The Mysterious Bell – Chapter 424
"मोम?"
"मतलब," मीरा ने कहा, "जो इसे भेजा है, उसने इसे चमकाया है ताकि हम इसे देखते ही उठा लें।"
टिंकू ने सिर हिलाया। फिर भी उसके हाथ डिब्बे के करीब थे।
"उस्ताद," उसने धीरे से कहा, "मैं सिर्फ़ देखना चाहता हूँ कि अंदर क्या है। खोलूँ नहीं, बस… झाँक लूँ।"
"झाँक लेना भी खोलना ही है," शबनम आपा ने कहा। "और खोलने में पसीना बह जाता है बेटा, झाँकने में नहीं।"
मैंने डिब्बे के पास घुटने रखकर बैठकर उसे गौर से देखा।
ऊपर पर एक चौकोर प्लेट थी, जिस पर दो पेंच थे। बाईं तरफ़ एक छोटा कुंडा था और उसके साथ एक छोटा ताला — पर ताला खुला था। उसके अंदर से एक काग़ज़ का टुकड़ा निकला हुआ था। किसी ने जान-बूझकर ताला खुला छोड़ा था।
मैंने वो टुकड़ा खींचा।
उस पर लिखा था — "पहली नज़र में।"
मैंने उसे मनोज को नहीं दिखाया। मैंने उस काग़ज़ को जेब में रख दिया।
टिंकू ने देखा।
"क्या था?" उसने पूछा।
"हिसाब," मैंने कहा।
"किसका?"
"उसका, जो इसे बनाकर भेजता है।"
मीरा ने मेरी जेब की तरफ़ देखा। उसने कुछ नहीं पूछा, पर उसकी आँखों में सवाल था। सवालमीरा ने मेरी जेब की तरफ़ देखा। उसने कुछ नहीं पूछा, पर उसकी आँखों में सवाल था। सवाल वही, जो मेरी जेब में काग़ज़ का टुकड़ा बनकर पड़ा था। और सवाल वह भी, जो अभी डिब्बे के भीतर बंद था।
मनोज दो कदम आगे आया। उसने काग़ज़ों का बंडल सीने से चिपकाया हुआ था, जैसे कोई बच्चा अपनी कॉपी छिपाता है। उसकी आवाज़ में वही मिठास थी जो सक्सेना की आवाज़ में होती है। मीठी, पर ऐसी कि दाँत में चिपक जाए।
"अंकुश भाई," उसने कहा, "ये लिफ़ाफ़ा भी साथ है। साहब ने खास तौर पर कहा है कि डिब्बा और लिफ़ाफ़ा, दोनों साथ खोलना। एक बिना दूसरे का कोई मतलब नहीं।"
मैंने लिफ़ाफ़ा नहीं लिया।
"अगर मैं न खोलूँ?" मैंने पूछा।
मनोज मुस्कुराया।
"तो साहब को बुरा नहीं लगेगा। साहब कह रहे थे, बेटा है, अपनी दुकान का मालिक है। जबरदस्ती कहाँ की।"
"और अगर खोल लूँ?"
"तो साहब खुश होंगे।"
"अच्छा," मैंने कहा। "और खुशी का हिसाब कौन रखेगा?"
मनोज की मुस्कान एक पल के लिए हिली। फिर वापस आ गई, जैसे दीवार पर टँगी तस्वीर हवा से हिलकर सीधी हो जाए।
"भाई साहब," उसने कहा, "हिसाब तो हम सबके यहाँ रखा जाता है। बस किसी को पता नहीं चलता।"
यही बात थी। मैंने इस आदमी को पहले नहीं देखा था, पर इसकी ज़ुबान पहचानी हुई लगी। जैसे किसी पुराने रजिस्टर का कोई पन्ना ज़ुबान बनकर बोल रहा हो।
डिब्बा ज़मीन पर रखा था। उसका रंग गहरा लाल था, किनारे पर काली पट्टी और ऊपर चमकता लोहे का ढक्कन। नया इतना था कि उस पर गली की धूल अभी तक नहीं बैठी थी। जब मज़दूर उसे टेम्पो से उतार रहे थे, तो उन्हें ज़ोर लगाना पड़ा था। और ज़मीन पर रखते वक़्त उसमें से धातु की एक हल्की खनक निकली थी, जैसे अंदर कोई चीज़ अपनी जगह से खिसक गई हो।
उस वक़्त मैंने उसे खाली डिब्बे की आवाज़ समझा था। तुम सोच रहे होगे कि एक आवाज़ से क्या फ़र्क़ पड़ता है। पड़ता है। पर उस वक़्त नहीं पड़ा। उस वक़्त मेरे सामने लिफ़ाफ़ा था।
टिंकू ने डिब्बे के चारों तरफ़ घूमकर देखा।
"उस्ताद," उसने कहा, "ये तो स्कूल का दफ़्ता लग रहा है।"
"दफ़्ता?"
"हाँ, वैसा ही। जैसा मास्टर जी के कमरे में रखा है। जिसमें रजिस्टर रखते हैं।"
"तो तुम ढक्कन खोलना चाहते हो?"
टिंकू ने देखा कि मैं हँस रहा हूँ। उसका चेहरा लाल हो गया।
"मैं सिर्फ़ देखना चाहता था," उसने कहा।
"देखना और खोलना, दोनों एक ही हैं," मैंने कहा। "फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि एक को हम पाप कहते हैं, दूसरे को जिज्ञासा।"
तभी सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू आगे आ गए। चारों ने ऐसा धक्का-मुक्की शुरू किया, जैसे डिब्बा खेल का सामान हो, बम न हो।
"अंकुश भैया, एक झलक?" गुड्डू ने कहा।
"एक ही झलक," चिंटू ने कहा।
"तो सबसे पहले मैं," रफ़ीक़ ने कहा।
"पहले मैं," चिंटू ने कहा।
"तुम्हारी चप्पल मुझसे छोटी है," रफ़ीक़ ने कहा।
"चप्पल से उम्र नहीं नापते," चिंटू ने कहा।
मैंने देखा, शबनम आपा चिमटी हाथ में लेकर गुमटी से बाहर आ गई थीं। उनके चेहरे पर वो भाव था, जो गली में कुछ मुफ़्त बँटते देखकर आता है।
"क्या है ये?" उन्होंने पूछा।
"साहब का तोहफ़ा," मनोज ने कहा।
शबनम आपा ने डिब्बे को ऊपर से नीचे तक देखा। फिर उन्होंने चिमटी को हल्का सा उठाया।
"तोहफ़े की मुस्कान भी अंदर है?" उन्होंने पूछा।
मनोज हँसा। "आपा जी, आप भी…"
"मैं कुछ नहीं," शबनम आपा ने कहा। "मैं बस इतना कह रही हूँ कि साहब जो भी भेजते हैं, उसमें उनकी मुस्कान भी साथ में पैक करके भेजते हैं। ढक्कन खोलते ही वो मुस्कान निकलती है और बाकी सब अंदर रह जाता है। ज़रा सँभालकर खोलना।"
मैंने मनोज के हाथ से लिफ़ाफ़ा लिया।
वो भारी था। ऐसा नहीं था जैसे काग़ज़ भारी होता है। ऐसा था जैसे किसी ने उसमें एक और चीज़ रख दी हो। लिफ़ाफ़े पर कोई नाम नहीं था, कोई पता नहीं। बस ऊपर बाईं तरफ़ नीले रंग की एक छोटी गोल मुहर थी, जिस पर पहाड़ जैसी कोई आकृति बनी थी।
मैंने उँगली से उसका कोना फाड़ा।
अंदर से मोटे काग़ज़ की एक तह निकली।
काग़ज़ ऐसा था कि उसे छूकर लगा, जैसे इसे छापने वाले ने सोचकर छापा है। उसके ऊपर अक्षर एकदम बराबर थे, छपी हुई नीली स्याही में।
मैंने पढ़ा।
"अंकुश बेटा,
गली में जो तुम कर रहे हो, वो अच्छा काम है। पर अच्छे काम की भी क़ीमत होनी चाहिए। हुनर बाँटने वाले को भूखा नहीं रखा जाता। यह छोटा डिब्बा तुम्हारे औज़ारों के लिए है, ताकि तुम्हारी दुकान की मेज़ पर ठीक वो चीज़ें रहें जो एक मिस्त्री के हाथ में होनी चाहिए, न कि वो जो कबाड़े में पड़ी मिलती हैं।
तुम्हारी दुकान मेरा मोहल्ला है, बेटा। मैं उसे जानता हूँ, जैसे अपने दफ़्तार का हिसाब जानता हूँ। और जिस चीज़ को मैं जानता हूँ, उसे मैं अधूरा नहीं छोड़ता।
यह तोहफ़ा सिर्फ़ शुरुआत है। आगे और भी है।
तुम्हारा शुभचिंतक।"
नीचे हस्ताक्षर था। रणवीर भारद्वाज। नीले रंग में, बड़ा और गोल।
और हस्ताक्षर के नीचे, एकदम कोने में, जहाँ आम तौर पर कोई कुछ नहीं लिखता, एक छोटी सी लाइन थी, ज़्यादा बड़ी नहीं, जैसे किसी ने जल्दी में जोड़ी हो।
"तैयार किया — गोविंद भाई, दफ़्तार।"
मैंने वो लाइन दो बार पढ़ी।
फिर तीसरी बार।
तीन बार पढ़ने पर भी शब्द वही रहे। फ़र्क़ सिर्फ़ यह हुआ कि मेरे हाथ में जो काग़ज़ बहुत भारी लग रहा था, अब और भारी लगने लगा।
मैं चुप हो गया।
तुम मुझे जानते हो, तो तुम जानते हो कि मैं चुप कम होता हूँ। अगर मैं चुप हो जाऊँ, तो मतलब कुछ ऐसा हुआ है जिसे मेरी ज़ुबान अभी पचा नहीं पाई।
टिंकू ने पहले पाया।
"उस्ताद?"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"उस्ताद, क्या लिखा है?"
मैंने काग़ज़ उसकी तरफ़ सरका दिया। उसने पढ़ा। उसकी पढ़ाई धीमी है, वो मुझे पता है। वो शब्द-शब्द पढ़ता रहा। और जब आख़िरी लाइन पर पहुँचा, तो उसका चेहरा बदल गया।
"गोविंद भाई?" उसने कहा। "दफ़्तार का गोविंद भाई?"
"हाँ," मैंने कहा।
"वो जो रोज़ अस्पताल के बाहर नींबू-मिर्ची का हार लेकर खड़े रहते हैं? जिनके हाथ काँपते हैं?"
"हाँ।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno