The Mysterious Bell415 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 415

7 min read November 5, 2026

"नहीं।" साजिद ने कुल्हड़ मेज़ पर रख दिया, ऐसे जैसे अब उसे संभालना मुश्किल हो। "नहीं, माँ, मैं जाना नहीं चाहता। मैं डरता हूँ।"

वो रुका। उसके गले में कुछ अटका।

"मैं डरता हूँ कि कहीं मैं तुझे अकेला छोड़कर चला गया, और फिर कभी न लौटा, तो कोई मुझे तेरा बेटा नहीं कहेगा। और मैं यह भी डरता हूँ कि अगर यहीं रहा, तो एक दिन तेरी दुकान, तेरा घर, तेरी साड़ी — सब बिक जाएगा, और उसका इल्ज़ाम भी मुझ पर ही आएगा।"

वो अब सीधा माँ की तरफ़ देख रहा था। पहली बार।

"उस आदमी ने मुझे दो हज़ार दिए। कहा — यह तेरी माँ की दवा के लिए है, लौटाने की जल्दी नहीं। और कहा — जब वक़्त आएगा, मैं खुद तेरे पास आ जाऊँगा। मैंने पूछा, कब? तो वो हँसा और बोला — जब तेरी ज़रूरत सबसे ज़्यादा होगी।" साजिद ने अपनी जेब से वो मोड़ा हुआ सफ़ेद कार्ड निकाला और मेज़ पर रख दिया। "यह आज तक मेरी जेब से नहीं निकला। छत पर बैठकर रोज़ इसे छूता रहा। कभी सोचता — फेंक दूँ। कभी सोचता — नहीं, दुकान घाटे में है, रख ले। और रोज़ लगता कि मैंने माँ से बड़ा झूठ बोला है।"

वो फिर माँ की तरफ़ देखकर बोला।

"मैं बुरा बेटा नहीं बनना चाहता, माँ। बस डरा हुआ बेटा हूँ।"

नसीमा बाई कुछ देर उसे देखती रहीं। फिर उन्होंने अपना हाथ बढ़ाया और उसका हाथ पकड़ लिया।

दोनों एक-दूसरे को देख रहे थे। और मैं खड़ा देख रहा था कि गली का सारा शोर कैसे रुक गया — शबनम आपा के गैस बर्नर की आवाज़, बच्चों की फुसफुसाहट, पीपल की पत्तियाँ। सब रुका हुआ।

साजिद ने हाथ नहीं छुड़ाया।

"मैं शहर नहीं जाऊँगा," उसने धीरे से कहा।

"क्यों?" नसीमा बाई ने पूछा। उनकी आवाज़ में शक नहीं था, सिर्फ़ थकान।

"क्योंकि तूने कहा था कि मुझे तेरी ज़रूरत नहीं। और मैंने सोच लिया था कि ठीक है, मुझे भी किसी की ज़रूरत नहीं।" उसने हाथ और कसकर पकड़ा। "पर झूठ दोनों का था, माँ। तेरा भी, मेरा भी। अब नहीं बोलूँगा तो कब बोलूँगा।"

नसीमा बाई ने कुछ सोचा। फिर उन्होंने हाथ खींचकर अपने सीने से लगा लिया। उनकी साड़ी का पल्लू उसके कंधे पर गिर गया।

"जाना हो, तो साथ लेकर जाना," उन्होंने धीरे से कहा। "मेरी दुकान का ट्राली में क्या रखना है, मेरा हिसाब, मेरी चीज़ें — सब साथ। मैं तेरे पीछे की ज़ंजीर नहीं बनूँगी, पर तेरे साथ चलने में मुझे शर्म नहीं। बस एक बात — मुझे अकेले मत छोड़कर जाना। किसी भी हाल में मत छोड़ना।"

"नहीं छोड़ूँगा," साजिद ने कहा। उसकी आवाज़ अब पतली नहीं थी। वो भर गई थी। "और माँ, वो दो हज़ार — मैं कल उस आदमी को लौटा दूँगा। पक्का। मुझे उसके पैसे नहीं चाहिए।"

"लौटाने से पहले उसका नाम चाहिए," मैंने कहा।

वो दोनों मेरी तरफ़ मुड़े।

"क्योंकि जो पैसा नाम बताए बिना दिया जाता है, वो पैसा नहीं होता। वो लगाम होती है।"

साजिद ने वो सफ़ेद कार्ड उठाकर मेरी तरफ़ बढ़ा दिया। मैंने उसे नहीं लिया।

"अभी नहीं," मैंने कहा। "अभी इसे मेज़ पर उसी पलड़े के पास रखो। जब तक उस आदमी का नाम नहीं खुलता, यह यहीं रहेगा। गली की नज़र में।"

उसने कार्ड पलड़े के पास रख दिया और दोनों कदम पीछे हट गए, जैसे उस चीज़ से छुटकारा मिल गया हो।

मैंने टिंकू को इशारा किया।

"टूलबॉक्स।"

वो फ़ौरन दौड़ा। टूलबॉक्स लाया और मेज़ पर रख दिया। उसने टॉर्च भी जला दी, जबकि अभी पूरी रोशनी थी।

"टॉर्च की ज़रूरत नहीं, दिन है।"

"उस्ताद, बुरा वक़्त कभी भी आ सकता है।"

