The Mysterious Bell – Chapter 449
गली के लोग धीरे-धीरे आ रहे थे। कोई डरता हुआ, कोई सिर झुकाए, कोई बच्चों को साथ लिए। भोला भाई अपनी बीवी की बैसाखी पकड़े आ रहे थे। नसीमा बाई अपने साजिद के साथ, साजिद के हाथ में वही लाल कवर वाली कॉपी। नसीम भाई, रमेश भाई, किराने वाले बूढ़े काका — जो अब भी चना खाते हुए आ रहे थे। दुबे अंकल अपनी कुर्सी पर, थाने से उठाकर इस आँगन में ले आए थे, और अपने पास वो पीला पुराना लिफ़ाफ़ा रखा था।
शबनम आपा ने समोसे बाँटना शुरू किया।
"पेट भर लो," वो बोलीं, अपनी लोहे की चिमटी से समोसा उठाकर टिंकू की तरफ़ बढ़ाते हुए। "सच बोलने से पहले पेट भरना ज़रूरी है। भूखे आदमी की सच्ची बात भी कड़वी लगती है।"
टिंकू ने समोसा लिया और उसने मुझे देखा।
"उस्ताद," उसने ज़ोर से कहा। "घंटी आज भी अजीब बजेगी?"
मैंने उसे देखा, फिर आस-पास देखा। लोगों की निगाहें अब मुझ पर थीं। सब जानते थे कि घंटी मेरे पास है। कुछ लोग मुस्कुरा रहे थे, कुछ डरे हुए।
मैंने घंटी जेब से निकाली और उसे हवा में उठाया।
"देखते हैं," मैंने कहा।
और मैंने बजाई।
चरररर…
वो आवाज़ आई — दोहरी, फटी, चरचरी। जैसे एक घंटी नहीं, दो घंटियाँ बज रही हों, और उनके बीच कोई तीसरी फँसी हो। चरररर… और फिर चुप।
आँगन में दो पल के लिए सन्नाटा छा गया।
और फिर छत से बच्चे हँस पड़े। पाँचों, एक साथ।
"अरे, ये तो कुकड़ू-कूँ जैसी बजी," गुड्डू चिल्लाया।
"ना, ये तो मेरी अम्मी की घरघर वाली केतली जैसी," चिंटू ने कहा, और हँसी दुगनी हो गई।
मैंने घंटी जेब में रखी और सिर हिलाया।
आँगन में हँसी का एक हल्का सा झोंका आया। जो डरे हुए आए थे, उनके कंधे थोड़े नरम पड़े। शबनम आपा ने चाय बाँटी और कहा, "देखा, हँसी भी ज़रूरी है। डरे हुए आदमी का सच ठीक से नहीं निकलता।"
पाँच बजने में दस मिनट बाकी थे।
तभी मैंने देखा — शालिनी गेट से आ रही थी।
उसके कंधे पर काला बैग था, जिसमें वो रिपोर्ट थी। उसके हाथ काँप रहे थे। नहीं, काँप नहीं रहे थे, वो हिल रहे थे। जैसे उसके अंदर की कोई चीज़ उसे छोड़कर भागना चाहती हो, और वो ज़बरदस्ती उसे पकड़े हुए आ रही हो।
वो सीधे मंच की तरफ़ बढ़ी। माइक के सामने वाली कुर्सी पर रखा उसका बैग मेज़ पर धरा, और उसने एक गहरी साँस ली।
मैं दूर खड़ा था — पीपल के पास, उस्ताद के बगल में। मैंने उसकी तरफ़ देखा और धीरे से सिर हिलाया।
सिर्फ़ इतना।
और उसने भी सिर हिलाया। बहुत छोटा सा। पर हाँ।
उसकी आँखों में वो डर अब भी था, पर उसके नीचे कुछ और था। वो "कुछ और" जो पिछले कुछ दिनों में उसके अंदर जमा हुआ था — उसकी माँ के जाने का गुस्सा, उसके पापा के झूठ का दर्द, उसके स्कूल के बच्चों के सामने झुके सिर का धब्बा, और उस एक सवाल का जवाब जो उसने खुद से पूछा था और अब सबके सामने पूछने आई थी।
आँगन भरने लगा।
मैंने देखा — रज़ा सलीम भी आए थे। अपने कंधे पर वो लाल जिल्द वाला रजिस्टर लिए, और उनके पीछे वो काला दुबला आदमी था, अब भी चुप, अब भी छाया जैसा, पर अब किसी ने उसकी तरफ़ उँगली नहीं उठाई। जैसे आँगन के लोग उसे पहले से जानते हों, और उसके आने का इंतज़ार कर रहे हों।
मीरा दूसरी तरफ़ से आ रही थी। उसका कैमरा तिपाई पर, लाल बत्ती जलती हुई। वो मेरे पास से गुज़री और उसने धीरे से कहा, "आज रिकॉर्डिंग बंद नहीं होगी। आज जो बोलेगा, सब जाएगा।"
"ज़रूर," मैंने कहा।
शाम पाँच बजे।
दुबे अंकल उठे। उन्होंने अपनी पीली पुरानी कॉपी खोली, एक पन्ना पलटा, और बिना माइक के आवाज़ लगाई, "सब सुनो। ये सभा मैंने नहीं बुलाई। ये सभी ने मिलकर बुलाई है। और आज यहाँ कोई काग़ज़ नहीं लिखा जाएगा, कोई अंगूठा नहीं लिया जाएगा। सिर्फ़ बात होगी।"
कोई नहीं बोला। आँगन में एक गहरी साँस जैसी चुप्पी छा गई।
"पहले शालिनी बेटी बोलेगी," दुबे अंकल ने कहा। "वो स्कूल की इंजीनियर है। और उसके हाथ में वो काग़ज़ है जो इस पूरी गली को बेचने की तैयारी में था।"
शालिनी माइक के पास आई।
उसने अपना बैग मेज़ पर खोला। उसके हाथ अब भी काँप रहे थे — काग़ज़ निकालते वक़्त काग़ज़ का कोना मेज़ से टकराया और एक हल्की सी आवाज़ हुई।
उसने माइक को अपने मुँह के पास खींचा। एक बार, दो बार उसने होंठ खोले, पर आवाज़ नहीं निकली। आँगन में चुप्पी और गहरी हो गई।
मैंने दूर से उसकी तरफ़ देखा। मेरे पास कुछ नहीं था — न कोई जादू, न कोई शक्ति, बस एक सीधा सा सच। कि आज वो अकेली नहीं है। और शायद यही उसे बोलने के लिए काफ़ी था।
उसने गहरी साँस ली।
"मैं," उसकी आवाज़ काँपी, "मैंने झूठी रिपोर्ट पर हस्ताक्षर नहीं किए।"
आँगन में हल्की सी हलचल हुई।
"मुझ पर दबाव डाला गया," वो बोली, आवाज़ अब थोड़ी साफ़। "मेरे पापा की कंपनी, मज़दूर… मुझे डराया गया कि अगर मैंने सच्ची रिपोर्ट दी, तो सब बंद हो जाएगा।"
किसी ने कुछ नहीं कहा। पर मैंने देखा — कई लोगों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा। जैसे हर कोई अपने अंदर के किसी दरवाज़े को खुलते हुए महसूस कर रहा हो।
शालिनी ने काग़ज़ उठाया।
"ये वो रिपोर्ट है जो मैंने पहले लिखी थी," उसने कहा। "सच्ची। और ये लाल पेन से कटी हुई है। मेरे पापा के हाथ से नहीं — किसी और के हाथ से। और ये… ये वो झूठी रिपोर्ट है जो मुझसे ज़बरदस्ती बनवाई गई। इस पर मेरे हस्ताक्षर की जगह अभी भी खाली है।"
उसने माइक से थोड़ा दूर देखा — गेट की तरफ़।
और तभी रोशनी गई।
एक झटके में। न पहले कोई जगमगाहट, न कोई आवाज़। बस एक पल पहले सब कुछ दिख रहा था, और अगले पल सब अंधेरा।
आँगन में सन्नाटा नहीं था — शोर था। कुर्सियाँ खिसकीं, किसी ने चीखा, किसी ने बच्चे का हाथ पकड़ा, किसी ने शबनम आपा की केतली पलट दी। चाय की गरम चीज़ किसी के पैरों पर गिरी और वो उछल पड़ा।
"माइक छोड़ो!" किसी ने चिल्लाया।
"बच्चे कहाँ हैं?"
"टिंकू! सानिया! यहीं रुको!"
मैंने जेब से घंटी निकाली और हवा में उठाई।
"घंटी!" मैंने ज़ोर से कहा।
पर घंटी चुप थी।
नहीं, वो चुप नहीं थी। मैंने महसूस किया — वो काँप रही थी। मेरी हथेली में, बिना आवाज़, बिना शब्द। जैसे वो खुद डर गई हो।
"घंटी, बोल," मैंने फुसफुसाया।
और तभी, अंधेरे में, शालिनी की आवाज़ आई।
"छोड़ो! छोड़ो मेरा बैग!"
और फिर एक ज़ोरदार धक्का। किसी के गिरने की आवाज़। शालिनी की चीख।
मैं भागा — अंधेरे में, कुर्सियों के बीच से, लोगों के कंधों के बीच से। मेरा पैर एक स्टूल से टकराया, मैं लड़खड़ाया, पर रुका नहीं।
"शालिनी!" मैं चिल्लाया।
"बैग… मेरा बैग…"
मैं उसकी आवाज़ की तरफ़ बढ़ा। मेरा हाथ उसके कंधे पर पड़ा। वो ज़मीन पर बैठी थी, हाथ अभी भी हवा में, जैसे किसी चीज़ को पकड़ना चाहती हो जो अब वहाँ नहीं थी।
"बैग ले गया," वो फुसफुसाई, और उसकी आवाज़ में वो डर था जो सिर्फ़ तब होता है जब आपकी मेहनत, आपका सच, आपके ही हाथों से छिन जाए।
"कौन?" मैंने पूछा।
"पता नहीं… अंधेरा था… किसी ने धक्का दिया…"
और ठीक उसी पल — जैसे किसी ने ऊपर वाले से कहा हो — रोशनी लौट आई।
पहले एक बल्ब जला, फिर दूसरा, फिर पूरा आँगन रोशनी में नहा गया। सब कुछ फिर से दिखने लगा — कुर्सियाँ बिखरी, शबनम आपा की पलटी केतली, टिंकू का पीला चेहरा छत से नीचे झाँकता हुआ, मीरा का कैमरा अब भी चालू।
मैंने मेज़ की तरफ़ देखा।
शालिनी का बैग गायब था।
मेज़ पर सिर्फ़ एक काग़ज़ बचा था — वो रिपोर्ट जो उसने अभी हवा में उठाई थी। वो भी अब नहीं थी।
मैंने गेट की तरफ़ देखा।
बबलू पांडे वहाँ नहीं था।
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