The Mysterious Bell – Chapter 426
और मनोज… मनोज को भी नहीं पता था। या शायद पता था। शायद जानते हुए भी वो नहीं जानता।
जो आदमी अपने यहाँ काम करने वाले को भी नहीं बताता कि डिब्बे में क्या है, वो आदमी अपने आपको ईश्वर समझने लगता है।
मैंने इस बार डिब्बे को छुआ नहीं।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"कह रही थी वापस कर दो," मैंने कहा।
"अब भी कह रही हूँ," उसने कहा।
"अब वापस करने से क्या होगा?"
"तुम बताओ।"
मैंने एक लंबी साँस ली। मैंने उस उलटे डिब्बे के चारों तरफ़ खड़े लोगों को देखा — टिंकू जो अब भी झुककर उसे देख रहा था, सानिया जिसकी आँखें बड़ी थीं, उस्ताद जिनके होंठ एक लकीर में बंद थे, शबनम आपा जो चिमटी नीचे किए खड़ी थीं और मनोज जो अब अपना बंडल सीने से अलग करके हाथ में ले चुका था, जैसे वो बंडल अब उसके और मेरे बीच ढाल न रहा हो।
"मीरा," मैंने कहा, "अगर मैं ये डिब्बा वापस भेज दूँ, तो ये खट-खट उनके पास वापस चली जाएगी। और जो चीज़ उनके पास है, वो हमारे पास नहीं। हमें नहीं पता कि अंदर क्या है। इसलिए मैं इसे वापस नहीं भेजूँगा, पर कबूल भी नहीं करूँगा।"
"तो?"
"मैं इसे यहीं रखूँगा।" मैंने ज़मीन पर इशारा किया, उस जगह, जहाँ जोड़ केंद्र के सात टूटे सामान रखे थे और आठवाँ नहीं था। "पीपल के नीचे। सबके सामने। जो चीज़ आई है, वो छिपी नहीं रहेगी।"
मैंने मनोज की तरफ़ देखा।
"मनोज भाई," मैंने कहा, "आप जाकर साहब को यही बता दीजिए। कहिए, डिब्बा मिल गया। डिब्बे को खोला नहीं गया, पर उलटा ज़रूर देखा गया। और ये भी कह दीजिए कि उसके अंदर से एक आवाज़ आई, जिसकी हमें आदत नहीं है।"
मनोज ने एक पल सोचा।
"और ये भी बता दूँ कि आपने लिफ़ाफ़ा खोल लिया है?"
"हाँ," मैंने कहा। "ये भी बता दीजिए।"
"और ये कि आपने उस पर क्या जवाब दिया?"
"जवाब आज नहीं," मैंने कहा। "जवाब कल सुबह सभा में। सबके सामने।"
मनोज ने सिर हिलाया और जाने लगा।
तभी टिंकू ने पीछे से कहा, "उस्ताद, अगर डिब्बे में वो चीज़ बोल रही है, तो क्या हम उससे बात कर सकते हैं?"
मैं रुका।
मनोज भी रुका।
मैंने मुड़कर टिंकू को देखा। वो सच में सोच रहा था। उसकी आँखों में डर नहीं था, बस एक सवाल था।
"टिंकू," मैंने कहा, "अभी नहीं। जो चीज़ बंद है, वो पहले हमें बताना चाहिए कि बंद किसने किया।"
"और अगर वो नहीं बताए?"
"तो हम उसकी ज़ुबान नहीं सुनेंगे। हम उसकी आवाज़ सुनेंगे। और आवाज़ हमेशा सच नहीं होती।"
टिंकू ने सिर हिलाया। पर उसने वो डिब्बा देखना नहीं छोड़ा।
मनोज टेम्पो की तरफ़ बढ़ा और अपने मज़दूरों को बुलाया।
डिब्बा वहीं पीपल के नीचे रखा रहा, उलटा, और उसके तल्ले से खट-खट धीरे-धीरे आती रही।
मैंने लिफ़ाफ़ा जेब में रखा और दुकान की तरफ़ चल पड़ा। तीन कदम चला था कि मेरे कान में घंटी की आवाज़ आई।
"अंकुश।"
"हूँ।"
"जो डिब्बा नीचे से बोलता है," घंटी ने कहा, "उसे ऊपर से कोई चुप नहीं करा सकता।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"और गोविंद," घंटी ने कहा, "आज रात सो नहीं पाएगा।"
मैं रुक गया।
"क्यों?"
"क्योंकि जिसका नाम नीचे लिखा जाता है," घंटी ने कहा, "उसे पता चल जाता है कि उसका नाम कहीं और भी लिखा जा चुका है।"
फिर वो चुप हो गई।
मैंने दुकान का दरवाज़ा खोला।
अंदर पापा फर्श पर बैठे थे, पुराना पंखा खोलकर सामने रखा था, और उसके तार को उँगली से सीधा कर रहे थे। हाथ काँप रहे थे। फिर भी तार सीधा हो रहा था।
मैंने दरवाज़े पर खड़े होकर कहा, "पापा।"
वो नहीं बोले।
"पापा, उस डिब्बे के तल्ले में कुछ है जो बोल रहा है।"
उन्होंने तार सीधा करना जारी रखा।
"और उस लिफ़ाफ़े पर गोविंद भाई का नाम है।"
अब उनका हाथ रुका।
उन्होंने सिर उठाया। उनकी आँखें बहुत थकी थीं। उन्होंने धीरे से कहा — बहुत धीरे, जैसे कोई अपना ही राज़ खुद से कह रहा हो — "तो अब तू जान गया कि वो क्यों काँपता है।"
मैं अंदर आकर उनके सामने बैठ गया।
"नहीं जाना," मैंने कहा। "मुझे ये जानना है कि वो किससे काँपता है।"
पापा ने पंखा बंद कर दिया।
"रोशनी जाने के बाद," उन्होंने कहा, "वो आदमी कुछ देर अपने दफ़्तार में बैठता है। अकेला। और उस वक़्त वो अपने हाथ अपने ही हाथ से पकड़ता है, जैसे किसी और की उँगली पकड़ रहा हो।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"गोविंद किसी इंसान से नहीं," उन्होंने कहा, "अपने ही अंगूठे से काँपता है।"
बाहर गली में टिंकू की आवाज़ आई, "उस्ताद, डिब्बा वहीं रखा है, पर मैंने पेचकस उसके पास रख दिया है, सुनने के लिए नहीं, बस—"
मैं मुस्कुराया।
पर मेरी मुस्कुराहट पूरी नहीं हुई।
क्योंकि जब घंटी "गोविंद" कह रही थी, तो उसकी आवाज़ में वो सख़्ती नहीं थी जो वो हमेशा रखती है। उसकी आवाज़ में एक चीज़ और थी।
बेचैनी।
जैसे वो भी जानती हो कि इस डिब्बे के नीचे जो बंद है, वो आज नहीं, कल खुलेगा। और कल सुबह दस बजे, पीपल के नीचे, जब रजिस्टर खुलेगा, तो मेज़ पर एक और चीज़ रखी होगी — ये डिब्बा। और उस डिब्बे में से अगर वो बात निकली जो मुझे लग रही है, तो सभा का रुख बदल जाएगा।
मैंने दुकान की मेज़ पर अपना हाथ रखा।
मेज़ पर पुराना डेंट था, दो साल पुराना, तब का जब मैंने गुस्से में कोई रेडियो पटका था।
आज मैंने कुछ नहीं पटका।
आज मैंने सिर्फ़ मन में कहा — जो चीज़ मुफ़्त आती है, वो अपने साथ एक और चीज़ लाती है।
और वो "और" चीज़, हमेशा सबसे महँगी होती है।
॥
दुकान के पीछे वाले कमरे में पुराना बल्ब गुनगुना रहा था। उसकी रोशनी में डिब्बा उलटा पड़ा था — लोहे का, चमकदार, ऊपर कंपनी का नाम, चारों तरफ़ पीली धातु की पट्टियाँ और चार छोटे पहिये। दिन में पीपल के नीचे जो खट-खट आ रही थी, अब भी वही थी, बस अब कमरे की दीवारों से टकराकर थोड़ी तेज़ लग रही थी, जैसे कोई अंदर से उँगली उठाकर कह रहा हो — मैं हूँ, यहाँ हूँ।
टिंकू फ़र्श पर पेट के बल लेटा था, ठुड्डी हाथों पर रखे, और डिब्बे के तल्ले से कान सटाकर सुन रहा था। उसने अपना पेचकस डिब्बे के पास ही रखा हुआ था — ठीक उसी तरह जैसे कोई दरवाज़े पर कोई चीज़ रखकर कहे कि देखो, हम भी तैयार हैं।
काजल अस्पताल से अभी लौटी थी। उसके हाथ में दवा की प्लास्टिक की थैली थी, जिसे उसने कोने में रख दिया और फिर चारपाई के किनारे बैठ गई। उसकी नर्सिंग की किताब आज भी उसके बैग से आधी बाहर लटक रही थी। वो बोली नहीं, बस बैठकर डिब्बे को देखती रही।
मीरा ट्रंक पर बैठी थी, कैमरा उसके सामने बंद पड़ा था, और वो घुटनों पर हाथ रखकर चुप थी। आज उसने एक भी सवाल नहीं पूछा।
मैंने डिब्बे को दोनों हाथों से उठाकर सीधा किया।
"तो," मैंने कहा, "जब ये आया था, तब इसके ऊपर तोहफ़े की खुशबू थी। अब देखते हैं नीचे क्या बोलता है।"
टिंकू उठ बैठा।
"उस्ताद, मैंने सोचा था, ऊपर का ढक्कन उठाऊँ…"
"ढक्कन नहीं है इसमें," मैंने कहा। "ये बंद ही आया है। नीचे से खुलेगा।"
"मतलब तल्ला अलग है?"
"तल्ला अलग नहीं है," काजल ने पहली बार कुछ कहा। "तल्ले के नीचे कुछ और है। जब भी किसी डिब्बे से बात सुनाई दे और ढक्कन बंद मिले, समझ लेना कि अंदर दो परतें हैं।"
मीरा ने उसकी तरफ़ देखा।
"तुम्हें कैसे पता?"
"अस्पताल में लाश की अलमारी भी एक डिब्बा ही है," काजल ने कहा। "कभी-कभी उसमें भी आवाज़ आती है। और हर बार जवाब ऊपर नहीं, नीचे की परत में होता है।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno