The Mysterious Bell – Chapter 428
और मुझे लगा कि उनके चेहरे पर सबसे पहले जो आया, वो डर नहीं था। शर्म थी।
इतनी साफ़ शर्म कि मैंने नज़र हटा ली।
अंदर से माँ की आवाज़ आई।
"क्या टूटा?"
वो दौड़कर बाहर आईं — साड़ी का पल्लू कमर में खोंसते हुए, माथे पर चंदन का टीका आधा बहा हुआ, हाथ में हिसाब की कॉपी। उन्होंने फ़र्श पर गिलास देखा, फिर पापा का चेहरा देखा, और फिर वो चुप हो गईं।
"शंकर," उन्होंने धीरे से कहा। "तुम्हारा चेहरा…"
काजल पीछे-पीछे आई, हाथ में लालटेन उठाए। उसने लालटेन ऊपर की और उसकी पीली रोशनी में पापा के चेहरे की पीलापन और भी साफ़ दिखी। फिर उसने मेरी हथेली की तरफ़ देखा और उसकी साँस रुक गई।
"ये पापा का…"
"हाँ," मैंने कहा।
माँ ने एक कदम आगे बढ़ाया, फिर रुक गईं। वो पेचकस को देख रही थीं, पर ऐसे नहीं जैसे पहली बार देख रही हों। ऐसे, जैसे बहुत साल पहले देखा था और उम्मीद की थी कि फिर कभी नहीं देखेंगी।
"ये तुम कहाँ से लाए?" माँ ने पूछा।
"साहब के डिब्बे के तल्ले से," मैंने कहा।
माँ ने कुछ नहीं कहा। बस पापा की तरफ़ देखा।
और पापा — पापा बहुत देर तक चुप खड़े रहे। उनका शरीर एक जगह पर स्थिर था, पर उनकी आँखों में कुछ ऐसा चल रहा था जैसे पुरानी फ़िल्म रिवाइंड हो रही हो। उन्होंने अपनी कमीज़ के छोर को देखा, फिर आँगन की ज़मीन को, फिर उस टूटे गिलास के टुकड़ों को, जैसे उनमें उनका जवाब बंद हो।
काजल ने लालटेन नीचे रखी और अपने पॉकेट से रुमाल निकालकर पापा के हाथ पर पड़ी चाय पोंछने लगी। पापा ने हाथ हटा लिया। काजल का हाथ हवा में रह गया, फिर धीरे से नीचे आ गया।
"पापा," मैंने कहा। "मैं कुछ पूछने से पहले एक बात कहना चाहता हूँ।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"ये पेचकस साहब के डिब्बे में था। साहब मुझे तोहफ़े भेजते हैं। और तोहफ़े में मेरे ही घर की चीज़ आती है। अब चाहे आप कुछ भी कहें, पर मेरे दिमाग़ में एक ही बात आ रही है — साहब को मालूम है कि ये पेचकस हमारा है। और साहब मालूम होने के बाद भी मुझे ये भेज रहे हैं। इसका मतलब वो कुछ कह रहे हैं।"
पापा ने आँखें बंद कर लीं।
"नहीं," उन्होंने कहा। "वो कुछ नहीं कह रहे। वो सिर्फ़ दिखा रहे हैं कि उनके पास क्या-क्या है।"
माँ ने कहा, "शंकर, अंदर चलो। सुबह बात करेंगे।"
"नहीं," पापा ने कहा। "अब बात होगी।"
उनका हाथ मेरी तरफ़ बढ़ा, और मैंने पेचकस उनकी हथेली पर रख दिया। उन्होंने उसे उँगलियों में दबाया — पूरी ताक़त से नहीं, पर इतना कि हत्थे पर उनकी उँगलियों के निशान पड़ जाएँ।
बहुत देर तक वो उसे ऐसे ही देखते रहे।
फिर उन्होंने धीरे से, बहुत धीरे से कहा, जैसे हर शब्द उनके मुँह से निकलने से पहले किसी पुरानी मेज़ पर तोला जा रहा हो, "ये चीज़ रणवीर के दफ़्तर से कभी बाहर नहीं आनी चाहिए थी।"
माँ ने होंठ कस लिए।
काजल ने मेरी तरफ़ देखा, फिर पापा की तरफ़, फिर लालटेन की लौ में कुछ ढूँढ़ने लगी।
कमरे में सिर्फ़ अगरबत्ती का धुआँ चल रहा था।
मैंने एक गहरी साँस ली और पूछा, "पापा, आपने ये पेचकस खोया था, या कहीं रखा था?"
पापा ने सिर उठाया।
उनकी आँखों में कुछ था जो पहले कभी नहीं दिखा था। कोई डर नहीं, कोई शर्म नहीं। कुछ और — एक तरह की सफ़ाई, जैसे बरसों से बंद कमरे में पहली बार खिड़की खुली हो।
"मैंने इसे खोया नहीं था," उन्होंने कहा।
माँ ने कुछ कहना चाहा, पर पापा ने हाथ उठाकर उन्हें रोक दिया। पहली बार मैंने देखा कि माँ उनके इशारे पर रुक गईं।
पापा ने पेचकस को सीने से लगाया, और इतना ही बोले — "मैंने इसे खुद उसके दराज़ में रखा था। अपनी चुप्पी का सबूत बनाकर।"
मैं कुछ कह नहीं पाया।
काजल ने लालटेन को वहीं रख दिया, क्योंकि उसके हाथ काँप रहे थे।
माँ दीवार के सहारे खड़ी हो गईं।
और आँगन में एक पल के लिए ऐसा लगा कि गली की सारी आवाज़ें भी रुक गई हैं — पीपल की पत्तियाँ, दूर का पंप, नाली का पानी। सब कुछ चुप।
मैंने धीरे से पूछा, "क्यों?"
