The Mysterious Bell – Chapter 457
"अंकुश," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ धीमी हो गई, "ये आदमी कोई नया नहीं है। जो पुरानी चीज़ें जानता है — पेचकस, टुकड़ा, ताले की चेन, तारीख़ — वो नया नहीं हो सकता।"
"तो कौन है?"
उन्होंने अपना चश्मा उतारा। उसे कपड़े से पोंछा। फिर उसे वापस पहना।
"मुझे नाम नहीं पता," उन्होंने कहा। "पर मुझे एक बात पता है। वो आदमी तुम्हारे घर के अंदर की बात जानता है।"
मुझे लगा मेरे पेट में कुछ गिर गया।
"घर के अंदर की?"
"हाँ।" उन्होंने उँगली उठाई और गिनाने लगे, वैसे गिनते हैं जैसे तराज़ू पर बाट गिनते हैं। "उसे पता है तेरे पापा का पेचकस कहाँ था। उसे पता है तेरे घर का पुराना दरवाज़ा कहाँ है। उसे पता है तेरे घर के औज़ारदान की चाबी कैसी है। उसे पता है कि माँ की दवाई कहाँ रखी है। उसे पता है कि तेरे घर में रात को कौन सोता है और कौन नहीं सोता।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"कैसे?"
"क्योंकि," उस्ताद ने कहा, "जो चीज़ें भेजी गई हैं, वो सिर्फ़ चीज़ें नहीं हैं। वो इशारे हैं। हर इशारा बता रहा है कि वो अंदर देख चुका है। पेचकस बता रहा है कि वो पापा तक पहुँच चुका है। टुकड़ा बता रहा है कि वो घंटी तक पहुँच चुका है। और टुकड़े की खाँच बता रही है कि वो घंटी के बारे में तुमसे ज़्यादा जानता है। अगर वो इतना जानता है कि वो टुकड़ा उस खाँच में ठीक बैठा सके, तो वो बहुत पुराना खिलाड़ी है। शायद बहुत पुराना। शायद हमसे भी पुराना।"
मैंने घंटी को देखा। वो मेरी हथेली पर पड़ी थी, ठंडी, चुप।
"उस्ताद," मैंने कहा, "जब मैं छोटा था, तो मेरे घर में एक और आदमी आता था? कोई जिसे पापा जानते हों?"
उस्ताद ने उनकी तरफ़ देखा, जो ट्रंक के पास बैठे थे।
पापा ने कोई जवाब नहीं दिया। उन्होंने सिर्फ़ अपना हाथ ट्रंक के ढक्कन पर कस लिया।
"मैं जानता हूँ," उस्ताद ने धीरे से कहा, "कि तेरे पापा बहुत पहले किसी से डरते थे। और जिससे आदमी डरता है, उसका नाम वो कभी नहीं लेता। वो उसकी चीज़ें पहचानता है, उसकी आवाज़ से सिकुड़ जाता है, पर नाम नहीं लेता। क्योंकि नाम लेना मानो उसे बुलाना है।"
पापा के कंधे झुक गए।
मैंने कुछ नहीं कहा।
क्योंकि कुछ पलों में चुप्पी ही सबसे बड़ी बात होती है।
बाहर गली में हवा चल रही थी। पीपल के पत्ते हिल रहे थे। और शबनम आपा की गुमटी से चाय की भाप उठ रही थी, जिसकी खुशबू दुकान के अंदर तक आ रही थी।
मैंने घंटी जेब में रखी।
"मैं एक बात समझ गया," मैंने कहा।
"क्या?" उस्ताद ने पूछा।
"कि जिसने ये सब भेजा, वो मेरे पास से कुछ लेना चाहता है।" मैंने उनकी आँखों में देखा। "पर वो मुझसे लड़ नहीं रहा। वो मुझे आज़मा रहा है। वो देख रहा है कि मैं कहाँ टूटता हूँ।"
उस्ताद ने सिर हिलाया।
"और ये बात तुझे सबसे पहले समझनी थी," उन्होंने कहा। "क्योंकि जो तुझे आज़मा रहा है, वो तेरा दुश्मन नहीं है। तेरा दुश्मन वो है जो उसके पीछे बैठा है और तुझे देख रहा है, पर खुद कुछ नहीं भेजता। वो सिर्फ़ एक काम करता है — वो अपने आदमी को भेजता है, और अपने आदमी की गलतियों में अपना नाम नहीं आने देता।"
"साहब।"
"हाँ।"
मैं उठा। दुकान के दरवाज़े तक गया। बाहर गली में टिंकू बच्चों के साथ बैठा था, और सानिया उसे कुछ समझा रही थी। मैं उन्हें देखकर मुस्कुराया, फिर मुड़ा।
"उस्ताद," मैंने कहा, "मेरे पास कितना वक़्त है?"
"किस चीज़ का?"
"कल की सभा का।"
उन्होंने घंटी की तरफ़ देखा, जो अब मेरी जेब में थी।
"घंटी से पूछना चाहोगे?" उन्होंने कहा।
"नहीं," मैंने कहा। "घंटी से नहीं। आपसे।"
उस्ताद एक पल चुप रहे। फिर बोले, "कल सुबह दस बजे। पीपल के नीचे। और उससे पहले एक काम करना है।"
"क्या?"
