The Mysterious Bell – Chapter 422
टिंकू ने सिर नीचे किया।
"मरहूम का अंगूठा," उसने कहा।
"हाँ। और जब कोई मुर्दे का अंगूठा काग़ज़ पर लगवाता है, तो कोई मुर्दे से भी बड़ी चीज़ माँग रहा होता है। वो काग़ज़ ज़मीन का है, टिंकू। और उस ज़मीन में वो सब पड़ा है जो हमने अभी जोड़ा है।"
टिंकू ने कुछ सोचा।
"आंटी ने क्यों नहीं पहले बताया?"
"क्योंकि उन्हें भी डर था।"
"किससे?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"इस बात से कि अगर वो बता देंगी, तो साजिद फँस जाएगा।"
मैंने घंटी जेब में मज़बूती से रखी।
"आज की सुलह एक चीज़ पर खड़ी है, टिंकू। अगर वो काग़ज़ बाहर आया और उस पर मुर्दे का नाम सही साबित हुआ, तो ये सुलह धूल में मिल जाएगी। और उसके साथ नसीमा बाई का तराज़ू भी।"
"तो हमें उस काग़ज़ को पहले ढूँढ़ना है।"
"हाँ।"
"कहाँ?"
मैंने पीपल के नीचे रखे दीयों की तरफ़ देखा। फिर उस पीतल के पलड़े की तरफ़, जो अब सीधा लटक रहा था।
"टिंकू," मैंने कहा, "कल सुबह सभा में हम सब रजिस्टर खोलेंगे। पर आज रात खुद जागेंगे। क्योंकि अगर उस काग़ज़ पर किसी मुर्दे का नाम चल रहा है, तो हमें उसे उस तरह खड़ा करना होगा जैसे हमने सातवें नाम को खड़ा किया था।"
"और अगर वो मुर्दा सच में अंगूठा लगवाने वाला निकला?"
"तब," मैंने कहा, "तब हम उस ज़मीन का हिसाब अपने हाथ में लेंगे — पर मुर्दे की नहीं, उनके बचे हुए लोगों की गवाही से।"
टिंकू ने सिर हिलाया।
शबनम आपा ने दीये बुझाने के बजाय और तेल डाला।
"आज रात जलते रहेंगे," उन्होंने कहा।
मैं पीपल के नीचे से निकला।
गली सो रही थी। नसीमा राशन भंडार का शटर धीरे-धीरे नीचे आ रहा था। साजिद का चादर वाला छत का दीपक अभी बुझा नहीं था।
और मेरे कंधे पर जो घंटी थी, वो खुद बजकर नहीं बोली।
पर मुझे पता था कि जब सुबह दस बजे वो रजिस्टर खुलेगा, तो उसके पीछे का अंगूठा भी खुलेगा। और उस अंगूठे ने नसीमा बाई के मरहूम पति को भी छुआ था — वो आदमी जिसकी दुकान में कोई लेन-देन नहीं हुआ, पर जिसका अंगूठा कहीं और गया।
दुनिया में काग़ज़ कई तरह के होते हैं। पर स्याही एक जैसी होती है।
और वो स्याही, जो एक बार किसी मुर्दे की उँगली पर लग गई, फिर किसी और की उँगली पर भी लगेगी — क्योंकि जो हाथ ऐसा करता है, वो एक बार में नहीं रुकता।
मैंने चलते-चलते धीरे से कहा, "घंटी।"
"हूँ।"
"अब मुझे पता है कि तू उस रात क्यों नहीं बोली, जब सब लोग सो रहे थे। तू चुप थी क्योंकि तुझे मेरे सिवा किसी और की आवाज़ चाहिए थी — कोई ऐसा, जो उस काग़ज़ पर अपना हाथ रख सके और हमें बता सके कि उस पर किसका अंगूठा है।"
घंटी ने कहा, "कल तीन आदमी रजिस्टर खोलेंगे। एक और भी है जिसे तू नहीं जानता।"
मैं रुका।
"कौन?"
घंटी चुप हो गई।
मैंने एक लंबी साँस ली और चल पड़ा।
गली के मोड़ पर जब मैं मुड़ा, तो दूर, सफ़ेद गाड़ी की लकीरों वाली जगह पर, कोई खड़ा था। सिर्फ़ एक आकृति — सफ़ेद कुर्ते में, एक हाथ में कुछ, दूसरे हाथ से शायद कुछ माँग रहा हो।
पर वो आकृति एक पल में गायब हो गई, जैसे सुबह की धूप में पड़ी परछाई।
मैंने देखा।
फिर मैंने घंटी जेब में कसकर दबाई और सीधा दुकान की तरफ़ चल दिया — क्योंकि कल सुबह दस बजे, सिर्फ़ एक रजिस्टर नहीं खुलने वाला था।
एक मरहूम आदमी का अंगूठा भी खुलने वाला था।
और उसके पीछे का साया — जो अभी तक किसी नाम से नहीं बँधा था।
॥
गली के मोड़ पर जब टेम्पो का हॉर्न बजा, तो मैं रुक गया।
पीछे मुड़ा। सफ़ेद टेम्पो नाली के किनारे-किनारे आ रहा था। उसकी एक हेडलाइट टूटी थी, इसलिए रोशनी आधी थी और परछाई दुगनी। ऐसा लगा जैसे रोशनी खुद अपने साथ एक अंधेरा लेकर चल रही हो।
मैंने घंटी जेब में दबाई।
"घंटी," मैंने धीरे से कहा, "ये टेम्पो मुझे पसंद नहीं आ रहा।"
घंटी चुप रही।
"कम से कम ये तो बता," मैंने कहा, "अंदर कौन है?"
तब भी चुप।
टेम्पो रुका। ड्राइवर उतरा, पीछे का दरवाज़ा खोला। अंदर से मनोज निकला — वही दुबला आदमी, जिसके काग़ज़ों का बंडल कभी सीने से चिपका रहता था। आज उसके हाथ खाली थे।
और यही सबसे डरावनी बात थी।
खाली हाथ वाला आदमी उससे ज़्यादा खतरनाक होता है, जिसके हाथ में काग़ज़ हों।
"अंकुश भाई," उसने कहा, "साहब ने भेजा है।"
"साहब को इतनी रात को नींद नहीं आ रही?" मैंने पूछा।
मनोज मुस्कुराया। उसकी मुस्कान में भी कुछ सीखा हुआ था — जैसे किसी ने उसे रटा दिया हो कि मुस्कुराने से बात शुरू होती है।
"ये रात नहीं है भाई," उसने कहा। "शाम ही तो ढली है।"
"गली के हिसाब से देखो," मैंने कहा, "तो यहाँ सूरज जल्दी सो जाता है।"
मनोज हँसा। फिर उसने टेम्पो के अंदर हाथ डाला और एक डिब्बा बाहर खींचा।
मैंने देखा।
वो डिब्बा चमक रहा था।
ऐसा चमक रहा था जैसे हमारी गली में कभी आया ही न हो।
लोहे का, मोटा, ऊँचाई में मेरे घुटने तक। ऊपर का ढक्कन गोल नहीं, सपाट था और उस पर किसी कंपनी का नाम खुदा था। किनारों पर पीली धातु की पट्टियाँ, कुंडे पीतल के, और नीचे चार छोटे पहिये — इतने छोटे कि लगे डिब्बा खुद चलना चाहता हो।
एक डिब्बा जिसमें पहिये हों। मैंने सोचा, अब औज़ार भी सफ़र करेंगे।
और डिब्बे के साथ, मनोज के दूसरे हाथ में, एक मोटा काग़ज़ का लिफ़ाफ़ा था। बादामी रंग का, ऊपर कोई मोहर नहीं, सिर्फ़ एक नीली लकीर। वो लकीर किसी अंगूठे के निशान जैसी थी, पर नहीं भी थी।
"रखो," मनोज ने कहा और डिब्बा ज़मीन पर रख दिया।
धातु ने गली के पत्थर पर जो आवाज़ की, वो आवाज़ गली में कभी किसी औज़ार की नहीं हुई थी।
फिर मनोज ने लिफ़ाफ़ा मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"ये भी," उसने कहा। "साहब ने खुद पढ़कर भेजा है।"
मैंने लिफ़ाफ़ा लिया। हल्का नहीं था। अंदर एक ही काग़ज़ नहीं था, कुछ मोटा था। मेरी उँगलियों ने उसे दबाकर महसूस किया — कुछ मुड़ा हुआ, कुछ कड़ा।
तभी नसीमा राशन भंडार का शटर रुका।
उसने आधा शटर उठाया और बाहर झाँका।
"ये क्या है?" उसने पूछा।
"तोहफ़ा," मनोज ने कहा, बिना नाम लिए।
"किसका?"
"साहब का।"
नसीमा बाई ने एक पल मेरी तरफ़ देखा, फिर डिब्बे की तरफ़, और उसकी नज़र उस चमक पर अटक गई। वो चमक जानी-पहचानी थी। उसने अपने पलड़े की टाँग सीधी करते वक़्त यही चमक देखी थी — किसी और की चीज़, किसी और की स्याही से चमकती हुई।
"साजिद को बुला लूँ?" उसने पूछा।
"नहीं," मैंने कहा।
पर तब तक टिंकू आ चुका था।
वो रोज़ घर जाने से पहले दुकान की तरफ़ एक चक्कर लगाता था। आज उसका चक्कर सीधा डिब्बे पर आकर रुका।
"ये क्या है उस्ताद?" उसने पूछा।
"मुझे भी देखना है," मैंने कहा।
"ये तो… ये तो स्कूल का दफ़्ता है।" उसने ढक्कन पर हाथ रख दिया। "हमारे स्कूल के स्टोर में ऐसा ही एक है। उसमें रोल नंबर की कॉपियाँ रखी हैं। मैंने एक बार उठाने की कोशिश की थी — ढक्कन इतना भारी था कि उँगली दब गई।"
"तो इसमें कॉपियाँ होंगी?"
"नहीं," उसने ऊपर देखकर कहा। "इसमें औज़ार होंगे। पर मैंने सोचा… हम तो स्कूल के दफ़्ते में भी ऐसा ही ढक्कन उठाते थे।"
"उठाया करते थे?"
टिंकू ने मुँह सिकोड़ा।
"पकड़े भी गए थे," उसने कहा।
मैं हँसा। बिना आवाज़ के। उस तरह की हँसी जो अंदर ही रह जाती है, बाहर नहीं आती — क्योंकि बाहर हँसने की जगह इस वक़्त सही नहीं थी।
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