The Mysterious Bell – Chapter 417
मैंने उसकी तरफ़ सिर हिलाया। वो भी हिलाया और चला गया।
मैं मेज़ के पास लौटा। सफ़ेद कार्ड वहीं पड़ा था, पीतल के पलड़े के पास। मैंने उसे उठाया और उँगलियों में घुमाया। काग़ज़ मोटा था, अच्छा था। किसी ने इसे बनवाया था, किसी दफ़्तर में छपवाया था, सोच-समझकर।
और उस पर कुछ नहीं लिखा था।
सिर्फ़ एक कोना, जहाँ नीली स्याही का एक छोटा-सा धब्बा था। जैसे जल्दी में किसी ने मोहर लगाई हो और मोहर फिसल गई हो।
मैंने टिंकू को बुलाया।
"यह कार्ड सँभालकर रख। कल सभा में मेज़ पर रहेगा।"
"और अगर कोई इसे उठा ले जाए?"
"तो ले जाए। अब यह सिर्फ़ काग़ज़ है। इसका ज़ोर तब तक है जब तक इसे छिपाकर रखा जाए।"
टिंकू ने कार्ड दोनों हाथों से लिया, अपनी कॉपी के बीच रखा और कॉपी अपनी कमीज़ के अंदर ठूँस दी।
"उस्ताद, एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"ये अंगूठे… जो बार-बार आ रहे हैं। ये असली हैं?"
मैं कुछ देर उसकी तरफ़ देखता रहा।
"कुछ असली हैं," मैंने कहा। "और कुछ ऐसे हैं जिन्हें असली बनाया गया है। फ़र्क़ यही है — पहचानना कि कौन सा किसने दबाया।"
"और सुनील भाई का अंगूठा?"
"वो सुनील भाई का है या नहीं, यह हमें कल पता चलेगा।"
वो कुछ सोचता हुआ चला गया।
मैंने एक लंबी साँस ली और मेज़ पर रखी सात टूटी चीज़ों की तरफ़ देखा। सातों वैसी ही थीं। एक भी नहीं जुड़ी थी। पर आज जो जुड़ा, वो मेज़ पर नहीं था। वो गली में चल रहा था — माँ और बेटे की आवाज़ में, शबनम आपा के एक किलो चीनी…शबनम आपा के उस हाथ में, जो उस वक़्त एक किलो चीनी तोल रहा था।
और वो किलो, बिल्कुल एक किलो निकला।
अब तुम सोच रहे होगे कि इसमें क्या बड़ी बात है? एक किलो चीनी एक किलो ही होती है। तो सुनो, नसीमा बाई का तराज़ू पिछले कई सालों से ठीक नहीं तोल रहा था। काँटा टेढ़ा था, पलड़ा टूटा हुआ था, और पूरी गली उस पर उँगली उठा रही थी। जिस दिन कोई कहे कि तुम चोरी करती हो, उस दिन इंसान का सबसे ज़्यादा नुक़सान उसकी जेब में नहीं, उसकी आवाज़ में होता है।
शबनम आपा ने चीनी की पुड़िया को तराज़ू पर से उठाया, फिर वापस रखा, फिर फिर उठाया। उनका हाथ काँप रहा था, पर काँपने की वजह डर नहीं थी। वजह कुछ और थी।
"देखो, देखो," वो चिल्लाईं, जैसे गली में किसी ने खज़ाना खोद निकाला हो। "एक किलो चीनी, एक किलो। न एक दाना ऊपर, न एक दाना नीचे।"
फिर उन्होंने पास में रखा गुड़ उठाया और तोला। आधा किलो, ठीक आधा किलो।
"अरे वाह," गुड्डू बोला, आँखें बड़ी करके। "आंटी, अब तो आप ठीक तोलती हो!"
"मैं पहले भी ठीक ही तोलती थी," नसीमा बाई ने कहा। पर उसमें वो कड़कपन नहीं था, जो सुबह उनकी आवाज़ में था। "तराज़ू ही मेरी इज़्ज़त पर शक कर रहा था।"
और यह कहते-कहते वो रो पड़ीं।
रोना अजीब होता है। किसी के घर में रोना दुख होता है, पर किसी बाज़ार में, किसी चबूतरी के पास, इतने लोगों के बीच रोना — वो दुख नहीं होता। वो एक बोझ होता है, जो सालों बाद कंधों से उतरता है, और उतरते वक़्त एक आवाज़ करता है।
बच्चे घबरा गए। चिंटू ने मेरी कमीज़ खींची।
"उस्ताद, आंटी रो रही हैं।"
"रोने दे," मैंने कहा। "ये रोना नहीं है, ये हिसाब बराबर हो रहा है।"
फिर घंटी बोली।
"छोटा जोड़। बारह अंक।"
मैं एक पल के लिए रुक गया।
"कितने?"
"बारह।"
"और कुल?"
"एक सौ तीस।"
मैंने मन में हिसाब लगाया। एक सौ अठारह थे। बारह जुड़े। हो गए एक सौ तीस।
और मेरे पास से निकले थे — चालीस।
आठ अठाईस का घाटा।
मैंने तराज़ू के काँटे को देखा। वो अब सीधा था। पीतल चमक रहा था, जैसे बरसों बाद पानी पिया हो। नसीमा बाई का हाथ अब भी उस पर टिका था, और वो हटाने को तैयार नहीं थी।
"घंटी," मैंने धीरे से कहा, इतना धीरे कि कोई सुन न सके।
"हूँ।"
"मैंने चालीस खर्च किए। तूने बारह लौटाए। ये उल्टा सौदा है।"
"तूने आज तक का सबसे ईमानदार सौदा किया है," घंटी ने कहा।
"कैसे?"
"जो जोड़ बाहर से दिखता है, वो छोटा होता है। असली जोड़ उनके अंदर हुआ, और वो मेरे हिसाब में नहीं आता। मैं सिर्फ़ उतना नापता हूँ जितना गली ने देखा।"
"मतलब?"
"मतलब — कुछ चीज़ें तेरे खाते से कटती हैं और उनका फ़ायदा किसी और के खाते में जाता है। उसे नेकी कहते हैं। तूने आज नेकी की, अंकुश। इसमें तू हमेशा घाटे में रहेगा।"
मैं हँस पड़ा। हँसी में वो कड़वाहट नहीं थी, जो पहले हुआ करती थी। पर कुछ तो थी।
टिंकू ने मेरी जेब में हाथ डाल दिया, जहाँ घंटी रहती है।
"उस्ताद, कितने हैं?"
"एक सौ तीस।"
"कम हो गए?"
"हाँ।"
"पर तराज़ू जुड़ गया ना?"
"जुड़ गया।"
तो वो खड़ा हो गया, दोनों हाथ कमर पर रखकर, और उसने ऐसे घोषणा की जैसे कोई मंत्री भाषण दे रहा हो।
"तो फिर घाटा नहीं हुआ! हिसाब और इज़्ज़त अलग-अलग थैलियों में रखे जाते हैं, उस्ताद। मेरी माँ कहती है।"
मैंने उसे देखा। तेरह साल का लड़का, जिसने स्कूल छोड़ दिया था, जिसके पापा छह महीने पहले गए थे, और जिसका असली डर यह था कि कहीं उसे भी दुकान से निकाल न दिया जाए। वो मेरे सामने खड़ा था और इज़्ज़त की थैली की बात कर रहा था।
"तेरी माँ को ज्ञान देने के लिए कहूँगा," मैंने कहा।
"माँ को नहीं, माँ रूठ जाएगी। मुझे कहिए, मैं लिख लेता हूँ।"
"लिख।"
उसने सच में जेब से पेंसिल निकाली और अपनी हथेली पर कुछ लिख लिया। फिर पोंछ दिया, क्योंकि स्याही नहीं थी, सिर्फ़ दबाव था।
तराज़ू अब भी चबूतरी के पास रखा था। मैंने उसे उठाया नहीं। मैंने सिर्फ़ उसका काँटा एक बार उँगली से छुआ, और देखा कि पीतल के पलड़े का फटा किनारा जुड़ चुका था। जोड़ वैसा ही था जैसे दादा की साइकिल की चेन जुड़ी थी, या उस मिट्टी के कटोरे की लकीर कायम रह गई थी। तंत्र किसी को नया नहीं करता। वो सिर्फ़ टूटन को इतना भर देता है कि चीज़ फिर काम करने लगे।
शाम अब पूरी तरह उतर आई थी।
पीपल के नीचे बच्चों ने मिट्टी के तेल के दीये जलाए थे। छह दीये। किसी ने पुरानी ईंटों पर रखे थे, किसी ने सीधे ज़मीन पर, और एक दीया चिंटू ने पत्थर की चबूतरी के उस कोने पर रखा था जहाँ बुज़ुर्ग बैठते हैं। हवा के साथ उनकी लौ कभी झुकती, कभी सीधी हो जाती, और उसी हिलती रोशनी में गली की सारी चीज़ें दो बार दिख रही थीं — एक बार जैसी थीं, और एक बार जैसी लग रही थीं।
शबनम आपा ने तराज़ू के पास आकर मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश।"
"हाँ, आपा।"
"आज गली का हिसाब सीधा हो गया।"
"हुआ तो है।"
"अब तू एक काम कर। मेरी गुमटी में एक तराज़ू है, वो भी टेढ़ा है। कल उसे भी सीधा कर दे।"
"आपा, आपका तराज़ू टेढ़ा नहीं है।"
"तो?"
"आप का काँटा सीधा है। बस आप किसी को कम तोलती नहीं, और लोगों को यह पसंद नहीं आता।"
वो एक पल चुप रहीं। फिर उन्होंने अपनी लोहे की चिमटी उठाई, जो हमेशा उनकी कमर में अटकी रहती है, और हवा में हिलाई।
"तेरी ज़ुबान भी किसी दिन तेरा गला काटेगी," उन्होंने कहा। "चाय पी। ठंडी हो रही है।"
मैंने कुल्हड़ उठाया।
नसीमा बाई और साजिद के हाथ में भी कुल्हड़ थे। दोनों चबूतरी के किनारे बैठे थे, एक-दूसरे से थोड़ी दूर, पर उतनी दूर नहीं जितनी सुबह थे। साजिद कुल्हड़ को दोनों हाथों से पकड़े हुए था, जैसे वो उसका नहीं, किसी और का हो और उसे संभालना पड़े।
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