The Mysterious Bell – Chapter 447
"फिर कुछ नहीं हुआ," मैंने कहा। "और यही सबसे बड़ी बात है। मैंने सोचा था कि जब वो सच बोलेंगे तो आसमान गिरेगा, गली में तूफ़ान आएगा, सब कुछ उलट-पुलट हो जाएगा। पर हुआ ये कि उन्होंने सच बोला, मैंने सुना, हम दोनों रोए, और फिर अगली सुबह चाय पी। और मैंने अपनी साइकिल पर तेल डाला। उतना ही हुआ।"
"बस?" शालिनी ने पूछा।
"बस," मैंने कहा। "पर उसके बाद जो हुआ वो 'बस' नहीं था, वो बहुत कुछ था। उसके बाद जब भी मैंने उनकी तरफ़ देखा, मुझे ये नहीं लगा कि वो मेरे पापा हैं जो सब जानते हैं और मैं उनका बेटा हूँ जिसे कुछ नहीं पता। मुझे लगा कि वो भी एक आदमी हैं, जो एक दिन डर गए थे और फिर पाँच साल में उस डर से लड़ते रहे। और उस दिन से मैं उनसे डरना बंद कर दिया — सिर्फ़ इज़्ज़त करने लगा।"
शालिनी ने अपना रूमाल मोड़कर जेब में रखा। उसने मेज़ पर पड़े काग़ज़ों को समेटा, एक-एक करके, और अपने बैग में रख दिया। फिर उसने बैग का चेन खींचा।
"मैं मंच पर बोलूँगी," उसने कहा, और उसकी आवाज़ साफ़ थी, "पर एक बात मान लो — मैं पूरी बात नहीं कहूँगी। मैं इतना नहीं कहूँगी कि पापा ने कहा था। मैं सिर्फ़ ये कहूँगी कि मुझे दबाव दिया गया और मैंने झूठी रिपोर्ट पर हस्ताक्षर किए।"
"ठीक है," मैंने कहा। "कम से कम शुरुआत तो होगी।"
"पर," उसने कहा, और उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में वो डर फिर लौटा, "अगर पापा का काम गया, तो वो मुझे कभी माफ़ नहीं करेंगे।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
उस्ताद ने कहा, "कल सुबह वो भी वहीं होंगे।"
"नहीं होंगे," शालिनी ने कहा। "वो सफ़ेद कुर्ते वाले के साथ हैं। मुझे पता है कि वो आज रात तक पापा को कुछ और न कहें, पर कल सुबह से पहले वो उन्हें मना लेंगे। वो बड़े साहब का आदमी है।"
"फिर तो ठीक है," शबनम आपा ने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार पुराना कड़कपन लौटा था, "अगर तुम्हारे पापा भी वहाँ होंगे, तो तुम्हारी बात सुनेंगे।"
"अगर सुनेंगे," शालिनी ने कहा।
"सुनेंगे," उस्ताद ने कहा। "मैं पचास साल से भाई से बात नहीं कर रहा, फिर भी उसने आज मेरे सामने आकर खड़े होकर बात सुनी। तुम्हारे पापा भी सुनेंगे, बेटी। शायद आधी सुनेंगे, शायद चौथाई सुनेंगे। पर सुनेंगे।"
शालिनी ने सिर हिलाया। फिर उसने कहा, "मैं अब चलूँ? मुझे जाना चाहिए, पापा से बात करनी है।"
"चलो," मैंने कहा।
"आप मेरे साथ नहीं आएँगे?"
मैंने देखा। उसकी आँखों में वो आस थी जो कोई भी आदमी जानता है, वो आस जो सिर्फ़ एक डर के समय होती है — कोई साथ हो, कोई पीछे खड़ा हो, कोई सामने हो। पर मैं जानता था कि ये सफ़र उसका है, और मैं वहाँ नहीं जा सकता। कुछ चीज़ें अकेले ही करनी पड़ती हैं। मैंने सिर्फ़ इतना कहा, "जब तुम पापा से बात करो, तो इतना कहना — उनसे किसी ने कुछ नहीं छीना। उन्होंने खुद कुछ छोड़ा था। अब उन्हें खुद ही उठाना पड़ेगा।"
वो खड़ी हो गई।
तभी पीपल के नीचे, दूर, चबूतरी के उस पार, कुछ हलचल हुई। मैंने देखा, और मुझे लगा कि कोई दौड़ा-दौड़ा आ रहा है। सानिया दौड़कर आई, हाँफती हुई, उसके हाथ में कोई काग़ज़ था।
"भैया," उसने कहा, "रज़ा सलीम जी आए हैं। वो रजिस्टर लाए हैं और साथ में एक आदमी भी।"
"कौन आदमी?" मैंने पूछा।
"पता नहीं," सानिया ने कहा, "पर वो सफ़ेद कुर्ते में नहीं है। वो काला है, दुबला है। और रज़ा सलीम जी कह रहे हैं कि ये वो आदमी है जो बाईस साल से उनके साथ काम करता है, और वो सभी काग़ज़ों के बारे में जानता है।"
शालिनी ने मेरी तरफ़ देखा।
"मुझे नहीं पता," मैंने कहा, "पर मुझे लगता है कि आज कुछ बड़ा होने वाला है।"
शालिनी ने अपना बैग कंधे पर रखा। उसने अपना रूमाल जेब से निकाला और उसे सीधा किया, और फिर वापस जेब में रख लिया।
"अच्छा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो डर नहीं था, थोड़ी सी थकान थी। "फिर मैं चलती हूँ।"
वो मुड़ी और चलने लगी।
तभी मेरे कान में घंटी बोली — और इस बार उसकी आवाज़ पहले से साफ़ थी, जैसे कोई पुराना रेडियो सही तरंग पकड़ लेता है, और भीतर से छोटी-छोटी आवाज़ें साफ़ आने लगती हैं —
"आधा जोड़… पूरा नहीं…"
मैंने शालिनी को रोक लिया।
"रुको," मैंने कहा।
वो रुकी और पलटी।
"घंटी कह रही है कि जो हुआ, वो आधा जोड़ है," मैंने कहा। "तुमने सच बताया, तुमने काग़ज़ दिए, तुमने दबाव माना — पर जब तक तुम अपने पापा के सामने ये नहीं कहोगी, तब तक ये आधा है।"
"मैं कहूँगी," उसने कहा।
"नहीं," मैंने कहा। "मुझसे कहने से कुछ नहीं होगा। मेरे सामने कहने से भी कुछ नहीं होगा। यहाँ खड़े उस्ताद, मीरा, टिंकू, शबनम आपा — इनके सामने कहने से भी पूरा नहीं होगा। पूरा तभी होगा जब कल सुबह कल सभा में, तुम्हारे सामने खड़े अपने पापा से तुम कहोगी कि 'मैंने झूठी रिपोर्ट पर हस्ताक्षर किए, क्योंकि तुम्हारा डर मेरे सीने पर चढ़ गया था।' और जब तुम ये कहोगी, तब तुम्हारा पापा बैठे नहीं रह सकेंगे। उन्हें खड़े होना पड़ेगा। और जब वो खड़े होंगे, तो या तो तुम्हें गले लगाएँगे, या तुम्हें थप्पड़ मारेंगे। दोनों में से कुछ भी हो, वो पहली बार सच बोलेंगे।"
शालिनी ने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में अचानक कुछ बदला। वो डर नहीं गया, वो कुछ और था। शायद ये समझ कि सच बोलने से रिश्ता टूटता नहीं, सिर्फ़ उसका पुराना रूप टूटता है।
उसने कहा, "अब मैं चलूँ?"
"चलो," मैंने कहा।
वो गई। बैग कंधे पर, रूमाल जेब में, काग़ज़ अंदर, और एक सवाल जो अब उसके पास नहीं, उसके पापा के पास था।
मैं वहीं खड़ा रहा। घंटी ने मेरे हाथ में धीरे से कहा —
"अभी नहीं… अभी आधा…"
मैंने घंटी जेब में रखी, और पलटा।
तभी मेरे पीछे से उस्ताद ने कहा, "बेटा, एक बात सुन ले।"
मैंने पलटकर देखा।
"तुम उस लड़की पर बहुत ज़ोर डाल रहे हो," उन्होंने कहा, धीरे से, पर साफ़। "वो अभी भी डर रही है। तुम्हें लगता है कि वो मंच पर बोलेगी। पर मुझे लगता है, वो कल तक सो नहीं पाएगी। और कल सुबह भी शायद कुछ और सोच ले।"
"तो फिर?" मैंने पूछा।
"तो फिर तुम ये मत सोचना कि ये तुम्हारा काम है," उस्ताद ने कहा। "तुमने उसे रास्ता दिखाया। अब वो चले या न चले, उसका काम है।"
"पर…"
"पर क्या?" उस्ताद ने कहा, और उन्होंने अपना चश्मा थोड़ा ऊपर किया। "तुम्हें लगता है कि तुम हर टूटे हुए रिश्ते को जोड़ सकते हो? तुम्हें लगता है कि तुम्हारे पास घंटी है और तुम सब कुछ ठीक कर दोगे? बेटा, अगर तुम ऐसा सोचते हो, तो तुम घंटी नहीं, अपना घमंड जोड़ रहे हो।"
मैं चुप हो गया।
"मैंने भी यही सोचा था," उस्ताद ने कहा। "पचास साल पहले। सोचा था कि मैं भाई को जोड़ दूँगा, माँ को जोड़ दूँगा, सब ठीक कर दूँगा। पर तब तक सब टूट चुका था। और मैं सिर्फ़ अपने हाथ मलता रह गया। क्योंकि जोड़ना सिर्फ़ एक इंसान का काम नहीं होता, बेटा। जोड़ना दोनों का काम होता है। तुम ज़ोर लगाओ, पर सामने वाला हाथ नहीं बढ़ाए, तो जोड़ नहीं होता।"
मैंने सिर हिलाया। मैंने कुछ नहीं कहा, पर अंदर कहीं मुझे लगा कि वो सही कह रहे थे। मुझे अभी भी लगता था कि अगर मैं बोलता रहूँ, तो सब हो जाएगा। पर शायद ऐसा नहीं होता। शायद कुछ चीज़ें होने के लिए छोड़नी पड़ती हैं। शायद कुछ सच बोले जाने का इंतज़ार करते हैं, ज़ोर दिए जाने का नहीं।
और फिर, जैसे ठीक इसी वक़्त, सानिया दौड़कर वापस आई।
"भैया," उसने कहा, हाँफते हुए। "रज़ा सलीम जी कह रहे हैं कि वो रजिस्टर खोलेंगे। और साथ में वो दुबला आदमी है, उसने कहा — मुझे लगता है कि सातवाँ नाम अभी भी ज़िंदा है।"
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