The Mysterious Bell – Chapter 423
तभी गुड्डू दौड़कर आया। पीछे सानिया, रफ़ीक़ और चिंटू।
"क्या लाया है?" गुड्डू ने कहा।
"कुछ नहीं," मैंने कहा।
"फिर बड़ा डिब्बा क्यों है?"
"स्टोर करने के लिए।"
"हमें दिखाओ।"
"नहीं।"
"एक झलक।"
"नहीं।"
चिंटू ढक्कन के पास पहुँच गया।
"इस पर लिखा क्या है?" उसने पूछा।
"कंपनी का नाम," टिंकू ने कहा।
"कौन सी कंपनी?"
"जो चमकदार चीज़ें बनाती है," मैंने कहा।
"ये मुफ़्त में मिला है?" सानिया ने पूछा।
मैंने लिफ़ाफ़े को देखा।
"यही सवाल," मैंने कहा, "मेरे मन में भी है।"
रफ़ीक़ ने अपना टूटा चश्मा आँख पर लगाया और डिब्बे के पास झुककर देखा, जैसे उस पर कोई राज़ लिखा हो।
"उस्ताद," उसने कहा, "इस पर धूल नहीं है।"
"तो?"
"तो ये सफ़र में नहीं आया। ये सीधा आया है — कहीं से, बिना रास्ता देखे।"
बच्चा सही बोल रहा था। और मुझे लगा कि आजकल गली के बच्चे बड़ों से ज़्यादा देखने लगे हैं। शायद इसलिए कि बड़ों ने देखना छोड़ दिया है।
तभी शबनम आपा आईं।
उनके हाथ में चिमटी थी, पर आज वो बंद मुट्ठी में थी। सिर्फ़ नुकीला हिस्सा बाहर था, और उस नुकीले हिस्से ने डिब्बे की चमक को छुआ जैसे कोई उँगली से दूध की तपिश जाँचता है।
"शबनम आपा," टिंकू ने कहा, "आप देखिए, ये स्कूल का दफ़्ता है ना?"
शबनम आपा ने डिब्बा देखा।
फिर उन्होंने अपनी चिमटी वापस कमर में खोंसी और कहा —
"बेटा, साहब की मुस्कान भी इसी डिब्बे में पैक होकर आई है। ज़रा सँभालकर खोलना।"
गली चुप हो गई।
क्योंकि जब शबनम आपा मज़ाक करती हैं, तो बात में नमक होता है। और जब वो सीधे बोलती हैं, तो उसमें काँटा।
आज उनकी बात में दोनों थे।
मैंने लिफ़ाफ़ा खोला।
अंदर से एक काग़ज़ निकला। मोटा, सफ़ेद, ऊपर रेशे वाला। उस तरह का काग़ज़ जो गली की किराने की दुकान पर नहीं मिलता, जो शहर के बड़े दफ़्तारों में रखा जाता है।
और नीचे नीली स्याही में चार लाइनें।
मैंने पढ़ा।
पहली लाइन — "अंकुश बेटा, हुनर की भी क़ीमत होनी चाहिए।"
दूसरी लाइन — "तुमने गली में जो किया, वो मैंने देखा है।"
तीसरी लाइन — "ये तोहफ़ा सिर्फ़ शुरुआत है।"
चौथी लाइन — सिर्फ़ दो शब्द थे। "तुम्हारा।"
और नीचे, किनारे पर, बाईं तरफ़, छोटे अक्षरों में एक नाम —
"गोविंद भाई।"
मैंने काग़ज़ पढ़ना बंद कर दिया।
मैं मुस्कुराया नहीं।
गली में हर आदमी मेरी तरफ़ देख रहा था। मुझे पता था कि वो मेरे चेहरे पर उसकी परछाई ढूँढ़ रहे थे जो पिछले कई दिनों से मेरे चेहरे पर थी। पर आज मेरे चेहरे पर कुछ और था। कुछ शांत।
शांत आदमी सबसे डरावना होता है — क्योंकि उसका डर बाहर नहीं आता, अंदर ही काम कर रहा होता है।
मैंने लिफ़ाफ़ा उलटा।
अंदर कुछ और था। छोटा काग़ज़। मुड़ा हुआ। किसी पुराने रसीद जैसा। पर उसे मैंने नहीं निकाला।
मीरा गुमटी से आ रही थी।
उसकी चाल देखकर लगा कि वो दौड़ी है और सांस रोककर आई है।
"क्या है ये?" उसने पूछा।
मैंने काग़ज़ उसकी तरफ़ बढ़ाया।
उसने पढ़ा। फिर डिब्बे की तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़।
"वापस कर दो," उसने कहा।
"मैंने अभी पढ़ा ही है।"
"मैं जानती हूँ। और मैं यही कह रही हूँ — वापस कर दो।"
"क्यों?"
मीरा ने अपना बैग कंधे से उतारा। वो अब भी फटा था। वो रफ़्तार में चलती है, भले खड़ी हो।
"अंकुश," उसने कहा, "मैं पाँच साल से इस शहर की हर चमकदार चीज़ का पीछा कर रही हूँ। और मैंने एक बात सीखी है। दफ़्तार से आई हर चीज़ के पीछे एक काग़ज़ होता है।"
"यह काग़ज़ भी साथ में है।"
"हाँ। और उस काग़ज़ के पीछे एक शर्त होती है।"
गली फिर चुप हुई।
पीपल के पत्ते भी चुप थे। लगा जैसे उन्होंने भी सुन लिया।
टिंकू ने ढक्कन से हाथ हटा लिया।
"तो खोलें नहीं?" उसने पूछा।
"खोलने से पहले," मीरा ने कहा, "यह देखो कि खोलने की ज़रूरत किसे है। हमें या उन्हें?"
मैंने काग़ज़ को फिर देखा। नीली स्याही सूखी थी। पर धूप की गंध आ रही थी — वो गंध जो पुराने लिफ़ाफ़ों से आती है, जो किसी दराज़ में बंद रहे हों।
"काग़ज़ किसने लिखा?" मीरा ने मनोज से पूछा।
मनोज ने कंधे उठाए।
"साहब ने दिया," उसने कहा, "मैं तो सिर्फ़ पहुँचाने वाला हूँ।"
"और गोविंद भाई का नाम नीचे क्यों है?"
मनोज ने मेरी तरफ़ देखा।
"ये साहब ही जानें," उसने कहा।
"तुम जानते हो," मीरा ने कहा।
मनोज के चेहरे पर वो वाली मुस्कान आ गई जो मुनीमों के चेहरे पर होती है जब वो सोचते हैं कि वो बच गए।
"बहन जी," उसने कहा, "मैं सिर्फ़ सर्वे करता हूँ।"
"सर्वे नहीं," मीरा ने कहा। "तुम हिसाब करते हो। और जो हिसाब करता है, वो जानता है कि काग़ज़ पर किसका नाम क्यों है।"
मनोज चुप रहा।
फिर उसने मेरी तरफ़ देखा और धीरे से कहा —
"अंकुश भाई, साहब ने कहा था — धीरे से देना। मैंने धीरे से दिया।"
"तुमने डिब्बा पटक दिया," मैंने कहा।
"डिब्बा नहीं," उसने कहा, "सिर्फ़ ज़मीन पर रखा है।"
"फर्क क्या है?"
"फर्क यह है," मनोज ने कहा, "कि पटकने पर ताले टूटते हैं, रखने पर नहीं।"
मैंने उसे देखा। उसकी आँखों में कुछ था — कोई बात कहने की जल्दी, जो वो नहीं कह सकता था।
"मनोज," मैंने कहा, "उस डिब्बे के अंदर क्या है?"
उसने कुछ नहीं कहा।
पर उसकी गर्दन की नस हिली।
तभी दुकान के अंधेरे से एक परछाई हिली।
मैंने देखा।
पापा दुकान के पीछे वाले हिस्से में खड़े थे। उनका एक हाथ दरवाज़े की चौखट पर था, दूसरा शरीर के साथ चिपका हुआ। उन्होंने डिब्बा नहीं देखा था, वो लिफ़ाफ़ा देख रहे थे।
यह देखकर कि मैंने उन्हें देख लिया, वो पीछे मुड़े और अंदर चले गए।
बिना कुछ कहे।
चलने में भी कोई आवाज़ नहीं हुई। पापा के कदम आज भी चुप थे।
मैंने उस चमकदार डिब्बे की तरफ़ देखा और मुझे लगा कि मैं उसे जेब में दबा लूँ जैसे घंटी दबाता हूँ।
"ठीक है," मैंने मनोज से कहा, "डिब्बा वापस ले जाओ।"
मनोज ने उसी मुस्कान से कहा, "साहब ने कहा था कि अगर तुम न लो, तो ऐसे ही रखकर आ जाना।"
"मैंने मना किया है।"
"मैंने सुना है," मनोज ने कहा। "पर साहब ने भी कहा था कि अंकुश भाई मना करेंगे, इसलिए मैं लिफ़ाफ़ा भी साथ लाया हूँ।"
वो मुस्कुराया।
"अब मैं जाऊँ?" उसने पूछा।
"हाँ," मैंने कहा।
वो मुड़ा। फिर रुका। फिर मेरी तरफ़ आधा मुड़कर बोला —
"हाँ, एक बात और। साहब ने कहा था कि अगर तुम वापस करना चाहो, तो सुबह दस बजे के बाद खुद ले आना।"
"कल सुबह दस बजे मेरी सभा है।"
मनोज की आँखें हल्की सिकुड़ीं।
"मुझे पता है," उसने कहा। "इसीलिए साहब ने कहा कि सभा के बाद आ जाना।"
फिर वो टेम्पो में चढ़ा और चला गया।
टेम्पो ने मोड़ पर आकर एक बार हॉर्न बजाया। वो हॉर्न का नहीं, किसी पुराने रेडियो की धुन जैसा था — जैसे मुझे याद दिला रहा हो कि भोला भाई का रेडियो अभी जोड़ा नहीं गया है।
गली में लोग खड़े रह गए।
डिब्बा वहीं ज़मीन पर पड़ा था।
बच्चे उसके चारों तरफ़ घेरा बनाकर खड़े थे।
"उस्ताद," टिंकू ने कहा, "अब?"
"अब क्या?"
"अब खोलें या नहीं?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वही चीज़ थी जो हर तेरह साल के लड़के की आँखों में होती है — डर नहीं, बस उत्सुकता। डिब्बे की चमक उसकी आँखों में उतर आई थी।
"टिंकू," मैंने कहा, "जो चीज़ इतनी चमकती है, वो अपनी नहीं होती। वो अपना रास्ता खुद नहीं चुनती। उसके लिए किसी ने मोम लगाया है।"
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