"अपने घर के पुराने दरवाज़े के नीचे जो पैर का निशान है, वो तुमने देखा है।"
"हाँ।"
"उसे मिटाना मत। उसे उसी तरह रखना। क्योंकि जो आदमी अंदर आया, वो बाहर जाते वक़्त भी उसी जगह से गया होगा। और कल सभा में जब तुम सबके सामने खड़े हो, तो उन लोगों से कहना कि कोई उस दरवाज़े के आगे अपना पैर रखकर खड़ा होकर बताए कि वो निशान किसका है।"
मैं ठिठक गया।
"उस्ताद, वो निशान बाहर की तरफ़ मुड़ा है।"
"हाँ।"
"मतलब वो घर से बाहर जाने वाले का है।"
"हाँ।"
"तो फिर कोई क्यों खड़ा होगा?"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो सिर्फ़ उन लोगों में होती है जिन्होंने बहुत साल पहले किसी चीज़ को खोया हो और उसे फिर ढूँढ रहे हों।
"क्योंकि," उन्होंने कहा, "जो आदमी अंदर आया था, वो बाहर जाते वक़्त उसी दरवाज़े से गया। और उसे रोकने वाला कोई नहीं था। मतलब वो उस घर का जाना-पहचाना था।"
मेरी साँस रुक गई।
"मेरे घर का जाना-पहचाना?"
"मैं नहीं कहता कि वो तेरा जाना-पहचाना है," उस्ताद ने कहा। "मैं कहता हूँ कि वो घर का जाना-पहचाना है। फ़र्क़ है दोनों में।"
वो उठे। उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा, और उनका हाथ हल्का था, पर उसमें वो वज़न था जो सत्तर साल की उम्र में आता है।
"कल सभा में एक बात याद रखना," उन्होंने कहा। "जो सच बोले, उसका पक्ष लेना। जो चुप रहे, उसे नहीं छेड़ना। और जो झूठ बोले…" वो रुके। "…उसे बोलने देना। मत रोकना। क्योंकि झूठ जितना बोला जाता है, उतनी उसकी सिलाई खुलती जाती है।"
वो बाहर चले गए।
मैं दुकान में अकेला रह गया।
पापा ट्रंक के पास बैठे थे। उनका हाथ ट्रंक के ढक्कन पर था, और उनकी आँखें बंद थीं।
मैं उनके पास गया और उनके सामने बैठ गया।
"पापा।"
"हूँ।"
"आप किससे डरते हैं?"
उन्होंने आँखें नहीं खोलीं।
"मैं डरता नहीं।"
"झूठ।"
एक लंबी चुप्पी।
"पापा," मैंने कहा, "घंटी आज बहुत चुप है। और मुझे लगता है कि वो इसलिए चुप है कि उसे भी नहीं पता कि किससे डरना है।"
उन्होंने आँखें खोलीं। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। और फिर वो कुछ बोलने ही वाले थे कि बाहर से टिंकू की आवाज़ आई।
"उस्ताद! उस्ताद, जल्दी आओ!"
मैं दौड़ा।
गली के मुँह पर एक लड़का खड़ा था। पतला, उम्र पंद्रह-सोलह, हाथ में एक टूटी घड़ी। उसकी आँखें डरी हुई थीं।
"क्या हुआ?" मैंने पूछा।
"वो… वो काग़ज़ वाले…"
"कौन काग़ज़ वाले?"
"जो सुबह आए थे, टेम्पो वाले। वो अस्पताल की तरफ़ गए हैं। और साथ में चार आदमी हैं।"
"कौन?"
"मुझे नहीं पता," उसने कहा। "पर उनमें से एक ने कहा कि आज रात बारह बजे से पहले सब साफ़ हो जाना चाहिए।"
मैंने घड़ी देखी। घड़ी रुकी हुई थी। पर मुझे वक़्त पता था।
शाम छह बज चुके थे।
और अस्पताल की मुख्य सीढ़ी आज रात बारह बजे बंद होनी थी।
मैंने पीछे मुड़कर देखा।
पापा दुकान के दरवाज़े पर खड़े थे। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और कुछ नहीं कहा।
मैंने जेब से घंटी निकाली।
और उसी पल, जब मैंने उसे हवा में पकड़ा, वो बजी। एक बार। छोटी सी आवाज़। जैसे कोई सोते हुए आदमी ने करवट बदली हो।
और उसके बाद मैंने जो सुना, वो मुझे ठंडा कर गया।
"घर का दरवाज़ा," घंटी ने कहा। "अंदर से नहीं, बाहर से।"
मैंने उसे देखा।
"क्या मतलब?"
"जो अंदर आया," घंटी ने कहा, "वो दरवाज़े से नहीं आया। वो दरवाज़े के पीछे से आया।"
और फिर वो चुप हो गई।
मैं गली के बीचोंबीच खड़ा रह गया, हाथ में टूटी घड़ी वाला लड़का, सामने पापा, और उनके पीछे दुकान का वो अंधेरा, जिसमें पुराना बंद दरवाज़ा आज भी बंद था।
क्योंकि वो बंद नहीं था।
वो कभी बंद नहीं था।
हमें सिर्फ़ लगता था कि वो बंद है।
॥
उस रात मैं सोया नहीं।
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