मैं हँस पड़ा। इसका कोई जवाब नहीं।

मैंने वो पीतल का पलड़ा उठाया। किनारा मुड़ा हुआ था, और जिस छोटी टाँग से वो तराज़ू की बाँह से लटकता है, वो नीचे से टूटी थी। पलड़े का रंग पीतल से ज़्यादा जंग जैसा लग रहा था, पर जहाँ पहले की सफ़ाई हुई थी, वहाँ से एक पतली पीली लकीर चमक रही थी। बरसों तक लोहे को किसी ने नहीं छुआ था, इसीलिए उसने अपनी चमक अपने अंदर ही छिपा रखी थी।

मैंने रेती निकाली। जंग छुड़ाने लगा।

"यह पलड़ा मेरे ससुर का है," नसीमा बाई ने कहा। "पुराने बाज़ार से तराज़ू आया था। सुनील के पापा का था। फिर हमारे पास आया। यही एक चीज़ मेरे पास बची है उनकी।"

"और कुछ नहीं बचा?" मैंने पूछा।

"और सब बिक गया," उन्होंने धीरे से कहा। "और सब बेचने के बाद भी हिसाब नहीं मिला।"

मैंने हथौड़ा उठाया। मेज़ पर लकड़ी का एक मोटा टुकड़ा रखा, पलड़े की टूटी टाँग को उस पर रखा और हल्के हाथ से ठोका। कोई जल्दी नहीं थी। पीतल ऐसी चीज़ है, जिसे ज़्यादा चोट लगा दो तो वो चटक जाता है, और मरम्मत की जगह बड़ी दरार बन जाती है।

पीछे से कोई बोला।

"उसकी टाँग की कड़ी तिरछी हो गई है। सीधी नहीं करोगे तो फिर टूटेगी।"

मैं रुका। मुड़ा।

पापा खड़े थे। हाथ में उनका पुराना पेचकस था, जो वो हमेशा जेब में रखते थे, जैसे किसी के ज़रिए ही निकलेगा।

"बैठिए," मैंने धीरे से कहा।

वो दो कदम आए। किसी ने कुछ नहीं कहा। और वो मेरे बगल में पलड़े के दूसरी तरफ़ बैठ गए।

मैंने उनकी तरफ़ देखा। उन्होंने नहीं देखा। बस पलड़ा उठाया, दोनों हाथों से घुमाया, और उँगली से टाँग की कड़ी की तरफ़ इशारा किया।

"इधर," उन्होंने कहा।

मैंने प्लायर उनकी तरफ़ बढ़ा दिया। उन्होंने लिया, बिना नाम लिए, बिना शुक्रिया। दबाकर मरोड़ी, फिर हथेली पर रखकर देखा।

"अब ठोक सकते हो।"

मैंने ठोका। एक, दो, तीन हल्के हाथ। पीतल धीरे-धीरे अपनी जगह पर लौट रहा था।

तभी घंटी ने कहा — "लील जगह पर। ज़्यादा नहीं।"

"लील?" मैंने धीरे से पूछा।

"मरम्मत में एक हिस्सा छोड़ना पड़ता है। जो सब कुछ जोड़ देता है, वो कभी-कभी तोड़ भी देता है।"

मैंने हथौड़ा नीचे रख दिया।

पापा ने पलड़े को उठाया, उँगली से किनारा सहलाया और मेरे हाथ पर रख दिया। फिर बिना कुछ कहे वहीं बैठे रहे। उनका पेचकस उनकी उँगलियों में घूमता रहा।

मैंने तराज़ू का काँटा उठाया। वो मेज़ के पीछे, लकड़ी के स्टैंड पर टिका हुआ था। मुड़ी हुई धातु, जिसे नसीमा बाई ने बरसों तक अपने ही हाथ से दबाया था, ताकि ग्राहक को लगे कि सब ठीक है।

मैंने उसे सीधा किया। धीरे-धीरे। टिंकू ने अपनी साँस रोक ली थी। साजिद कुछ आगे खिसक आया। नसीमा बाई की गोद में उनका ही हाथ काँप रहा था, जैसे हिसाब की कॉपी के ऊपर होता है।

फिर एक क्षण ऐसा आया कि पीतल ने हल्की-सी आवाज़ दी। जैसे किसी पुराने जोड़ में हड्डी वापस जगह पर आ गई हो।

मैंने तराज़ू को हैंडल से पकड़कर ऊपर उठाया। दोनों तरफ़ पलड़े लगाए। और फिर खाली तराज़ू को हवा में लहराया — अंत में इधर कुछ नहीं था, उधर कुछ नहीं था।

काँटा सीधा रुका।

"अब तोलकर देखिए," मैंने कहा।

नसीमा बाई ने उठने की कोशिश की, पर उनके घुटने जवाब दे गए। साजिद ने हाथ थामा। वो खड़ी होकर तराज़ू के सामने गई।

शबनम आपा ने चिमटी पटक दी।

"एक मिनट," वो बोलीं, "मैं अपनी चीनी लेती हूँ।"

वो गुमटी की तरफ़ दौड़ीं, दौड़ते हुए एक कटोरी चीनी लेकर आईं, और वो चीनी सीधे तराज़ू के पलड़े पर रख दी।

"एक किलो होना चाहिए।"

तराज़ू का काँटा बिलकुल बीच में आकर रुक गया।

गली में पहले एक सन्नाटा आया, और फिर इतनी आवाज़ आई कि पीपल के पत्तों तक काँप उठे। गुड्डू ताली बजा रहा था, रफ़ीक़ अपने सफ़ेद जूते पटक रहा था, चिंटू कूदकर दीये गिराने ही वाला था। बंसी बाबा ने हँसकर हाफ़िज़ बाबा के कंधे पर हाथ रख दिया और दोनों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा, जैसे कह रहे हों — पचास साल बाद भी कुछ चीज़ें सीधी हो जाती हैं।

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