The Mysterious Bell – Chapter 416
"आज से गली का हिसाब सीधा!" शबनम आपा ने कड़ाही जैसी आवाज़ में ऐलान किया। "जो कोई कहे कि नसीमा आपा कम तोलती हैं, वो मेरी गुमटी पर आकर मेरे सामने तोलकर दिखाए। फिर देखते हैं किसका काँटा टेढ़ा है।"
नसीमा बाई हँसने लगीं और साथ ही रोने भी लगीं, जो औरतों के साथ कभी-कभी एक ही साँस में होता है। उन्होंने साजिद का सिर पकड़कर अपने माथे से लगाया।
"माफ़ कर दे, बेटा," उन्होंने कहा। "और सुन — मैं भी एक बात कहूँ।"
सब चुप हुए।
"कभी-कभी मैंने… कुछ ग्राहकों को थोड़ा कम तोल दिया। जिन्हें लौटकर नहीं देखते, जो मुझ पर आँख बंद करके भरोसा करते हैं। चार आने, छह आने, यही। पहले ब्याज के डर से। फिर आदत से। उस दिन मैंने सुनील की तस्वीर के सामने खड़े होकर कहा था कि मैं ऐसा नहीं करूँगी। पर की।"
अब गली में फिर सन्नाटा था, पर यह पहले वाला नहीं था। यह वो सन्नाटा था, जिसमें लोग शर्मिंदा होते हैं, अपने लिए नहीं, सामने वाले के लिए।
नसीमा बाई ने सबकी तरफ़ देखा।
"जो मैंने कम तोला, वो मैं लौटाऊँगी। एक-एक को। नाम लिखा हुआ नहीं है, इसलिए सबको — जो भी मेरी दुकान पर आए, उससे कहूँगी कि चेक कर ले। और जो मैंने बरसों में कम किया, उतनी चीनी आज रात पीपल के नीचे रखवा दूँगी, चिट्ठी के साथ। जिसका नाम लिखा होगा, वो ले जाएगा। जिसका नहीं, वो भी ले जाएगा।"
"आपा, यह तो घाटा हो जाएगा," शबनम आपा ने कहा, पर हँसते हुए।
"होने दो," नसीमा बाई ने कहा। "सच्चा घाटा झूठे फ़ायदे से बेहतर है।"
मैंने घंटी को जेब से निकाला।
अब घंटी का स्वर बदला हुआ था। साफ़, थोड़ा गहरा, जैसे किसी ने उस पर से धूल हटा दी हो।
"छोटा जोड़," घंटी ने कहा। "बारह अंक। कुल एक सौ तीस।"
मैंने मन में हिसाब लगाया। मेरे पास एक सौ अठारह थे। बारह जुड़े, तो एक सौ तीस हो गए। पर इससे पहले, दो दिन पहले, मैंने छिपा दर्द देखने के लिए चालीस अंक खर्च किए थे। और आज की इस मरम्मत में मुझे सिर्फ़ बारह मिले।
"आज का जोड़ पूरा," घंटी ने कहा। "पर तेरा हिसाब आज घाटे में है।"
"पता है," मैंने धीरे से कहा।
"बुरा लगा?"
"थोड़ा।"
"अच्छा है। जो घाटा देखता है, वो दोबारा नहीं करता। जो हमेशा फ़ायदे में रहता है, उसे लगता है कि वो कभी ग़लत नहीं हो सकता।"
"और अगर मुझे यह घाटा कभी पूरा न हो?"
"तो हिसाब का मतलब क्या? हिसाब अंकों का नहीं होता, बेटा। हिसाब इस बात का होता है कि तू किस काम के बाद सो पाता है और किस काम के बाद नहीं।"
और फिर घंटी चुप हो गई।
मैंने घंटी जेब में रखी और अपनी कॉपी में आज का जोड़ लिखा। टिंकू ने उसकी तरफ़ झाँका और अपनी कॉपी में भी कुछ लिख लिया — मुझे पक्का यकीन है कि उसने भी बारह लिखा है, बस उसके अक्षर उलटे-सीधे हैं और उसके नीचे एक तीर बना है, जो ऊपर की तरफ़ जाता है।
शाम ढल चुकी थी। दीये एक-एक करके जल रहे थे और गली का सारा पत्थर उनकी रोशनी में पीला लग रहा था। काजल माँ के व्हीलचेयर को दुकान की तरफ़ ले गई थी, पर माँ ने बीच में हाथ उठाया — ज़रा रुको। पर मैंने किसी को सोचने नहीं दिया, क्योंकि माँ के चेहरे पर थी एक हल्की मुस्कान, जो कई दिनों से गायब थी।
लोग जाने लगे। बंसी बाबा धीरे-धीरे उठे। हाफ़िज़ बाबा ने उनकी लाठी उठाकर उन्हें पकड़ा दी। बच्चे दीये समेटने लगे। भोला भाई अपना रेडियो उठाने वाले थे, थाम जाएँ, पर मैंने कहा — "भोला भाई, वो अभी भी टूटा है। जब अपनी बात कहेंगे, तब जुड़ेगा।"
उन्होंने रेडियो वापस रख दिया और कुछ नहीं कहा। पर उनका हाथ जाते वक़्त मेरे कंधे पर पड़ा, सिर्फ़ एक पल।
नसीमा बाई ने साड़ी सँभाली और साजिद का हाथ पकड़कर चलने लगीं। तीन कदम चली थीं कि रुक गईं।
वो मुड़ीं।
दीये की रोशनी उनके चेहरे पर पड़ रही थी और उनकी आँखों में वो नमी अभी भी थी, जो रोने के बाद कुछ देर रह जाती है।
"बेटा," उन्होंने कहा।
"हाँ, आपा।"
"एक बात रह गई।" उन्होंने साजिद का हाथ और कसा। "दो हज़ार वाली बात मैं सबको बता दी। पर उस आदमी ने साजिद से एक और काग़ज़ दिखाया था।"
मेरे पैर वहीं जम गए।
"कैसा काग़ज़?"
नसीमा बाई ने साजिद की तरफ़ देखा। साजिद ने सिर झुका लिया, फिर उठाया, और उसकी आवाज़ फिर वैसी पतली हो गई, जैसी कुछ देर पहले थी।
"दुकान का काग़ज़," उसने कहा। "नीले निशान वाला। सफ़ेद कुर्ते वाले ने कहा कि यह तेरे पापा के ही अंगूठे वाला काग़ज़ है। उसने इसे मेरी आँखों के सामने खोला और बोला — तेरे पापा ने हमें दुकान दी थी, तो अब तेरा भी अंगूठा यहाँ मिलेगा।"
मैंने नसीमा बाई की तरफ़ देखा।
"सुनील भाई का अंगूठा?" मैंने धीरे से पूछा।
"सुनील ने कोई काग़ज़ नहीं दिया था," नसीमा बाई ने कहा। उनकी आवाज़ अचानक और सख़्त हो गई। "मैं जानती हूँ। उनके जाने से पहले हमने दुकान नहीं बेची, न गिरवी रखी, न किसी को दी। वो काग़ज़ अगर है, तो वो बना हुआ है।"
"आपने वो काग़ज़ देखा?"
"नहीं। साजिद ने देखा।"
साजिद ने धीरे से कहा, "मैंने सिर्फ़ कोना देखा, माँ। उसने काग़ज़ पूरा खोला ही नहीं। बस उँगली रखकर कहा — देख, यह तेरे पापा का अंगूठा है।"
"और तूने क्या किया?"
"मैं खड़ा रह गया," उसने कहा। "मुझे कुछ समझ नहीं आया। और मैं वहाँ खड़ा रहा जैसे… जैसे कोई मुझे वहाँ बाँधकर चला गया हो।"
मैं कुछ देर चुप रहा।
मेरे हाथ में घंटी थी और वो खुद हिल रही थी, हल्की-हल्की, जैसे कोई अंदर से खड़खड़ा रहा हो।
फिर घंटी ने बहुत धीमे से एक शब्द कहा। इतना धीमे कि सिर्फ़ मैंने सुना।
"फिर से अंगूठा।"
मैंने आँखें बंद कर लीं।
पापा का अंगूठा। सकीना बी के शर्तनामे पर सात अंगूठे। जगदीश दादा का अंगूठा। मेरी दुकान के काग़ज़ पर मेरा नाम और मेरे पापा का अंगूठा। और अब सुनील भाई का अंगूठा, किसी ऐसे काग़ज़ पर, जो साजिद ने देखा और कोई नहीं देख सका।
इस शहर में अंगूठे उग रहे थे। जैसे बरसात के बाद गली में काई उगती है।
"वो काग़ज़ कहाँ है?" मैंने पूछा।
"उसके पास," साजिद ने कहा। "वो वापस नहीं दिया।"
"कब दिखाया था?"
"तीन दिन पहले। रात में। गुमटी बंद हो चुकी थी। वो पीछे की तरफ़ से आया।"
मैंने साजिद के कंधे पर हाथ रखा।
"कल सुबह दस बजे पीपल पर सभा है। तुम दोनों आना। और जो तुमने अभी मुझे बताया, वही वहाँ सबके सामने कहना। बिना डरे। बिना बढ़ा-चढ़ाकर। जैसा देखा, वैसा।"
नसीमा बाई ने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे कुछ तोल रही हों।
"तुम क्या सोच रहे हो, बेटा?"
"मैं सोच रहा हूँ कि वो आदमी हर घर में एक ही चीज़ छोड़कर जाता है," मैंने कहा। "किसी के पास पैसा छोड़ता है, किसी के पास काग़ज़, किसी के पास डर। और फिर वो इंतज़ार करता है कि घर खुद-ब-खुद टूटे। उसे तोड़ना नहीं पड़ता।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"पर आज आपने एक काम किया है। आपने वो बात बाहर निकाल दी। जो बात बाहर आ जाती है, उसे कोई अंगूठा नहीं दबा सकता।"
नसीमा बाई ने कुछ सोचा। फिर अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया और साजिद का हाथ पकड़कर चल दीं।
मैंने उन्हें जाते देखा। साजिद चलते-चलते एक बार मुड़ा और उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो डर अभी भी था, पर उसके नीचे कुछ और भी था। कुछ जो पहली बार जाग रहा था।
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