The Mysterious Bell – Chapter 448
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
उस्ताद ने अपना रूमाल जेब में रखा और अपनी सिलाई मशीन की तरफ़ देखा, जो उनकी दुकान में अकेली पड़ी थी, और जो आज भी टिक-टिक नहीं कर रही थी।
"तो चलो," उन्होंने कहा। "कुछ देर और रुक जाते हैं।"
और हम चले — पीपल की छाया से, चबूतरी से, टूटी मेज़ से, और उस रास्ते की तरफ़ जहाँ एक बंद रजिस्टर खुलने वाला था, और जहाँ हमें पता था कि कुछ ऐसा निकलेगा जो हम सबको बदल देगा। क्योंकि सच बोलना, और सच सुनना — दोनों में से कोई भी आसान नहीं होता। और आज हम सब सुनने वाले थे।
घंटी ने जेब में धीरे से कहा —
"अभी नहीं… अभी आगे बढ़…"
और मैं आगे बढ़ गया।
॥
पीपल की छाया से हम चले — मैं, उस्ताद, और रज़ा सलीम, और वो काला दुबला आदमी जो हमारे पीछे चुपचाप चल रहा था, जैसे उसकी परछाई भी उसकी बात न सुन पाए।
रास्ते में उस्ताद ने रज़ा सलीम से पूछा, "रजिस्टर कहाँ खोलोगे?"
"दुकान पर," रज़ा सलीम ने कहा। "वहीं जहाँ से लाया था।"
"ना," उस्ताद ने रुककर कहा। "जहाँ खोलो, वहाँ दो गवाह रहें। यही मेरी माँ का रिवाज़ था।"
रज़ा सलीम ने उस्ताद की तरफ़ देखा। एक पल सोचा, फिर बोला, "ठीक है। उस्ताद की दुकान।"
हम उस्ताद की दुकान पहुँचे। सिलाई मशीन अब भी टिक-टिक नहीं कर रही थी। उस्ताद अपनी लकड़ी की छोटी स्टूल पर बैठे, रज़ा सलीम ने लाल जिल्द वाला रजिस्टर मेज़ पर रखा और अपनी काली अंगूठी वाली उँगली से उसका किनारा दबाया। मैंने देखा — उस उँगली की नाखून के नीचे वो काली बूँदें अब भी नहीं सूखी थीं, जैसे उसका शरीर खुद नहीं जानता कि वो किस पक्ष में है।
रजिस्टर खुला। पन्ने पुराने, किनारे उखड़े, पर स्याही अब भी साफ़। पहले पन्ने पर सात नाम, सात अंगूठे। पहला नाम, दूसरा, तीसरा… छठे तक सब ठीक।
सातवें पर मेरी निगाह रुक गई।
सातवाँ नाम — जगदीश यादव।
मेरे दादा।
मैंने साँस रोक ली।
"ये तो पता था," मैंने धीरे से कहा।
"पता था, पर ध्यान से देखो," रज़ा सलीम ने कहा, और अपनी उँगली उस सातवें अंगूठे के नीचे ले गया। "ये अंगूठा जगदीश यादव का है। नाम भी उनका। पर…"
वो रुक गया।
"पर क्या?" मैंने पूछा।
"पर ये अंगूठा उन्होंने अपनी मर्ज़ी से नहीं लगाया," रज़ा सलीम ने कहा। "ये मजबूरी का अंगूठा है।"
उस्ताद ने अपना मोटा चश्मा ऊपर किया और पन्ने के पास झुके। उन्होंने उस अंगूठे की स्याही को गौर से देखा, बगल की स्याही से तुलना की, और फिर सीधे होकर बैठ गए।
"हाँ," उस्ताद ने कहा। "ये अंगूठा बाद में लगा है। बाकी अंगूठों की स्याही एक ही है। ये अलग है। ये बाद में लगा।"
मेरे पेट में कुछ ठंडा सा फैल गया।
"और उस काला दुबला आदमी ने कहा था कि सातवाँ नाम ज़िंदा है?" मैंने पूछा, पीछे मुड़कर।
वो अब भी दरवाज़े के पास खड़ा था। चेहरा आधा अंधेरे में, आधा रोशनी में — बत्तीस दाँत दिखाकर नहीं, पर आँखों में कुछ ऐसा जो सीधा मुझे देख रहा था।
"हाँ," उसने कहा। "सातवाँ नाम ज़िंदा है।"
"कौन है?" मैंने पूछा।
"अभी नहीं," उसने कहा। "पहले ये बताओ, तुम्हारे पास जो कड़ी है, वो रखोगे या नहीं?"
उस्ताद ने कड़क आवाज़ में कहा, "पहले तुम अपनी ज़ुबान से कुछ बोलो। कहो तुम कौन हो?"
