The Mysterious Bell – Chapter 407
मैं घर लौटा तो रात के ग्यारह बज चुके थे। चूल्हे के पीछे वाला दरवाज़ा अब भी खुला था — मैंने जान-बूझकर बंद नहीं किया। उसके पीछे का कमरा अंधेरे में साँस ले रहा था, जैसे बंद कमरे को भी पता हो कि आज उसकी बारी है।
पापा उसी दरवाज़े के सामने, दीवार से टिककर, फ़र्श पर बैठ गए। हाथ में एक पुराना पेचकस। बोले कुछ नहीं।
काजल ने दो चादरें लाकर हम तीनों के ऊपर डाल दीं।
"जागना है क्या पूरी रात?" काजल ने पूछा।
"पता नहीं," मैंने कहा। "जो सोया है वो जागेगा, तो हमें भी जागना पड़ेगा।"
"अंकुश," माँ ने कहा, "तू जा के सो जा। सुबह दुकान खोलनी है।"
"माँ, दुकान आज नहीं खुलेगी।"
"क्यों?"
"क्योंकि आज मैं वो चीज़ खोलूँगा जो दस साल से बंद है।"
माँ कुछ नहीं बोलीं। उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा और चली गईं।
रात का पहला पहर ऐसे ही गुज़रा। पीपल की पत्तियों की आवाज़, किसी दूर के टीवी की धुन, और हमारी गली के बिना मालिक कुत्ते की एक लंबी आवाज़, जो रात में कभी-कभी ऐसे सुनाई देती है जैसे कोई बूढ़ा नाम लेकर पुकार रहा हो।
दो बजे मैं उठा। दरवाज़ा वैसे ही खुला था। अंदर अंधेरा, देखो तो सिर्फ़ एक पुराना संदूक और दीवार पर टँगी टूटे काँच वाली तस्वीर।
मैंने घंटी जेब से निकाली। हल्की-सी घुमाई। घंटी ने कुछ नहीं कहा।
"कुछ तो बोल," मैंने धीरे से कहा।
और तब आवाज़ आई, बहुत छोटी, जैसे किसी ने नींद में करवट ली हो।
"अभी नहीं। सो जा। सुबह काम है।"
"क्या काम?"
"जोड़ने का। और यह काम तेरे हिसाब से बड़ा है।"
मैं हँसा। "मेरे हिसाब से? भाई, मैं तो पंचर भी सोच-समझकर लगाता हूँ।"
घंटी चुप हो गई।
तीन बजे कुछ गिरा। मैं उछलकर उठा। पापा पहले से खड़े थे, पेचकस हाथ में। हम दोनों अंधेरे कमरे में झाँका — बिल्ली थी। संदूक के ऊपर से कटोरा गिरा था। मिट्टी का पुराना कटोरा, दो टुकड़ों में।
पापा ने कटोरे के दोनों टुकड़े उठाए और एक-दूसरे से मिलाकर देखा। बीच में एक पतली लकीर बच गई।
"पापा," मैंने धीरे से कहा, "अगर कल कोई आए और कहे कि उसका रिश्ता ऐसे ही बीच से टूटा है, तो मैं क्या कहूँ?"
पापा ने टुकड़े मेज़ पर रख दिए। बहुत देर तक मेरी तरफ़ देखा। फिर बोले, "कहना कि लकीर रहेगी। घाव रहेगा। पर पकड़ होगी। टूटे हुए से ज़्यादा मज़बूत पकड़।"
मैंने कटोरा मेज़ पर ही छोड़ दिया।
सुबह चार बजे माँ की चूल्हे की आवाज़ आई। पाँच बजे मुर्गे नहीं थे, पर गली के मुँह पर कोई टेम्पो अपनी रस्सी खींच रहा था। छह बजे मैंने देखा कि पापा दरवाज़े के सामने दीवार से टिककर सो गए हैं, गोद में भूरी फाइल, हाथ में पेचकस।
मैंने उनके हाथ से धीरे से पेचकस निकाला। वो जाग गए।
"दरवाज़ा बंद कर दे," पापा ने कहा। "अब इसे रोशनी में खोलेंगे।"
सुबह सात बजे मैंने शटर उठाया। शटर की आवाज़ आज कुछ अलग लगी — जैसे ज़ंजीर नहीं, किसी की नींद खुल रही हो।
टिंकू वहीं मिला। नीचे बैठकर, घुटने पर पट्टी बाँधता हुआ।
"उस्ताद," वो उठा, "आज शटर सात बजे? आपको क्या हुआ?"
"आज कुछ बनाना है।"
"क्या?"