पापा ने आँखें मेरी तरफ़ कीं।
"क्योंकि जो अपना औज़ार किसी के दराज़ में रख आए," उन्होंने कहा, "वो ये कहकर आता है कि मैं तुम्हारा हूँ। और जो अपना औज़ार अपने पास रखे, वो ये कहता है कि मैं अभी भी अपना हूँ। मैं उस दिन ये नहीं कह पाया कि मैं अपना हूँ। इसलिए अपना औज़ार वहीं छोड़ आया।"
उनके होंठ काँपे।
"और उस दिन के बाद जब भी मैंने कोई पेचकस उठाया," उन्होंने कहा, "मुझे लगा कि मैं किसी और का औज़ार उठा रहा हूँ।"
माँ ने कुछ कहा — बहुत धीमी आवाज़ में, मुझे सुनाई नहीं दिया।
पर पापा ने उनकी तरफ़ देखकर सिर हिलाया। फिर मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश।"
"हाँ।"
"सुबह तक मुझे ये पेचकस अपने पास रखने दे।"
मैंने उनके हाथ की तरफ़ देखा। पेचकस उनकी हथेली पर पड़ा था — पुराना, चिकना, थका हुआ।
"रखिए," मैंने कहा। "पर सुबह पीपल पर, सबके सामने, ये आपके हाथ में ही रहेगा।"
पापा ने एक लंबी साँस ली।
"हाँ," उन्होंने कहा। "अब ये मेरे हाथ में ही रहेगा।"
काजल ने चुपचाप टूटे गिलास के टुकड़े उठाए। माँ ने उसकी मदद की, और दोनों चुपचाप अंदर चलीं — माँ पहले, काजल पीछे। काजल दरवाज़े पर रुकी और पीछे मुड़कर मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ था, जो मुझे रात भर परेशान करने वाला था।
वो बोली, "अंकुश, कल सुबह जब रजिस्टर खुलेगा, तब पीपल पर पापा के हाथ में ये पेचकस होगा। और अगर सलीम बक्श उस वक़्त वहाँ मौजूद हो, तो सोच — उसका चेहरा क्या होगा।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
वो अंदर चली गई।
मैं आँगन में अकेला खड़ा रह गया। पापा वहीं मूँड़े पर बैठे थे, पेचकस सीने से लगाए, आँखें बंद किए।
और मेरे कान में घंटी की आवाज़ आई, बहुत धीरे — पहली बार ऐसी आवाज़ में जैसे वो खुद भी कुछ गिन रही हो।
"अब समझा?"
"क्या?"
"जो चीज़ रणवीर के दराज़ में रखी जाती है," घंटी ने कहा, "वो चीज़ चुप नहीं होती। वो बस इंतज़ार करती है कि उसका मालिक उसे वापस लेने आए।"
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
"और आज वो चीज़ वापस आ गई," घंटी ने कहा। "पर वापस आने के साथ एक सवाल भी लाई है। जो दराज़ में रखा गया, उसे रणवीर ने क्यों नहीं फेंका? इतने साल तक क्यों रखा?"
मैं रुक गया।
"क्योंकि वो अब भी उसका सबूत है," मैंने कहा। "पापा की चुप्पी का नहीं — रणवीर के किसी काम का।"
घंटी चुप हो गई।
और उस चुप्पी में मुझे लगा कि वो सहमत है।
इससे पहले कि मैं कुछ और पूछता, गली के मुँह से टिंकू की आवाज़ आई — "उस्ताद! उस्ताद! डिब्बा!"
मैं दौड़कर बाहर गया।
टिंकू दुकान के बाहर खड़ा था, हाथ में अपना पेचकस, आँखें बड़ी।
"डिब्बे में…" वो हाँफ रहा था। "डिब्बे में खट-खट फिर शुरू हो गई है। पर अब आवाज़ नीचे से नहीं आ रही।"
"तो कहाँ से?"
"ऊपर से।"
मैं दुकान के अंदर गया और कमरे में देखा। डिब्बा वहीं फ़र्श पर पड़ा था, तल्ला खुला हुआ, अंदर से खाली। पर उसके ऊपरी ढक्कन के कोने से — जो पहले बंद था और अभी भी बंद था — एक हल्की खट-खट आ रही थी।
जैसे डिब्बे के अंदर कुछ और भी हो, जो पहले सो रहा था और अब जाग गया।
मैंने अपना हाथ डिब्बे पर रखा।
ठंडा था।
बिलकुल नहीं, इस डिब्बे में अभी भी कोई चीज़ बाकी है।
और वो इस पेचकस के बाद आने वाली चीज़ थी — उससे पहले नहीं।
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