वो आदमी मुस्कुराया। धीरे से, ऐसे जैसे कोई पुराना ज़ख्म खुल रहा हो।
"मेरा नाम नहीं लिखा गया," उसने कहा। "पर मेरा अंगूठा इस रजिस्टर के पन्नों पर है। सातवें अंगूठे के नीचे, जहाँ नाम की जगह खाली है, वहाँ देखो।"
मैंने रजिस्टर के उस हिस्से को करीब से देखा। सातवें अंगूठे के बगल में एक जगह धुंधली थी। ऐसा लगा जैसे कोई नाम लिखकर फिर मिटा दिया गया हो। स्याही की परत उखड़ी हुई थी, और उस उखड़ी स्याही के नीचे काग़ज़ का सफ़ेद हिस्सा अभी भी चमक रहा था।
"ये जगह खुरची गई है," उस्ताद ने कहा। "नाखून या चाकू से, किसी ने नाम मिटाया है।"
"हाँ," वो आदमी बोला। "क्योंकि जिसका नाम वहाँ लिखा था, उसे ज़िंदा नहीं रहना चाहिए था।"
रज़ा सलीम ने रजिस्टर बंद किया और अपनी काली अंगूठी वाली उँगली से उसकी जिल्द को दबाया।
"मैं सिर्फ़ इतना कहूँगा," रज़ा सलीम ने कहा। "ये जो आदमी तुम्हारे सामने खड़ा है, इसे मैं बीस साल से जानता हूँ। ये रणवीर का आदमी नहीं है। ये उस दुनिया का आदमी है जो इस गली की नींव में दबी हुई है। और मेरा बाप, सलीम अहमद, मरने से पहले इसी से मिला था।"
രാത…
Wait, no. Let me continue properly.
"तो क्या वो हमारे साथ है?" मैंने पूछा।
"वो अपने साथ है," रज़ा सलीम ने कहा। "और आज शाम पाँच बजे, स्कूल के आँगन में, वो खुद अपना नाम बोलेगा।"
वो काला दुबला आदमी उस्ताद की दुकान से बाहर निकला, दरवाज़े पर रुका, और बिना पलटे कहा, "आज शाम सबको अपनी जगह पता चल जाएगी। किसका नाम नीचे रहा, किसका ऊपर।"
और वो चला गया, जैसे हवा में मिल गया।
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर कोई हँसी नहीं थी, कोई डर भी नहीं। पर उनकी उँगलियाँ अपने रूमाल को बार-बार मोड़ रही थीं, और मुझे लगा कि उस्ताद आज पचास साल पुराने किसी सवाल को अपने सामने खड़ा देख रहे थे।
"उस्ताद," मैंने कहा। "आज शाम…"
"आज शाम सब कुछ खुलेगा," उस्ताद ने कहा। "पर खुलेगा तब, जब उसकी शक्ल सबके सामने आएगी। और तब तक मेरा सुझाव है — तुम अपना काम करो, अपनी घंटी संभालो, और अपने घर जाओ। स्कूल के आँगन में पाँच बजे पहुँचना है।"
मैंने सिर हिलाया।
जब मैं दुकान से निकला, आसमान पीला पड़ रहा था। शाम हो रही थी। और मेरे अंदर कुछ कह रहा था कि आज की शाम कुछ नया लेकर आएगी। सिर्फ़ सवाल नहीं, सिर्फ़ रजिस्टर नहीं। आज के बाद गली की हवा भी बदलने वाली थी।
शाम चार बजकर पैंतालीस मिनट।
स्कूल का आँगन।
नेम का पुराना पेड़ एक तरफ़, और सामने दो कुर्सियाँ और एक माइक का स्टैंड। पीछे स्कूल की छत, प्लास्टर का वो उभरा हुआ हिस्सा जो अब भी टूटा हुआ था, चारों तरफ़ बच्चों के झूलते पैर।
बच्चों की टोली स्कूल के पीछे वाली सीढ़ी से छत पर चढ़ चुकी थी। सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू और टिंकू। पाँचों छत के किनारे पेट के बल लेटे थे, ऐसे जैसे गली के पाँच जासूस आज कोई बड़ी खबर पकड़ने आए हों।
टिंकू ने रफ़ीक़ के कान में कहा, "अगर घंटी फिर अजीब बजी, तो?"
"तो क्या?" रफ़ीक़ ने कहा।
"तो मतलब आज कुछ होगा। घंटी जब अजीब बजती है, कुछ न कुछ होता है।"
"तू बस अपना काम कर," सानिया ने टोका। "मुझे पता है आज किसका सच खुलेगा।"
"किसका?" चिंटू ने पूछा।
"वो जो गेट पर खड़ा है," सानिया ने धीरे से कहा।
सब ने गेट की तरफ़ देखा।
बबलू पांडे। गेट के बाहर, स्कूल की दीवार से सटी, एक हाथ जेब में, दूसरे हाथ में पान। मुँह में पान घुमा रहा था, और धीरे-धीरे मुस्कुरा रहा था। उसकी सोने की चेन अब भी गले में थी, पर आज कुछ ऐसा लगा जैसे वो चेन भारी हो गई हो। जैसे होली नहीं, शादी नहीं — आज उसकी मुस्कान उसके चेहरे पर पहली बार फिट नहीं हो रही थी।
और फिर शबनम आपा आई।
दो बड़ी लोहे की थालियाँ, एक हाथ में समोसों से भरी, दूसरी में गरम चाय की केतली और मिट्टी के कुल्हड़। उनके पीछे उनका भांजा, जो गुमटी से बाहर कभी नहीं निकलता था, आज पीछे-पीछे आ रहा था, एक और थाली लिए।
"सब यहाँ आओ," शबनम आपा ने आवाज़ लगाई। "पहले पेट भरो, फिर बात।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno