The Mysterious Bell – Chapter 455
पीछे वाला सिपाही लंबा था, चुप, और उसने अपने दोनों हाथ पीछे बाँध रखे थे। वो गली को देख रहा था, दुकानों को, पीपल को, और उसकी नज़र जब उस्ताद की सिलाई मशीन पर पड़ी तो एक पल के लिए रुक गई।
"तुम अंकुश यादव हो?" पहले सिपाही ने पूछा।
"हाँ," मैंने कहा। "सुबह-सुबह मशहूर हो गया हूँ, ये अच्छी बात है।"
वो हँसा नहीं। उसने काग़ज़ खोला और उस पर उँगली रखी।
"ये क्या है?"
मैंने देखा। एक शिकायत। सादे काग़ज़ पर, किसी की जल्दी में लिखी हुई लिखाई। ऊपर मेरी दुकान का नाम। नीचे कुछ लाइनें।
"जी," मैंने कहा, "काग़ज़ है।"
"मज़ाक मत करो।"
"माफ़ करना," मैंने कहा। "आदत है। सुबह से किसी ने मज़ाक नहीं किया, तो मुँह सूख रहा है।"
पीछे से टिंकू ने एक छोटी सी हँसी निकाली, फिर तुरंत चुप हो गया।
सिपाही ने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"कल रात तुम्हारी दुकान के पीछे एक बैग मिला। किसी लड़की का। उसमें काग़ज़ थे। तुमने उसे छुपाया क्यों?"
मैंने उसकी आँखों में देखा। सच बोलने का मन बना लिया था, और सच बोलने में एक अजीब सा आराम होता है, ऐसा आराम जैसे भारी बोरी ज़मीन पर रख दी जाए।
"जी," मैंने कहा। "बैग मेरी दुकान के पीछे मिला। सुबह पाँच बजे। मेरा शागिर्द टिंकू बोरी के नीचे से निकालकर लाया।"
"तो तुमने उसे थाने क्यों नहीं दिया?"
"क्योंकि मुझे यह जानना था कि वो वहाँ कैसे पहुँचा," मैंने कहा। "अगर मैं उसे सीधे थाने दे आता, तो वो सबूत बन जाता। और सबूत वो होता है जो सच बताए। मुझे पहले यह देखना था कि ये सच बताता है या सिर्फ़ मेरी तरफ़ उँगली करता है।"
"और वो क्या बताता है?"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो पीछे खड़ी थी, कैमरा हाथ में, और उसकी आँखें कह रही थीं कि बोलो।
"ये बताता है," मैंने कहा, "कि बैग पर जो उँगलियों के निशान हैं, वो मेरी दुकान से निकले हैं। और ये बात सच है। क्योंकि बैग यहीं रखा गया था। जिसने रखा, उसने मेरी दुकान चुनी। यही तो सबसे आसान जगह थी जहाँ सबकी नज़र जाती है, और फिर सबसे आसान शक़ भी।"
सिपाही ने मुझे घूरा।
"तुम वकील हो?"
"नहीं," मैंने कहा। "साइकिल मिस्त्री हूँ। पर रोज़ झूठ सुनता हूँ, इसलिए सच की शक्ल पहचान लेता हूँ।"
उसके चेहरे पर कुछ बदला। गुस्सा नहीं आया, पर वो सतर्क हो गया, और सतर्क सिपाही सबसे ज़्यादा खतरनाक होता है, क्योंकि वो सुनने लगता है।
"बैग किसका है?"
"शालिनी का," मीरा ने आगे आकर कहा। "वो स्कूल में इंजीनियर है। कल शाम पाँच बजे स्कूल के आँगन में सभा थी। शालिनी वहाँ सच बोलने आई थी कि जो रिपोर्ट उसके नाम पर बनाई गई, वो झूठी है। उसने हस्ताक्षर नहीं किए। बोलते-बोलते बिजली गई, और अंधेरे में किसी ने उसका बैग छीन लिया।"
"तुम कौन हो?"
