The Mysterious Bell – Chapter 414
मैंने देखा और सोचा — आज की शाम कुछ वैसी ही है।
सूरज स्कूल की छत के पीछे जा रहा था। आसमान में नारंगी और धूल मिलकर ऐसा रंग बना रहे थे, जैसे किसी ने पुरानी तस्वीर पर पानी फेर दिया हो। चबूतरी पर बुज़ुर्ग बैठे थे, बंसी बाबा, हाफ़िज़ बाबा, क़ादिर बाबा — सब एक ही चादर पर, कंधे से कंधा मिलाकर, जैसे पचास साल की चुप्पी का कोई हिसाब ही न हुआ हो।
पीपल के नीचे वो टूटी लकड़ी की मेज़ रखी थी, जिसे मैंने दुकान के पीछे से निकालकर ठीक किया था। उस पर सफ़ेद पेंट का बोर्ड टँगा था, जिस पर मेरी ही लिखाई में उलटे-सीधे अक्षर थे — जोड़ केंद्र। टूटी चीज़ लाओ। टूटा रिश्ता साथ लाओ। सच बोलोगे, तभी जुड़ेगा।
आज शाम यहाँ सात टूटी चीज़ें रखी थीं। सानिया की गुड़िया, जिसके सिर के पीछे के बाल और एक हाथ गायब था। गुड्डू की वो घड़ी, जिसमें न काँटे बचे थे, न काँच, सिर्फ़ पट्टा। चिंटू का तांबे की केतली का ढक्कन। भोला भाई का खुद तोड़ा हुआ रेडियो। आधी पतंग, जो पीपल की डाल में एक हफ़्ते फँसी रही थी। बिना काँटे की एक और घड़ी, जिसे रफ़ीक़ लाया था। और नसीमा बाई का पीतल का पलड़ा।
सातों अभी भी टूटे थे। एक भी ठीक नहीं हुआ था।
पर आज मेज़ पर एक और चीज़ रखी थी, जो टूटी नहीं थी। वो थी चाय के कुल्हड़ों की ट्रे, जिसे शबनम आपा खुद उठाकर लाई थीं।
"शर्त याद है ना," उन्होंने ट्रे मेज़ पर रखते हुए कहा। "मेरी गुमटी से चाय लेकर ही कोई यहाँ बैठेगा। यह जोड़ केंद्र है, कोई मुफ़्त की पंचायत नहीं।"
"आपा, आप हर बात में हिसाब लगा देती हैं," मैंने कहा।
"हिसाब से ही गली चलती है, बेटा। जिस दिन हिसाब टेढ़ा हुआ, उस दिन सब टेढ़े हो गए।" उन्होंने चिमटी से समोसे की प्लेट भी रख दी और बिना कुछ कहे अपनी गुमटी की तरफ़ लौट गईं।
बच्चे दीये जला रहे थे। सानिया और चिंटू स्टील की थाली में छोटे-छोटे दीये रखकर लाए थे, गुड्डू तेल की बोतल से ज़्यादा तेल अपनी कमीज़ पर गिरा रहा था, और रफ़ीक़ माचिस की डिब्बी को दोनों हाथों से पकड़े ऐसे खड़ा था, जैसे उसमें बारूद हो।
टिंकू हर दीये को क्रम से रखवा रहा था।
"पहला दीया पीपल के तने की तरफ़," वो कह रहा था, "दूसरा पूरब, तीसरा मेज़ के पास। दीया जलाने का भी नियम होता है, भाई।"
"तेरे पास हर चीज़ का नियम है," गुड्डू ने कहा।
"होता है। और जिसके पास नियम नहीं, उसके पास सिर्फ़ बहाने होते हैं।"
मैं मुस्कुराया। यह लड़का जिस दिन स्कूल जाएगा, वहाँ का मास्टर ज़रूर एक बार अपनी कुर्सी से उठकर खड़ा हो जाएगा।
तभी गली के मुँह से नसीमा बाई आईं।
उनके हाथ में कुछ नहीं था। साड़ी का पल्लू कंधे पर था, माथे पर लाल टीका, और चेहरे पर वो थकान, जो रोज़ सुबह चूल्हे के धुएँ से शुरू होकर रात के हिसाब तक चलती है। उनके पीछे साजिद था। दुबला, कंधे अंदर की तरफ़ धँसे हुए, हाथ जेब में, और आँखें ज़मीन पर।
वो आकर मेज़ के सामने खड़े हो गए। नसीमा बाई ने आसपास देखा। चबूतरी पर बुज़ुर्ग, पीछे खड़े लोग, मीरा एक कोने में कैमरा नीचे किए, काजल हाथ में स्टील का गिलास लिए, और पापा — पापा गली की दीवार के सहारे खड़े थे, जैसे कोई सब कुछ देखने आया हो, पर किसी को दिखना नहीं चाहता हो।
"बैठिए," मैंने कहा और दो पुराने लकड़ी के स्टूल आगे कर दिए, जो मैं दुकान से उठाकर लाया था।
नसीमा बाई बैठीं। साजिद नहीं बैठा। वो माँ के पीछे खड़ा रहा।
"बेटा, बैठ," नसीमा बाई ने कहा।
"मैं खड़ा ठीक हूँ।"
शबनम आपा ने दो कुल्हड़ आगे बढ़ाए। दोनों ने लिए, पर किसी ने पिया नहीं।
मैंने एक दीया मेज़ के किनारे रखा और सबकी तरफ़ देखा।
"आज यहाँ कोई माँ नहीं है," मैंने कहा। "कोई बेटा नहीं है। कोई दुकानदार नहीं, कोई ग्राहक नहीं। आज यहाँ सिर्फ़ दो लोग हैं, जिन्होंने एक-दूसरे से कुछ नहीं कहा। और सुनो — जो नहीं कहा जाता, वही सबसे ज़्यादा तोलता है। तराज़ू का काँटा लोहे से नहीं टेढ़ा होता। वो उस बात से टेढ़ा होता है, जो हमने अंदर दबा रखी है।"
नसीमा बाई ने कुल्हड़ को दोनों हाथों से पकड़ा। उनकी उँगलियों पर मेहंदी का उतरा हुआ रंग था और नाखूनों के किनारे गुड़ की चाशनी जैसी चमक।
कुछ देर कुछ नहीं हुआ। पीपल की पत्तियाँ हिलीं। दूर कहीं किसी के घर में कुकर की सीटी बजी और बंद हो गई। चिंटू ने बोलना चाहा, पर सानिया ने उसकी कमीज़ खींच ली।
फिर नसीमा बाई बोलीं।
"मैं जानती हूँ, तुम सब मुझे क्या कहते हो।" उनकी आवाज़ सामान्य थी, पर उसमें वो कंपन था जो आमतौर पर रोने से पहले आता है। "कम तोलने वाली। जिसे कोई भी तोल कर नहीं लेता। चार लोग ऐसे भी हैं, जो कहते हैं — अम्मा, तुम तोल देती हो, बस काँटा टेढ़ा है।"
वो रुकीं।
"मैंने अपनी सारी ज़िंदगी हिसाब में लगा दी। सुबह से आटा, चावल, दाल, गुड़। एक-एक पैसा ऊपर-नीचे। सुनील जब थे, तब भी यही हिसाब था। उनके जाने के बाद भी यही हिसाब है।" उन्होंने कुल्हड़ नीचे रखा। "और सच यह है, बेटा — मुझे अकेले रहने से डर लगता है।"
आवाज़ टूट गई।
"रात को शटर गिराती हूँ, तो लगता है कि आज कोई दरवाज़ा खटखटाएगा नहीं। चूल्हा जलाती हूँ, तो लगता है कि यह आग मेरे साथ ही बुझेगी। दुकान में घड़ी की टिक-टिक सुनती हूँ और सोचती हूँ — यह आवाज़ किसी और को सुनाई नहीं देती, सिर्फ़ मुझे देती है।"
उन्होंने अपनी साड़ी का पल्लू सीधा किया, जो पहले से सीधा था।
"बेटे के लिए दुआ करती हूँ कि वो लौटे, और उसी बेटे को यह भी नहीं कह पाती कि तू मत जा। क्योंकि अगर कहूँगी, तो लगेगा कि मैं उसके पैरों में ज़ंजीर बाँध रही हूँ।" उन्होंने आँखों पर हाथ फेरा। "और उस दिन मैंने उससे जो कहा — मुझे तेरी ज़रूरत नहीं — वो मेरा शब्द नहीं था, बेटा। वो मेरा डर था जो मेरी ज़ुबान से बोल गया।"
गली में सन्नाटा था। इतना सन्नाटा कि पीपल की एक पत्ती गिरी और उसकी आवाज़ सबको सुनाई दी।
तभी साजिद बोला।
"माँ।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके हाथ से कुल्हड़ काँप रहा था और चाय के छींटे उसकी उँगलियों पर गिर रहे थे।
"माँ, मैं बुरा बेटा नहीं बनना चाहता।"
उसकी आवाज़ पतली थी। जैसे किसी पुरानी साइकिल की चेन जो चढ़ी तो है, पर कड़ी घिस गई है।
"मैं रोज़ सुबह उठता हूँ और कॉपी खोलता हूँ। हर महीने वही लिखा होता है। घाटा आठ हज़ार से ऊपर, कभी नौ। दुकान का किराया, बिजली, तेरी दवा, और वो ब्याज जो मैंने किसी को नहीं बताया।" उसने एक गहरी साँस ली। "मैं हिसाब भूल सकता हूँ, पर ब्याज नहीं भूलता। वो रात-रात मेरे सिरहाने बैठकर गिनता है।"
मीरा ने कैमरा और नीचे कर दिया। शबनम आपा ने चिमटी रख दी। टिंकू ने अपनी कॉपी बंद कर दी, जिसमें वो हर बात लिखता था।
"जब दुकान की हालत देखता हूँ, तो लगता है कि मैं इस लायक़ ही नहीं हूँ। पढ़ाई में कमज़ोर हूँ, हिसाब में धीमा हूँ, बोलने में कमज़ोर हूँ। मेरे ही उम्र के लड़के साइट पर हज़ार कमाते हैं, और मैं माँ की दुकान पर बैठा रह जाता हूँ। बस — कभी-कभी लगता है कि भाग जाना ही एक रास्ता है। शहर चला जाऊँ, किसी गोदाम में काम कर लूँ, कोई मुझसे कुछ न पूछे।"
"तो तू जाना चाहता है?" नसीमा बाई ने पूछा। उनकी आवाज़ रुखी थी, पर उसमें माँ थी।
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