The Mysterious Bell – Chapter 413
मैं रुका। "साया?"
"नाम का साया। जब किसी आदमी का नाम सब जगह मिटा दिया जाए, और लोग सिर्फ़ उसकी तारीफ़ करें, तो बचता है साया। उसका साया तेरे पापा के काग़ज़ पर लगे अंगूठे में है, साजिद के सफ़ेद कार्ड में है, और उस रात में है जब घंटी तोड़ी गई थी।"
मैंने घंटी को मुट्ठी में कस लिया।
"तो आज मरम्मत नहीं होगी," मैंने कहा। "आज मुझे उस आदमी का नाम चाहिए।"
"नाम नहीं," घंटी ने कहा, और आवाज़ धीमी हो गई। "नाम का साया।"
कमरा फिर चुप हो गया।
मैं बाहर आया। शाम पाँच बज रही थी। गुमटी की तरफ़ से शबनम आपा का बुलावा आया — "अंकुश, चाय!" — पर मैंने हाथ उठाकर मना कर दिया। वो पीपल के नीचे आई, पीतल की थाली में कप लेकर।
"क्या हुआ?" उसने पूछा। और उसकी आवाज़ में वो तेज़ी नहीं थी, सिर्फ़ सीधा सवाल।
"आपा," मैंने कहा, "सफ़ेद कुर्ते वाले आदमी ने साजिद से क्या कहा, आप अंदाज़ा लगा सकती हैं?"
वो रुकी। थाली पीपल की चबूतरी पर रखी।
"अंदाज़ा नहीं," उसने कहा। "सुना है मैंने। उस दिन गुमटी पर आया था। साजिद को कोने में बुलाकर कह रहा था — तेरी माँ के पास कुछ काग़ज़ हैं, उन्हें साहब के पास रखना होगा। बेटा, जवान है, समझ जाएगा।"
"और आपने कुछ कहा नहीं?"
"मैंने कहा था — भाई साहब, चाय पी जाइए।" उसने पल्लू ठीक किया। "पर जब वो मुड़ा, तो मैंने उसकी जेब से एक काग़ज़ का कोना बाहर निकला देखा। नीली स्याही थी उस पर। और वो काग़ज़ ठीक वैसा था जैसा तेरे पापा के बंडल में था।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"आपने किसी को क्यों नहीं बताया?"
"किसको बताती?" उसने कहा। "तेरे पापा से? जो खुद उसी दिन से चुप थे?" उसने कप उठाया और मेरी तरफ़ बढ़ाया। "चाय ठंडी हो रही है। पी ले।"
मैंने कप लिया।
शाम को बच्चे गली में खेलने लगे। सानिया और रफ़ीक़ ने फिर पतंग बनानी शुरू की। गुड्डू ने चिंटू की रिम लेकर उसे सड़क पर घुमाया। टिंकू मेरे पास बैठा रहा, चुप।
"उस्ताद," उसने कहा, "आपने अंदर जाकर क्या देखा?"
"बहुत कुछ," मैंने कहा।
"डरावना था?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। तेरह साल का लड़का, घुटने पर पट्टी, आँखों में सवाल।
"डरावना नहीं," मैंने कहा। "दुखद था।"
"फ़र्क़ क्या है?"
"डरावना तब होता है जब कोई तुझे डराना चाहता है। दुखद तब होता है जब कोई खुद डरा हुआ हो और कह न पा रहा हो।"
टिंकू ने सोचा। फिर बोला, "तो नसीमा बाई डरी हुई हैं?"
"बहुत।"
"और साजिद भाई?"
"वो भी।"
"तो फिर वो झगड़ते क्यों हैं?"
"क्योंकि डर को भी बोलना होता है," मैंने कहा। "और जब इंसान उसे माँ-बेटे की ज़ुबान में नहीं बोल पाता, तो वो बहस बनकर निकलता है।"
टिंकू चुप बैठा रहा। फिर उसने कहा, "उस्ताद, मेरी माँ भी रोज़ डाँटती हैं।"
"तेरी माँ भी डरी हुई है," मैंने कहा। "उसका डर है कि तू बड़ा होकर क्या करेगा। और उसे पता नहीं कि वो तुझे कैसे बताए।"
टिंकू ने सिर नीचा कर लिया।
फिर मैंने उसका कंधा थपथपाया और उठ गया। मुझे घर जाना था।
घर पहुँचा तो माँ चूल्हे के पास बैठी थीं। काजल दवा की प्लास्टिक थैली लेकर आई थी और चुपचाप रख रही थी। पापा अपने औज़ारदान के पास बैठे थे, कुछ पोंछ रहे थे।
मैंने कुछ नहीं कहा। सीधे छत पर चला गया।
रात हो चली थी। गली की बत्तियाँ जल रही थीं। नीचे से किसी के हँसने की आवाज़ आ रही थी। मैंने घंटी निकाली और हथेली में रखकर देखा।
फिर मन में वो दृश्य आया — साजिद, खंभे के पीछे वो सफ़ेद कुर्ता, और मुझे साफ़ सुनाई दिया — "तेरी माँ की दुकान के काग़ज़ साहब के पास सुरक्षित हैं।"
मैंने होंठ भींचे।
"तेरे पास दुकान के काग़ज़ कैसे पहुँचे?" मैंने धीरे से पूछा, जैसे खुद से। "किसने दिए?"
घंटी चुप रही।
मैंने उसे फिर हिलाया।
घन।
"पूछ," घंटी ने कहा।
"क्या तू जानती है कि वो आदमी साजिद को दुकान के काग़ज़ कैसे देता है?"
"काग़ज़ नहीं देता," घंटी ने कहा। "काग़ज़ लेता है। और बदले में काग़ज़ देता है। यही तो उसका तंत्र है।"
मैं हिल गया।
"मतलब — वो सिर्फ़ अंगूठा नहीं लेता। वो पहले कुछ लेता है, फिर देता है। और फिर वो लिया हुआ हमेशा उसके पास रहेगा।"
"हाँ।"
"तो फिर — मेरे पापा के साथ भी?"
घंटी चुप रही।
"क्या पापा से भी पहले कुछ लिया गया था?"
"तेरे पापा के पास क्या था जो उसने लिया?"
मैंने सोचा। फाइल? नहीं। माँ का इलाज? नहीं। फिर मुझे याद आया — उस्ताद ने उस रात कहा था कि उनकी पुरानी दुकान से पापा ने पच्चीस साल पहले साइकिल गिरवी रखी थी। और उस साइकिल पर घंटी थी।
"उसने पापा से घंटी ली थी," मैंने कहा। आवाज़ धीमी थी।
"नहीं," घंटी ने कहा। "उसने घंटी नहीं ली। उसने घंटी की राह देखी। और जब मिली, तो उसने उसे तोड़ा।"
मैं छत पर खड़ा रह गया।
रात की हवा चल रही थी। नीचे गली में कहीं बच्चा रो रहा था। और मेरे हाथ में पीतल की घंटी थी, जो मेरे खानदान की थी, जिसे कोई तोड़ना चाहता था, और जिसे तोड़ने वाला आज भी ज़िंदा था।
मैंने उसे मुट्ठी में दबाया।
"आज मरम्मत नहीं," मैंने धीरे से कहा। "आज पहले उस आदमी का नाम चाहिए।"
घंटी ने बहुत धीमे से कहा, "नाम नहीं। नाम का साया।"
और उसके बाद वो चुप हो गई।
मैं देर तक छत पर खड़ा रहा। ऊपर आसमान था, जिसमें तारे थे, पर मुझे अब भी साजिद के चेहरे पर वो नंबर दिख रहा था — बिना नाम का नंबर, जिसे वो उँगली से छू रहा था और हटा रहा था।
मुझे लगा कि उस रात उस सफ़ेद कुर्ते वाले की बात ने किसी और से भी कुछ कहा होगा। किसी ऐसे से, जो मेरे ही घर में था।
मैं नीचे उतरा। पापा अब भी औज़ारदान के पास बैठे थे। उन्होंने मेरी तरफ़ नहीं देखा, पर उनका हाथ रुक गया था।
"पापा," मैंने कहा।
वो नहीं बोले।
"पापा, उस आदमी ने आपसे घंटी के अलावा कुछ और माँगा था?"
उन्होंने धीरे से सिर उठाया। आँखें थकी हुई थीं। उन्होंने कुछ सोचा, फिर बोले — "उसने कुछ नहीं माँगा। उसने बस देखा। और जब कोई बस देखता है, तो समझ लो कि वो लेने आया है।"
वो फिर झुक गए।
मैं वहीं खड़ा रहा।
और मेरे हाथ में घंटी थी, और घंटी के अंदर एक नाम का साया था, जो अभी बाहर आने को बेचैन था।
अगली सुबह, सभा में, रज़ा सलीम रजिस्टर लाने वाला था। और मैं जानता था कि उस रजिस्टर में सिर्फ़ सात नाम नहीं थे। वहाँ एक आठवाँ भी था — बिना नाम का। और वही सबसे खतरनाक था।
मैंने घंटी को जेब में रखा।
और सोचा — कल सुबह, पीपल के नीचे, सिर्फ़ रजिस्टर नहीं खुलेगा। एक नाम का साया भी खुलेगा। और उसे खोलने के लिए मुझे वो आदमी चाहिए — वो नहीं, जो सफ़ेद गाड़ी में आता है, बल्कि वो, जो सफ़ेद कुर्ते में चलता है और किसी के काग़ज़ किसी और के हाथ में रख देता है।
मैंने छत से नीचे देखा। गली सो रही थी। नसीमा बाई की दुकान का शटर गिरा था। साजिद की छत पर चादर हवा में हिल रही थी।
और मुझे लगा — जब तक वो दोनों अपनी सच्ची बात नहीं कहेंगे, तराज़ू नहीं जुड़ेगा। पर आज रात मुझे तराज़ू नहीं चाहिए था।
आज रात मुझे उस आदमी का नाम चाहिए था।
घंटी ने कहा था — नाम नहीं, नाम का साया।
तो फिर, कल, मैं साया ही खींचूँगा।
॥
शाम को जब मैंने पीपल के नीचे पहला दीया जलाया, तो हवा ने उसे एक बार झुकाया और फिर छोड़ दिया। दीया बुझा नहीं। बस झुककर फिर सीधा हो गया।
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