"मीरा तिवारी। बस्ती की आवाज़। मेरे पास उस सभा की पूरी रिकॉर्डिंग है, जिसमें यह सब है।"
सिपाही ने लंबी साँस ली। फिर उसने मुड़कर अपने साथी को देखा, और वो दोनों एक पल बिना बोले खड़े रहे। यही तो पुलिस की भाषा है — वो चुप होकर आपस में बात कर लेते हैं, और आपको लगता है कि आप बाहर खड़े हैं।
तभी गली के मुँह से धीमी चप्पलों की आवाज़ आई।
दुबे अंकल आ रहे थे।
नीली शर्ट, वो पुरानी वर्दी जैसी, आधी आस्तीन में। हाथ में एक मुड़ा हुआ अख़बार और एक पुरानी नीली कवर वाली कॉपी। उनकी चाल में वो धीरज था जो सिर्फ़ उन लोगों में आता है जिन्होंने बहुत साल तक वर्दी पहनी हो और अब उसे पहनते नहीं बल्कि उसके कपड़े जैसा रंग पहनते हैं।
दोनों सिपाही उन्हें देखकर सीधे खड़े हो गए।
"अंकल," छोटे सिपाही ने कहा, "आप… कुर्सी खाली थी तो हम…"
"मैं सब्ज़ी लेने गया था, बेटा," दुबे अंकल ने कहा। "आदमी को सुबह सब्ज़ी भी लेनी होती है, सिर्फ़ थाने में बैठना काम नहीं है।"
फिर वो मेरी तरफ़ आए, मेरे कंधे के पास हाथ रखा, और सिपाही की तरफ़ देखा।
"जो पूछना है, पूछो। पर साफ़ सुनो — यहाँ जाँच होगी, काग़ज़ होगा, हिसाब होगा। पर बिना सबूत किसी को गिरफ्तार नहीं किया जाएगा। जिसे इल्ज़ाम देना है, उससे पहले उस काग़ज़ पर अपना नाम लिखवाओ जो तुम मेरे बच्चे की तरफ़ बढ़ा रहे हो।"
छोटा सिपाही कुछ कहने ही वाला था कि दुबे अंकल ने हाथ उठा दिया।
"मैं जानता हूँ कि शिकायत कैसे आई। किसी ने किसी को भेजा है। पर तुम दोनों उस काग़ज़ के सिर्फ़ मोहरा हो। अभी तुम लिख लो — बैग दुकान के पीछे से ज़ब्त हुआ, दुकान वाले ने खुद दिखाया, बैग में काग़ज़ मिले, जो उस लड़की का नाम लेते हैं जिसने कल सबके सामने कहा कि उसने हस्ताक्षर नहीं किए। बस इतना लिख लो। बाकी जाँच करेगी।"
लंबा सिपाही पहली बार बोला।
"अंकल, हमें बस बैग ले जाना है।"
"ले जाओ," दुबे अंकल ने कहा। "पर रसीद दो। और फोटो खिंचवाओ जाते वक़्त। ये बच्चा भी रखेगा, ये लड़की भी रखेगी। क्योंकि कल को अगर इस बैग से कुछ गायब निकला, तो सबको पता होना चाहिए कि गया कहाँ से था।"
छोटे सिपाही का चेहरा उतर गया। उसने काग़ज़ मोड़ा और जेब में रखा।
"अच्छा," वो बोला। "हम बैग ले जा रहे हैं। तुम यहीं रहो, कहीं मत जाओ।"
"मैं तो दुकान वाला हूँ," मैंने कहा। "जाऊँगा कहाँ? पहाड़ पर हवाई जहाज़ उड़ाने थोड़े जाना है।"
उसने मुझे घूरा। फिर बैग माँगा। मीरा ने रसीद लिखी, दोनों ने हस्ताक्षर किए, मीरा ने अपने कैमरे से फ़ोटो ली, और बैग जीप में रखा गया।
जीप चली गई।
और जैसे ही उसका इंजन दूर हुआ, गली में वो सन्नाटा बैठ गया जो हमेशा किसी बड़ी चीज़ के बाद बैठता है। शबनम आपा गुमटी से बाहर आईं, हाथ में चिमटी, और मुझे देखकर बोलीं, "अब बोल। क्या हुआ?"
मैंने कहा, "कुछ नहीं। बैग ले गए।"
"और?"
"और कुछ नहीं।"
"झूठ मत बोल। तेरा चेहरा बता रहा है कि कुछ और हुआ है।"
"आपा," मैंने कहा, "मेरा चेहरा हमेशा ऐसा ही रहता है। मैं सुबह से कुछ नहीं खाया।"
"तो आ, दो समोसे खा। भूखा आदमी सोच भी गलत करता है।"
मैं हँसा। पर हँसी अंदर तक नहीं गई।
क्योंकि मेरे पेट में वो नाम अभी भी कुलबुला रहा था। वो आधा नाम जो फटे काग़ज़ के कोने पर था। और वो पर्ची, जिस पर लिखा था कि इस बैग पर हर उँगली मेरी दुकान से निकली है।
दोपहर तक वो बात हो गई जिसका डर था।
उस्ताद की दुकान पर बैठे हुए मुझे पता चला कि एक आदमी लाइसेंस दफ़्तार से आया था और उसने दुकान के शटर पर एक और पीला काग़ज़ चिपका दिया था। शबनम आपा ने आकर बताया। मैं दौड़कर गया।
पीला काग़ज़। फिर वही भाषा। लाइसेंस जाँच के दौरान निलंबित। दस दिन। काग़ज़ साफ़ न होने तक काम बंद।
मैंने पढ़ा और मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"अरे," टिंकू ने कहा, "ये तो पिछले वाला ही है।"
"नहीं," मीरा ने पास आकर काग़ज़ देखते हुए कहा। "तारीख़ नई है। और नीचे लिखने वाले का नाम नहीं है। पहले वाले पर नाम था।"
"तो?"
"तो इसका मतलब है कि अब वो नाम नहीं देना चाहते। पहले वाले पर नाम था तो हम पकड़ सकते थे। अब नहीं।"
मैंने काग़ज़ उतारा और मोड़कर जेब में रखा। फिर मैंने पीछे मुड़कर देखा।
पापा दुकान के अंदर थे।
वो औज़ार समेट रहे थे।
मैंने उन्हें कभी ऐसे औज़ार समेटते नहीं देखा था। वो हमेशा औज़ार रखते थे, रखने के बाद भूल जाते थे, और फिर ढूँढते रहते थे। पर आज वो उन्हें एक-एक करके पोंछ रहे थे, एक-एक करके ट्रंक में रख रहे थे, और हर औज़ार रखने से पहले उसे एक पल हाथ में पकड़कर देख रहे थे, जैसे किसी पुराने आदमी का हाथ पकड़कर उसे अलविदा कह रहे हों।
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