The Mysterious Bell – Chapter 409
"क्या?"
"बाईस साल की चुप्पी। और उसका ताला मेरे ही हाथ में था।"-फिर उन्होंने प्लेट आगे सरका दी और कहा, "इसे गरम खा। ठंडा खाया तो मैं बोलूँगी नहीं।"
शाम पाँच बजे शबनम आपा ने तीन बार केतली भरी। बच्चे मेज़ के इर्द-गिर्द बैठे थे और टिंकू एक-एक टूटी चीज़ उठाकर गिन रहा था — गुड़िया का सिर, घड़ी का पट्टा, रेडियो की जाली, केतली का ढक्कन। सात चीज़ें। और सात में से एक भी ठीक नहीं हुई थी।
"उस्ताद," टिंकू ने कहा, "आज सिर्फ़ एक पतंग जुड़ी।"
"और वो भी टूटी नहीं थी, बस फँसी थी," मैंने कहा।
"तो अंक क्यों मिले?"
"क्योंकि रिश्ता टूटा था, चीज़ नहीं।"
टिंकू ने सिर हिलाया, जैसे उसने कुछ समझ लिया हो और कुछ नहीं भी।
सूरज पीपल की छतरी से नीचे उतर रहा था। गली में वो पीली रोशनी आ रही थी जो दिन में कभी नहीं आती और रात में कभी नहीं टिकती। उस्ताद की दुकान का शटर अब भी आधा गिरा था। अस्पताल के गेट के सामने किसी ने पीली पट्टी नहीं बदली थी, काग़ज़ वहीं चिपका था। मैंने मन में गिना — आज रात बारह बजे सीढ़ी बंद। सात घंटे बाकी।
और मैं यहाँ खड़ा था, एक टूटी मेज़ के पीछे, दो चाय की केतलियों के खाली होने का इंतज़ार करते हुए।
तभी सामने वाली गली से एक औरत आई।
कद मझोला। उम्र शायद चालीस के आसपास। सिर पर फीका हरा दुपट्टा, जिसके किनारे पीले पड़ गए थे। साड़ी धोती हुई, पर उतनी ही साफ़ जितनी साफ़ करके भी पुरानी दिखती है। पैर नंगे नहीं थे, पर चप्पल इतनी घिसी थी कि आवाज़ नहीं कर रही थी।
वो चुपचाप मेज़ के सामने आकर खड़ी हो गई।
उसके हाथ में एक पलड़ा था।
पीतल का। पुराने तराज़ू का एक पलड़ा, जिसका एक किनारा मुड़ा हुआ था और जिसमें से टाँग टूटकर लटक रही थी। ज़ंग लगी, पर पीतल अब भी वहाँ-वहाँ चमक रहा था जहाँ किसी के हाथ ने उसे बरसों छुआ था।
उसने पलड़ा मेज़ पर नहीं रखा। दोनों हाथों से सीने से लगाए रखा, जैसे कोई बच्चा हो।
"आपका नाम?" मैंने पूछा।
"बाद में," उसने कहा। आवाज़ सूखी थी, जैसे दिन भर किसी ने कुछ न पिया हो।
"ठीक है," मैंने कहा। "बैठिए।"
"नहीं।"
"तो खड़ी रहिए। पर एक बात पहले सुन लीजिए। यहाँ मरम्मत मुफ़्त नहीं है। किसी भी चीज़ को जोड़ने के लिए दो लोगों में सच्ची बात जुड़नी पड़ती है। झूठ बोलेंगी तो चीज़ वैसी ही रहेगी।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में डर नहीं था। थकान थी। वो थकान जो बहुत लंबी सफ़र के बाद आती है और जिसमें इंसान को यह भी याद नहीं रहता कि वो कहाँ जा रहा था।
"मुझे पता है," उसने कहा। "मैं इसलिए आई हूँ।"
और तभी मेरी जेब में घंटी धीरे-से हिली।
कोई अंक नहीं, कोई हिसाब नहीं। बस एक आवाज़, इतनी धीमी कि मुझे लगा कि शायद मैंने सुना नहीं, खुद से कहा हो।
"ये औरत झूठ बोलेगी। तोलकर सुनना।"
॥
"ये औरत झूठ बोलेगी। तोलकर सुनना।"
घंटी की आवाज़ जेब में घुल गई, जैसे चाय में गुड़ घुल जाता है। मैंने हाथ जेब पर रखा और सामने खड़ी औरत को देखा। वो पलड़ा सीने से चिपकाए खड़ी थी, जैसे कोई माँ अपने बच्चे को भीड़ में छिपाए खड़ी हो।
"नाम बताइए," मैंने फिर कहा। "बाद में नहीं, अभी। यहाँ नाम के बिना हिसाब नहीं खुलता।"
उसने पलड़े पर से नज़र हटाई। आवाज़ सूखी थी, पर शब्द साफ़।
"नसीमा बाई। गली के मुँह पर छोटी राशन की दुकान है। नसीमा राशन भंडार।"
"अच्छा," मैंने कहा। "वो दुकान जिसके बाहर दाल की बोरियाँ रखी रहती हैं और जिसके शटर पर पीली पट्टी चिपकी है?"
"हाँ। वही।"
"तो बैठिए।"
"नहीं।"
"क्यों?"
"क्योंकि मैं बैठने नहीं आई। मैं तराज़ू ठीक कराने आई हूँ।"
मैंने मेज़ पर रखी सात टूटी चीज़ों की तरफ़ देखा। सानिया की गुड़िया, गुड्डू की घड़ी, चिंटू का केतली का ढक्कन, भोला भाई का रेडियो, पतंग, एक बिना काँटे की घड़ी और अब ये पलड़ा। सात में से एक भी ठीक नहीं हुआ था। मेज़ के पीछे लगा सफ़ेद बोर्ड हवा में हिल रहा था, जिस पर मैंने खुद पेंट से लिखा था — टूटी चीज़ लाओ, टूटा रिश्ता साथ लाओ।
"दीदी," मैंने कहा, "तराज़ू ठीक हो जाएगा। पर पहले ये बताइए, आपकी तराज़ू में क्या टूटा है?"
"काँटा टेढ़ा हो गया है।"
"बस?"
"और क्या होगा?"
"पलड़ा?"
"ये दूसरा है। एक पलड़ा गिरकर टूट गया था। दूसरा मैंने संभालकर रखा है।"
मैंने हाथ बढ़ाया। उसने पलड़ा नहीं दिया। मैंने हाथ वापस नहीं खींचा, हवा में ही रखा। उसने मेरी आँखों में देखा, फिर धीरे से पलड़ा मेरी हथेली पर रख दिया। पीतल ठंडा था। किनारा मुड़ा हुआ था, टाँग टूटकर लटक रही थी, पर जहाँ-जहाँ किसी के हाथ ने उसे बरसों छुआ था, वहाँ पीतल अब भी चमक रहा था।
"ये तो आधे घंटे का काम है," मैंने कहा। "टाँग जोड़ दूँगा, किनारा सीधा कर दूँगा। पर दीदी, ये पलड़ा अकेला नहीं टूटा। तराज़ू का काँटा टेढ़ा है, मैंने दुकान से देखा है। वो भी ठीक हो जाएगा। असली सवाल ये है कि आपकी तराज़ू से सामान तोलना कब बंद हुआ?"
उसने नज़र नीचे कर ली।
"जब से लोग कहने लगे कि मैं कम तोलती हूँ।"
"कब से?"
"तीन हफ़्ते से।"
"और आपने तोलना बंद कर दिया?"
"मैंने नहीं, लोगों ने आना बंद कर दिया।"
मैंने पलड़ा मेज़ पर रखा और उसके सामने वाली खाली कुर्सी की तरफ़ इशारा किया।
"दीदी, एक बात सुन लीजिए। यहाँ मरम्मत मुफ़्त नहीं है। मैं लोहा जोड़ सकता हूँ, पर उसके लिए दो इंसानों के बीच एक सच्ची बात जुड़नी पड़ती है। झूठ बोला, तो चीज़ वैसी ही रहेगी।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में डर नहीं था। थकान थी। वो थकान जो लंबे सफ़र के बाद आती है, जिसमें इंसान को याद भी नहीं रहता कि वो कहाँ जा रहा था।
"मुझे पता है," उसने कहा। "मैं इसलिए आई हूँ।"
"तो फिर बताइए, किसका रिश्ता टूटा है?"
"मैंने कहा न, तराज़ू टूटी है।"
"तराज़ू लोहा है, दीदी। लोहे से रिश्ता नहीं टूटता।"
वो कुछ नहीं बोली। बस पलड़े को फिर उठाकर सीने से लगा लिया।
तभी मेरी जेब में घंटी हिली। धीरे-से, जैसे कोई कान के पास आकर साँस छोड़े।
"यहाँ लोहा नहीं टूटा। तोलने वाला टूटा है।"
मैंने होंठ कसे। टिंकू मेरी तरफ़ देख रहा था। उसने पूछा, "उस्ताद, क्या हुआ?"
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "दीदी, आपकी दुकान चलिए। मुझे तराज़ू देखना है।"
"अभी?"
"अभी। सूरज डूबने से पहले।"
उसने एक पल सोचा, फिर सिर हिलाया। "दुकान पर मेरा बेटा है। साजिद।"
"तो बेहतर है," मैंने कहा। "दो लोग होंगे तो जुड़ाई जल्दी होगी।"
उसने कुछ ऐसा देखा जैसे मैंने कोई गलत बात कह दी हो।
"साजिद से उम्मीद मत रखिए," वो बोली। "वो अब दुकान में मन ही नहीं लगाता।"
चलते वक़्त मैंने टिंकू को टूलबॉक्स उठाने को कहा। सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू भी पीछे लग गए। सानिया ने कहा, "उस्ताद, हम भी चलें?"
"तुम लोग यहाँ रुको," मैंने कहा।
"पर हमें भी देखना है," चिंटू ने कहा।
"देखना है तो खिड़की से देखना।"
"आप हमें बाहर रखेंगे, और अंदर कुछ बड़ा हो जाएगा," सानिया ने कहा।
मैंने उसकी तरफ़ देखा। "तुम लोगों ने आज पहले ही एक पतंग जोड़ी है। बाकी काम बड़ों का है।"
"पतंग तो हमने जोड़ी थी," रफ़ीक़ ने कहा, और सानिया ने उसे कोहनी मारी।
गुमटी के पास पहुँचे तो शबनम आपा ने हमें रोक लिया।
"कहाँ?"
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