तेरे पापा का पुराना पेचकस, जो भारद्वाज भवन में छूट गया था। कोई पुरानी चीज़। कोई पुराना औज़ार। और उसी डिब्बे में ये टुकड़ा भी था। दोनों एक साथ। क्यों?"
"क्योंकि एक ही आदमी ने भेजे।"
"हाँ," उस्ताद ने कहा। "जिसने पेचकस भेजा, उसी ने ये टुकड़ा भी भेजा। और दोनों के पीछे एक ही बात है — वो तुम्हारे पास से गुज़रना चाहता है।"
उन्होंने घंटी मेरी हथेली पर रख दी।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno