The Mysterious Bell – Chapter 425
टिंकू ने काग़ज़ वापस मेरी तरफ़ बढ़ा दिया, जैसे उसने छुआ भी हो तो अब नहीं छूना है।
मीरा आगे आई। उसने काग़ज़ पढ़ा। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आवाज़ एकदम सूखी थी।
"ये वापस कर दो।"
"क्यों?"
"क्योंकि जो चीज़ उस दफ़्तार से आती है, उसके पीछे एक काग़ज़ होता है।" उसने काग़ज़ की तरफ़ इशारा किया। "और उस काग़ज़ के पीछे एक शर्त। और वो शर्त बड़े अक्षरों में नहीं लिखी होती, अंकुश। वो हमेशा आख़िरी लाइन में लिखी होती है, किसी के नाम के साथ।"
"मैं जानता हूँ," मैंने कहा।
"तो फिर?"
"तो फिर," मैंने कहा, "मैं ये वापस नहीं करूँगा।"
मीरा रुक गई।
"अंकुश—"
"मीरा," मैंने कहा, "अगर मैं इसे वापस कर दूँ, तो साहब को इतना पता चल जाएगा कि मैं डर गया। और जो डर जाता है, उसके पास जो कुछ बचा होता है, वो भी वो ले लेते हैं।"
"तो तुम क्या करोगे? इसे कबूल कर लोगे?"
"मैं इसे नहीं कबूल करूँगा और न ही नकारूँगा।" मैंने काग़ज़ को मोड़कर लिफ़ाफ़े में डाला। "मैं इसे इसी तरह रखूँगा, जैसे कोई काग़ज़ किसी मुकदमे में रखा जाता है। और जब सही वक़्त आएगा, तो इसी काग़ज़ को उनके सामने पढ़कर सुनाऊँगा।"
मीरा ने मेरी आँखों में देखा।
"तुम्हें पता है ना," उसने कहा, "कि ये चीज़ इसलिए भेजी गई है कि अगर तुमने इसे छुआ, तो कल की सभा में कोई उठकर कहेगा कि अंकुश ने साहब का तोहफ़ा ले लिया। और फिर तुम्हारी हर बात में एक शक जुड़ जाएगा।"
"मुझे पता है।"
"और अगर तुमने इसे नहीं छुआ, तो कल कोई कहेगा कि अंकुश को साहब का दिया हुआ औज़ार भी नहीं चाहिए, क्योंकि वो पहले से कोई और हाथ रख चुका है।"
मैं मुस्कुराया।
"तो इसमें दोनों तरफ़ शक है," मैंने कहा। "मतलब हिसाब बराबर। जो हिसाब बराबर हो, उसमें इंसान अपनी मर्ज़ी चुन सकता है।"
तभी मेरी नज़र दुकान की तरफ़ गई।
पापा दरवाज़े पर खड़े थे।
वो पहले भी वहीं खड़े थे, मुझे याद है। जब डिब्बा उतर रहा था, तब भी वो वहीं थे, पर थोड़ा पीछे। अब वो दरवाज़े के एकदम किनारे पर थे, कंधा दीवार से टिका हुआ, और चेहरा… चेहरा ऐसा जैसे कोई पुराना हिसाब बंद कॉपी से खुद बाहर आ गया हो।
उन्होंने काग़ज़ नहीं पढ़ा। उन्होंने सिर्फ़ मनोज को देखा। फिर डिब्बे को। फिर मेरी तरफ़।
और फिर वो अंदर चले गए। एक शब्द नहीं कहा। पैर भी ज़मीन पर ऐसे नहीं टिके जैसे पहले टिकते थे। लगा, जैसे कोई चीज़ उनके कंधों पर लाद दी गई हो, जो बहुत पहले उतार दी गई थी।
मैंने उन्हें रोकना चाहा।
पर मैं नहीं रोका। क्योंकि मैं जानता हूँ कि पापा की चुप्पी में जो है, वो अकेले में ही खुलता है। और मेरे पास अभी उनके लिए एक ज़ुबान थी, जो सिर्फ़ एक ही बात कहती है — गोविंद भाई।
उस्ताद अली बक्श भी आ गए थे। वो अपने मोटे चश्मे के बिना थे, हाथ में कपड़े का एक टुकड़ा था। उन्होंने लिफ़ाफ़ा ऊपर से नीचे तक देखा, फिर डिब्बे को देखा।
"यह डिब्बा," उन्होंने धीरे से कहा।
"क्या?"
"कुछ भी बोलने से पहले," उन्होंने कहा, "इसके तल्ले को उलटकर देखना।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"तल्ला?"
"जो चीज़ ऊपर से साफ़ हो," उस्ताद ने कहा, "उसके नीचे का हिसाब वैसे देखा जाता है। दस साल में मैंने एक ही चीज़ सीखी है — अच्छे डिब्बे के नीचे हमेशा एक पुराना तल्ला होता है।"
मनोज ने हँसकर कहा, "उस्ताद जी, ये डिब्बा साहब ने खास बनवाया है। नया है।"
"तभी तो," उस्ताद ने कहा, "नए का पुराना तल्ला पहले देखना चाहिए।"
मनोज की मुस्कान थोड़ी और मुश्किल में आ गई।
"अंकुश भाई," उसने कहा, "डिब्बा तो आप ले लीजिए, बाकी बातें साहब से हो जाएँगी। मैं अब चलूँ? मेरा काम बाकी है, टेम्पो भी रुका हुआ है।"
"रुक जाइए," मैंने कहा।
"भाई साहब—"
"दो मिनट," मैंने कहा। "हम सिर्फ़ डिब्बा उलटकर देखेंगे। जो चीज़ साहब ने भेजी है, उसे देखने का हक़ तो हमें है ना?"
मनोज की आँखें एक पल के लिए मेरी जेब की तरफ़ गईं। फिर डिब्बे की तरफ़।
"देखिए," उसने कहा, "ऐसा मतलब नहीं है मेरा।"
"मुझे पता है," मैंने कहा।
मैंने टिंकू को इशारा किया।
वो साथ आया। सानिया, गुड्डू और रफ़ीक़ भी पीछे आए। चिंटू ने उँगली उठाई, "अंकुश भैया, मैं भी?" और मैंने सिर हिलाया।
"चारों तरफ़ से उठाना है," मैंने कहा। "धीरे। कोई जल्दी नहीं।"
हमने डिब्बे को उठाया। वो भारी था, पर खाली डिब्बे जितना नहीं। हमने उसे उलटा किया। उसका तल्ला ऊपर आ गया। तल्ला लोहे का था, चमकता हुआ, और उस पर चार पेंच थे — दो किनारों पर, दो बीच में।
टिंकू ने पहले पेंच पर उँगली रखी।
"ये पेंच तो कसा हुआ है," उसने कहा। "हमारे यहाँ वाले पेंच घूमते हैं। ये नहीं घूमेगा।"
"हिलता है?" मैंने पूछा।
उसने ज़ोर लगाया।
और जैसे ही उसने ज़ोर लगाया, तल्ले की परत हिली।
एक शब्द नहीं, एक हल्की-सी हरकत — जैसे किसी पुराने दरवाज़े का पल्ला अपनी जगह से एक उँगली भर खिसक जाए।
और फिर भीतर से आवाज़ आई।
खट।
खट-खट।
धातु की आवाज़ थी। छोटी, धीमी, पर साफ़। जैसे कोई चीज़ बंद होकर भी बोल रही हो। जैसे किसी ने अंदर कुछ रखकर ढक्कन ऊपर से दबा दिया हो, और वो चीज़ अभी तक अपनी जगह से हिल नहीं पाई हो, बस उँगली उठाकर दरवाज़ा खटखटा रही हो।
मैंने झट से हाथ पीछे किया।
टिंकू ने भी।
सानिया ने मुँह पर हाथ रख लिया।
रफ़ीक़ ने चश्मा आँख पर लगाया।
चिंटू ने चप्पल कसकर पकड़ ली।
शबनम आपा ने चिमटी नीचे कर दी।
उस्ताद ने कपड़े का टुकड़ा अपनी मुट्ठी में भींच लिया।
और मनोज — मनोज का रंग उड़ गया था। उसका चेहरा वैसा हो गया जैसे उसने पहली बार देखा हो कि वो डिब्बा अपने साथ क्या लेकर आया है।
मैंने उसकी आँखों में देखा। उसने आँखें चुरा लीं।
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
"मुझे नहीं पता," उसने कहा।
"मनोज भाई।"
"मुझे सच में नहीं पता," उसने कहा। "मैं सिर्फ़ डिब्बा उतारने आया था। साहब ने कहा था—"
"क्या कहा था?"
"साहब ने कहा था," उसने धीमे से कहा, "कि डिब्बा अंकुश भाई के हाथ में दे देना। बस। और कहा था कि खोलने से पहले दो मिनट सोच ले। अगर सोचकर भी खोलना हो, तो कोई रोक नहीं रहा।"
मैंने घंटी जेब से निकाली।
उसे हथेली पर रखा।
और घंटी बजी।
एक बार नहीं। दो बार। छोटी, हल्की, ऐसी जैसे कोई सोई चीज़ जगाकर बैठ गई हो।
और तंत्र बोला।
"तोहफ़ा नहीं," उसने कहा।
सब चुप हुए।
"हिसाब है," तंत्र ने कहा।
मैंने उसे हथेली पर दबाया।
"किसका हिसाब?"
"जिसका नाम नीचे," तंत्र ने कहा, "उसका हाथ ऊपर।"
फिर चुप।
फिर बोला।
"गोविंद काँपता है।"
और फिर चुप हो गया।
मैंने घंटी को जेब में रखा और उस डिब्बे को देखा, जो उलटा पड़ा था, और जिसके तल्ले से अब भी वो धातु की आवाज़ धीरे-धीरे आ रही थी। खट। खट-खट। जैसे कोई अंदर बैठकर उँगली से गिन रहा हो कि बाहर कितने लोग खड़े हैं।
तुम सोच रहे होगे कि ये क्या है। मैं भी सोच रहा था।
पर सोचने से पहले मुझे एक बात समझ आई।
साहब ने यह डिब्बा मुझे इसलिए नहीं भेजा कि मेरी दुकान अच्छी चल रही है। उन्होंने इसे इसलिए भेजा कि वो जानते हैं कि मेरे पास कोई चीज़ है जो उनके हिसाब में नहीं है। और एक नए डिब्बे के नीचे कोई पुराना तल्ला बंद करके वो देखना चाहते हैं कि मैं उस तल्ले तक पहुँचता हूँ या नहीं।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno