The Mysterious Bell408 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 408

7 min read November 5, 2026

"ये पतंग दोनों ने मिलकर बनाई थी," चिंटू ने धीरे से मुझे बताया। "पिछले महीने। दो दिन लगे थे।"

"और अब?"

"अब कोई नहीं उतारता।"

मैंने सानिया को बुलाया। फिर रफ़ीक़ को। दोनों केंद्र की मेज़ के सामने दो स्टूल पर बैठे — रफ़ीक़ मुँह फेरे हुए, सानिया आँखें नीची किए हुए।

"पतंग किसने उड़ाई थी?" मैंने पूछा।

"हम दोनों ने," सानिया ने कहा।

"तो कटी कैसे?"

"रफ़ीक़ की डोर से।"

"मेरी डोर से नहीं," रफ़ीक़ सीधा होकर बोला। "मैंने तो बस खींची थी।"

"तो खींचने से कटी न?"

"मेरा मतलब—"

"रफ़ीक़," मैंने कहा, "मैं तेरी जगह पर आकर नहीं सोचूँगा। तू अपनी जगह से बोल।"

वो चुप हो गया। फिर धीरे से बोला, "हाँ। मेरी डोर ने काटी। पर मैंने जान-बूझकर नहीं काटी।"

"फिर गलती किसकी थी?"

"मेरी।" वो बैठ गया।

सानिया की आँखें भर आईं। "और मैंने कहा था कि तेरे पापा के जाने के बाद तेरी कोई चीज़ नहीं चलती।"

कमरे में सन्नाटा हो गया।

"ये तूने कहा था?" मैंने पूछा।

"हाँ।" सानिया ने मुँह नहीं छिपाया। "और मुझे पता है कि ये झूठ है। रफ़ीक़ उस दिन घर गया था और रोया था — मैंने दीवार के पीछे से सुना था। और फिर मैंने कभी उससे माफ़ी नहीं माँगी, क्योंकि मुझे लगा कि अगर मैं माफ़ी माँगूँगी तो सबको पता चल जाएगा कि मैंने ऐसी बात कही थी।"

मैंने एक गहरी साँस ली।

"तुम दोनों एक-दूसरे से एक हफ़्ते से बात नहीं कर रहे हो," मैंने कहा, "और पतंग पेड़ पर सूख रही है। सुनो, मेरे पास एक नियम है। कोई भी चीज़ मुफ़्त नहीं जुड़ती। तुम दोनों को अपनी मर्ज़ी से एक सच्ची बात कहनी पड़ेगी। सच्ची। सुना हुआ नहीं, रटा हुआ नहीं।"

रफ़ीक़ ने पहले बोला।

"सानिया," उसने कहा, "उस दिन मैंने हँसा था जब तेरी पतंग कटी थी। और मैंने इसलिए हँसा था क्योंकि मेरे सारे दोस्त देख रहे थे और मुझे अच्छा दोस्त लगना था। पर घर जाकर मैंने अपना चेहरा दीवार की तरफ़ रख लिया था। और मुझे तेरी आवाज़ पर गुस्सा आया था, तेरे पापा की बात पर नहीं। मैं तुझे माफ़ करना चाहता हूँ, क्योंकि मैं खुद भी अच्छा नहीं था।"

सानिया एक पल चुप रही। फिर उसने हाथ बढ़ाया और रफ़ीक़ की कलाई पकड़ ली।

"और मैं," उसने कहा, "उस बात के लिए माफ़ी माँगती हूँ। मैंने वो इसलिए कहा था क्योंकि मेरी पतंग कट गई थी और मुझे किसी पर चीखना था। और तू सबसे करीब था।"

"तो गलती मेरी थी," रफ़ीक़ ने कहा।

"नहीं, गलती मेरी थी," सानिया ने कहा।

"अरे, ये तो अच्छा है," चिंटू ने बीच में टपककर कहा, "हफ़्ते भर से दोनों की गलती किसी और की थी, अब अचानक दोनों की अपनी हो गई।"

मैं हँस पड़ा।

तभी जेब में घंटी बजी।

मेरी जेब में। मेरे हाथ में कुछ नहीं था।

"छोटा जोड़," आवाज़ आई। "दस अंक।"

और फिर, बहुत धीरे से, जैसे कोई हिसाब लिख रहा हो — "कुल एक सौ अड़सठ।"

मैं वहीं खड़ा रह गया।

पतंग अचानक हवा में घूमी, पूँछ ने पीपल की एक टहनी पकड़ी, और तभी टिंकू पेड़ पर चढ़ चुका था। दो मिनट में पतंग नीचे आई। सानिया ने उसे झटके से पकड़ा और रफ़ीक़ के हाथ में दिया। रफ़ीक़ ने भी उसे सानिया के हाथ में वापस दिया।

"आधी-आधी," सानिया ने कहा।

"आधी-आधी," रफ़ीक़ ने कहा।

बच्चे चीखे, शबनम आपा गुमटी से बाहर आई और बोली कि अब पतंग उड़ाने वाले चाय पीकर जाएँ, और मैं मेज़ के पीछे खड़ा रहा।

दस अंक।

दस अंक। जबकि मेरे सामने एक रजिस्टर था जिसका सिला हुआ पन्ना खुल चुका था, सलीम के पास घंटी की टूटी जीभ थी, आज रात बारह बजे अस्पताल की मुख्य सीढ़ी बंद होनी थी, दो दिन बाद सुबह सात बजे प्लॉट पर मशीन आनी थी, और रणवीर भारद्वाज के पास वो सफ़ेद चमकते जूते थे जिन्हें आज भी किसी ने धूल में नहीं देखा था।

दस अंक।

अंकों की सूची मुझे याद थी। टूटने से पहले की आवाज़ — दस अंक। यानी जितना आज मिला, उतने में सिर्फ़ इतना ही खरीदा जा सकता था कि कौन सी चीज़ टूटने वाली है। और मैं खुद जानता था कि क्या टूटने वाला है। सब कुछ।

टिंकू मेरे पास आया।

"उस्ताद, आप खुश नहीं हो?"

"हूँ।"

"नहीं लग रहा।"

मैंने उसका सिर थपथपाया।

"टिंकू, एक बात सीख ले," मैंने कहा। "जब तू साइकिल की चेन जोड़ता है, तो एक कड़ी जोड़ने से गाड़ी नहीं चलती। चेन में सौ कड़ियाँ होती हैं। और अगर बीच में दस कड़ियाँ टूटी हों, तो एक जोड़ने पर गाड़ी उलटी भी नहीं चलेगी, वो बस वहीं खट-खट करेगी।"

"आपको कितनी जोड़नी हैं?"

मैंने सामने गली को देखा। उस्ताद की दुकान का शटर आज आधा गिरा था। उनकी मशीन बंद थी। पीपल के नीचे मेरी टूटी मेज़ खड़ी थी और उस पर चार टूटी चीज़ें रखी थीं, जिनमें से एक भी अभी ठीक नहीं हुई थी।

"पता नहीं," मैंने कहा। "पर ज़्यादा हैं। और सबसे बड़ी कड़ी वो होगी जो घंटी की जीभ से जुड़ेगी।"

दिन ऐसे ही चढ़ता गया।

ग्यारह बजे भोला भाई आए। शटर आधा गिरा, पर उन्होंने अपना रेडियो थाम रखा था — वही जो हमने सुबह सुना था। बोले, "अंकुश, इसे ठीक कर दे। पर मैं बता दूँ, ये टूटा नहीं है। मैंने खुद तोड़ दिया था उस दिन, जब साहब के आदमी ने कहा था कि दुकान अच्छी चल रही है तो गली में और लोग भी दुकान खोल लेंगे।" उन्होंने रेडियो मेज़ पर रखा और सिर झुका लिया। मैंने उनसे सच पूछा। उन्होंने बताया कि उन्होंने अपनी बीवी को एक बात कही थी — कि वो ठीक होने का बहाना बनाती है — और अगले दिन उन्होंने खुद वो रेडियो पटक दिया था, क्योंकि अपने आप को भी कोई क़सूर नहीं देना था। फिर दोनों ने एक-दूसरे से सच बोला। अंकुश कुछ नहीं बोला, बस रेडियो अपनी छोटी सी मेज़ पर उठा लिया।

"भोला भाई," मैंने कहा, "आज नहीं। ये आज नहीं जुड़ेगा।"

"क्यों?"

"क्योंकि आपने और भाभी ने माफ़ी माँग ली, पर सच्ची बात कहने से पहले आपने रेडियो तोड़ दिया था। मेरे हिसाब से ये पूरा नहीं है। जब आप भाभी के सामने कहेंगे कि आपने उनकी बात से नहीं, अपनी मजबूरी से तोड़ा था — तब ले आइएगा।"

भोला भाई ने मुझे देखा। फिर हँसे। "तेरे पास शब्द बहुत हैं, अंकुश।"

"दुकान में औज़ार कम हैं, इसलिए शब्दों से काम चला रहा हूँ।"

वो हँसते हुए गए।

दोपहर में और लोग आए। एक बूढ़ा नल की टूटी रिंग लेकर आया। एक औरत साड़ी का टूटा हुक लेकर आई और करीब आधे घंटे तक अपनी बहू की शिकायत करती रही, और जब मैंने कहा कि माफ़ी के बिना हुक नहीं जुड़ेगा, तो वो उठकर चली गई और कह गई, "तेरे पास जादू नहीं है, तू तो बस बातें करता है।"

मैंने उसके पीछे हाथ हिलाया। "आपा, ठीक कह रही हैं। पहली बार ठीक कह रही हैं।"

टिंकू दिन भर मेज़ के पास बैठा रहा और हर आने-जाने वाले को देखता रहा। एक बार वो बोला, "उस्ताद, ये केंद्र आगे बढ़ेगा तो क्या हम इसे दुकान से बड़ा नहीं बना सकते?"

"क्यों?"

"क्योंकि लोग दुकान से डरते हैं, पर केंद्र से नहीं। दुकान में हिसाब होता है। केंद्र में बात।"

माँ दोपहर में रोटी लेकर आईं। प्लेट मेज़ पर रखी, फिर बोर्ड पढ़ा। कुछ देर खड़ी रहीं।

"जोड़ केंद्र?" उन्होंने कहा।

"हाँ, माँ।"

"जोड़ने की चीज़ें तो घर से शुरू होनी चाहिए थीं।"

"माँ—"

"मैं कुछ नहीं कह रही," उन्होंने कहा। "बस आज रात सीढ़ी पर तू खड़ा होगा, और मैं कुर्सी पर। मेरे पास भी एक टूटी चीज़ है।"

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