The Mysterious Bell – Chapter 429
मैंने पीछे मुड़कर देखा। आँगन में पापा अब भी मूँड़े पर बैठे थे, पेचकस सीने से लगाए।
और मुझे लगा कि आज रात के बाद साइकिल गली में सबसे ज़्यादा डरने वाला आदमी रणवीर भारद्वाज नहीं, कोई और है।
कोई और, जिसका नाम शंकर यादव है — और जो आज पहली बार बरसों बाद अपना औज़ार अपने हाथ में लेकर सोएगा।
॥
डिब्बा ठंडा था।
मैंने हथेली उस पर रखी और मुझे लगा जैसे किसी बंद कमरे में कोई साँस रोके बैठा हो। खट-खट अब भी आ रही थी — धीमी, बराबर, ऊपर वाले ढक्कन के कोने से। जैसे डिब्बे के अंदर कोई चींटी नहीं, कोई घड़ी नहीं, बल्कि कोई ऐसी चीज़ करवट ले रही हो जो बहुत दिनों से सोई थी।
टिंकू दरवाज़े पर खड़ा था। उसके हाथ में अपना छोटा पेचकस था, जिसे वो हर वक़्त जेब में रखता है, जैसे मैं घंटी रखता हूँ।
"उस्ताद," उसने धीरे से कहा, "ये ज़िंदा है क्या?"
"नहीं," मैंने कहा। "ज़िंदा होता तो अच्छा था।"
"कैसे?"
"ज़िंदा को तू डाँट सकता है, सुला सकता है, रोटी दे सकता है।" मैंने पीछे से पुरानी बोरी उठाई और डिब्बे पर डाल दी। "ये इंतज़ार कर रहा है। और इंतज़ार करने वाले से बुरा कुछ नहीं होता, टिंकू।"
बोरी के नीचे से खट-खट थोड़ी धीमी हो गई, पर बंद नहीं हुई।
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"तू घर जा। सो जा।"
"पर उस्ताद—"
"कुछ नहीं पर उस्ताद। कल सुबह दस बजे पीपल पर सब खुलेगा। तब तक ये डिब्बा अपनी जगह रहेगा, और तू अपने घर में।"
टिंकू ने एक पल डिब्बे को देखा, फिर मुझे। उसकी आँखों में वो डर नहीं था जो बच्चों की आँखों में होता है। उसमें बेचैनी थी — कहीं कुछ छूट न जाए, वो बेचैनी।
"उस्ताद," वो जाते-जाते रुका, "अगर वो ऊपर वाला ढक्कन खुद खुल गया, तो मुझे फ़ोन कर देना।"
"तू सोएगा?"
"मैं सोऊँगा नहीं," उसने कहा और अंधेरे में भाग गया।
मैंने दुकान का आधा शटर गिराया, ताला लगाया, और आँगन की तरफ़ मुड़ा। पीछे डिब्बे से आती खट-खट मेरे कानों में रह गई थी, जैसे कोई मच्छर कमरे से निकल जाए पर उसकी भिनभिनाहट सिर में रह जाए।
आँगन में दीया जल रहा था।
माँ ने उसे दीवार के उसी कोने में रखा था जहाँ हमेशा रखती हैं — चूल्हे के पास, उस पुरानी ईंट पर जिसका एक कोना टूटा है। दीये की लौ मंद थी। कभी ऊँची होती, कभी नीची, जैसे वो भी हमारी बातें सुन रही हो और बीच में साँस ले रही हो।
माँ चटाई पर बैठी थीं। उनके हाथ में पानी का स्टील का गिलास था जिसे उन्होंने अभी भरा था और अभी तक पिया नहीं था। काजल उनके पास बैठी थी, नर्सिंग की किताब सीने से लगाए, जैसे वो कोई ढाल हो।
और पापा — वहीं मूँड़े पर। कमर झुकी हुई, चश्मा कान पर टेप से बँधा, और दोनों हाथों में वो पेचकस। सीने से लगाए हुए। आँखें ज़मीन पर।
मैं भी बैठ गया। घुटनों पर ग्रीस लगी थी, जीन्स पर धूल, पर कुछ साफ़ नहीं किया। कुछ देर तक कोई नहीं बोला।
बाहर गली से किसी साइकिल की घंटी आई, फिर दूर किसी के टीवी की आवाज़, फिर सब चुप।
तभी पापा ने साँस ली — लंबी, गहरी, जैसे वो बहुत देर से पानी के नीचे थे और अब ऊपर आए हों।
"अंकुश।"
"हाँ, पापा।"
"तूने पूछा था कि मैंने ये पेचकस उसके दराज़ में क्यों रखा था।"
"हाँ।"
"तो सुन।"
उन्होंने पेचकस को अपनी हथेली पर रखा और उसे धीरे से घुमाया, जैसे वो कोई चीज़ नहीं, कोई ज़िंदा चीज़ हो जो उनकी उँगलियों को पहचानती हो।
"अंगूठा लगाने के कुछ दिन बाद की बात है," पापा ने कहा। "तेरी माँ अस्पताल से लौट चुकी थी। दवा चल रही थी। घर में…" उन्होंने रुककर गिलास की तरफ़ देखा, फिर आगे कहा, "घर में उस वक़्त तीन वक़्त की रोटी भी मुश्किल से बन रही थी। तू दुकान पर बैठता था, दो-चार साइकिलें आती थीं, पर हिसाब नहीं मिलता था। काजल की फ़ीस आने वाली थी। मैंने सुना कि भारद्वाज साहब की नई साइट पर मज़दूर चाहिए — दिन का हिसाब अच्छा है, नगद मिलेगा, उसी शाम।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"मैं वहाँ गया," पापा ने कहा। "सुबह सात बजे। गेट पर आदमियों की लाइन लगी थी। जवान, बूढ़े, औरतें, बच्चे तक। सबके चेहरे पर वही बात — आज का दिन निकल जाए तो बस। मैंने अपनी एक अच्छी कमीज़ पहनी थी, और जेब में ये पेचकस रखा था। मुझे लगा, अंदर कुछ ठीक करने को मिल जाए तो काम आएगा। मज़दूर जो हूँ, औज़ार के बिना अधूरा हूँ।"
उन्होंने पेचकस के हत्थे को अँगूठे से सहलाया।
"अंदर भेजा गया। कहा गया, ऊपर के कमरे से एक बक्सा उतारो। मैं गया। कमरा बड़ा था। फ़र्श पर सफ़ेद पत्थर, और हवा में ऐसी ठंडक जो सिर्फ़ पैसे वालों के कमरों में होती है — जैसे वहाँ गर्मी होती ही नहीं। मैंने बक्सा उतारा। फिर साहब का एक आदमी आया और बोला, तेरे हाथ खाली हैं ना, तो ये काग़ज़ उस दराज़ में रख दे।"
"दराज़ खुला था?" मैंने पूछा।
"खुला था।" पापा ने मेरी तरफ़ देखा। "और बेटा, उस दराज़ में मैंने पहली चीज़ जो देखी, वो ये पेचकस नहीं थी। वो मेरा ही काग़ज़ था। वही पीली शीट। ऊपर मेरा नाम, नीचे लाल अँगूठा।"
दीये की लौ हिली। माँ ने गिलास ज़मीन पर रख दिया। काजल ने किताब और कसकर पकड़ ली।
"मैंने उसे हाथ में लिया," पापा ने कहा। "मेरा हाथ काँप रहा था। मैंने सोचा, फाड़ दूँ। फिर सोचा, फाड़ने से क्या होगा? मेरा अंगूठा मेरे हाथ पर है, काग़ज़ पर नहीं। वो काग़ज़ जाएगा, दूसरा आ जाएगा। जिस आदमी के पास इतनी बड़ी इमारत है, उसके पास काग़ज़ों की कमी नहीं होती।"
"तो आपने पेचकस रख दिया," मैंने कहा।
"हाँ। उसी दराज़ में। उन काग़ज़ों के नीचे।"
"क्यों?"
पापा ने एक लंबी साँस ली। फिर बोले, "क्योंकि उस वक़्त मुझे लगा कि ये औज़ार मेरे हाथ में है, तो मैं अभी भी वही शंकर हूँ जो साइकिल ठीक करता था। और मैंने सोचा — जिस दिन मैं इसे वहाँ से लेने जाऊँगा, उस दिन मैं अपना अंगूठा भी वापस माँगने जाऊँगा।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
"मैंने वो चीज़ इसलिए नहीं छोड़ी कि खो गई थी," पापा ने कहा। "मैंने जान-बूझकर छोड़ी। ताकि जब भी मैं उस इमारत के सामने से गुज़रूँ, मुझे याद रहे कि मैं कहाँ और किस हाल में बिका हूँ।" उन्होंने पेचकस को सीने से लगाया। "मैं उस दिन वहाँ मज़दूरी करने गया था। और मज़दूरी से पहले मैंने अपना औज़ार गिरवी रख दिया।"
माँ उठ खड़ी हुईं।
उन्होंने साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा — वो हरकत जो वो तभी करती हैं जब कुछ बड़ा होने वाला हो। उनकी आँखें भरी हुई थीं, पर आवाज़ साफ़ थी। बिलकुल साफ़।
"शंकर यादव।"
पापा ने सिर उठाया।
"मैं तुम्हारी बीवी हूँ," माँ ने कहा। "कोई मेहमान नहीं हूँ जो चार दिन आई, दो रोटी खाई और चली गई।"
"सुशीला—"
"नहीं। सुनो।" उन्होंने पहले दीये की लौ की तरफ़ देखा, फिर पापा की तरफ़। "जिस रात तुम देर से लौटे थे और तुम्हारे हाथ काँप रहे थे, उसी रात मैं जान गई थी कि कुछ हुआ है। तुमने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं, सीधे चारपाई पर गिरे और सो गए। मैंने पूछा नहीं। जानती हो क्यों?"
पापा चुप।
"क्योंकि मुझे डर था," माँ ने कहा। "डर था कि अगर तुमने उस रात बताया, तो तुम टूट जाओगे। और मैं तुम्हें टूटा हुआ नहीं देख सकती थी। तो मैं चुप रही। पाँच साल।"
उनका गला भर आया, पर वो रुकीं नहीं।
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