मैंने पीछे वाले कमरे से वो टूटी लकड़ी की मेज़ निकाली जिसकी एक टाँग नाप में नहीं थी — दुकान के पीछे बरसों से पड़ी थी। बच्चों की टोली तभी पहुँच गई — सानिया हाथ में रोटी लिए, गुड्डू मुँह में ब्रश दबाए, रफ़ीक़ और चिंटू आधी नींद में।
"ये मेज़ पीपल के नीचे ले चलो," मैंने कहा।
"उस्ताद, पीपल के नीचे तो बुज़ुर्गों की चबूतरी है," सानिया ने कहा।
"चबूतरी के सामने। रास्ता नहीं रोकेगी।"
चारों ने मेज़ उठाई। गुड्डू ने शिकायत की कि पैर में चोट लग रही है, चिंटू ने कहा कि तू तो खाली हाथ चल रहा है। रफ़ीक़ ने बीच में टाँग पकड़ी और बाकी तीनों ने उसे डाँटा कि वो टाँग सबसे कमज़ोर है। मज़े की बात — मेज़ गिरी नहीं। मैंने पहली बार देखा कि चार बच्चों में भी एक तरह का जोड़ होता है।
मेज़ पीपल के सामने रखी गई।
फिर मैंने पीछे वाले कमरे से कपड़े में लिपटा वो बोर्ड उठाया जो मैंने रात भर में बनाया था। पिछले हफ़्ते लाइसेंस बोर्ड के लिए जो सफ़ेद पेंट बचा था, वही इस्तेमाल हुआ था।
टिंकू ने कपड़ा खींचा।
बोर्ड पर उलटे-सीधे, बड़े अक्षरों में लिखा था —
जोड़ केंद्र
टूटी चीज़ लाओ, टूटा रिश्ता साथ लाओ
टिंकू ने उसे पढ़ा, फिर मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चमक थी जो बच्चों की आँखों में तब आती है जब उन्हें पता चलता है कि बड़ों ने भी उनके जैसा कोई खेल शुरू किया है।
"उस्ताद," उसने कहा, "ये सच में खुलेगा?"
"शटर खुला है।"
"मतलब कोई भी आ सकता है?"
"कोई भी।"
"और अगर कोई टूटी चीज़ लेकर न आए?"
"तो टूटा रिश्ता लेकर आए। कोई तो टूटा ही होगा। गली में हर घर में एक टूटी चीज़ है — या तो रेडियो, या घड़ी, या आदमी।"
टिंकू हँसा।
दस मिनट नहीं हुए थे कि बच्चे दौड़कर लौटे। सानिया के हाथ में एक टूटी गुड़िया — सिर के बाल पीछे के हिस्से से गायब, एक हाथ नदारद। गुड्डू ने एक घड़ी लाई जिसमें न काँटे थे न काँच, बस पट्टा बचा था। रफ़ीक़ ने टूटा हुआ रेडियो लाया और गर्व से कहा, "ये हमारे घर में सबसे पुरानी चीज़ है, इसे दादा जी चलाते थे।" चिंटू ने एक पुरानी तांबे की केतली के टूटे हुए ढक्कन वाला टुकड़ा लाकर रख दिया और बोला, "ये ठीक हो गया तो हमारी अम्मी वो केतली फेंकने से बचा लेंगी।"
मैंने चारों की तरफ़ देखा।
"सुनो," मैंने कहा, "मैं इन्हें ठीक करूँगा। पर एक बात साफ़ रहे — मैं सिर्फ़ तभी ठीक कर सकता हूँ जब तुम लोग बताओ कि ये किस चीज़ से टूटी हैं। कोई रिश्ता बताओ। कोई सच बताओ। वरना ये चीज़ें जुड़ेंगी नहीं।"
चारों एक-दूसरे को देखने लगे।
तभी शबनम आपा आई। एक हाथ में चाय की केतली, दूसरे में समोसों की प्लेट, और कमर में पल्लू खोंसा हुआ।
"मैंने सुन लिया," उसने कहा और प्लेट मेज़ पर रख दी। "तू यहाँ जोड़ स्कूल खोल रहा है तो एक बात पहले तय कर ले।"
"क्या?"
"जो मरम्मत करवाने आए, वो मेरी गुमटी से होकर जाएगा। चाय पिएगा, समोसा खाएगा, पैसे देगा। मैं मुफ़्त की चाय नहीं दूँगी। इसमें कोई शर्म नहीं है।"
"आपा, मैंने तो कहा भी नहीं—"
"कहने की ज़रूरत नहीं। मैं पंद्रह साल से गुमटी चला रही हूँ, मुझे पता है कि भीड़ कहाँ खड़ी होती है और पैसा कहाँ गिरता है। भीड़ तेरे पास होगी, पैसा मेरे पास। दोनों खुश।"
मैं हँस पड़ा।
टिंकू ने धीरे से कहा, "आपा, आप इतनी तेज़ कैसे बोलती हैं?"
"बेटा, जब पंद्रह साल तक कोई तेरी बात न सुने, तो तेरी ज़ुबान तेज़ हो जाती है। अब कुछ कहने की ज़रूरत नहीं रहती, बस कह देती है।"
वो चली गई। मैंने देखा कि उसने रफ़ीक़ के हाथ में एक समोसा दबा दिया था, बिना पूछे।
नौ बजे तक केंद्र पर सिर्फ़ बच्चों की भीड़ थी और मेज़ पर चार टूटी चीज़ें, जो अभी ठीक नहीं हुई थीं, क्योंकि किसी ने भी सच नहीं खोला था।
फिर सानिया और रफ़ीक़ की लड़ाई सामने आई।
सच कहूँ तो लड़ाई नहीं थी, एक चुप्पी थी। एक हफ़्ते से दोनों एक-दूसरे से नहीं बोल रहे थे। सानिया पीपल के उस तरफ़ खड़ी होती, रफ़ीक़ इस तरफ़। चिंटू बीच में फँसा रहता — उसकी बहन से बात करे या दोस्त से।
वजह पतंग थी।
पीपल के ऊपर, तीसरी डाल और छतरी के बीच, एक पतंग फँसी थी। सफ़ेद काग़ज़ की, अख़बार से बनी हुई, पूँछ में नीले रंग के कपड़े के टुकड़े। एक हफ़्ते से वहीं अटकी थी। हवा में हिलती थी, कभी फड़फड़ाती, जैसे अपने आप को छुड़ाने की कोशिश कर रही हो।
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