The Mysterious Bell – Chapter 402
"ये रेशमी धागा है," उन्होंने कहा। "शायद किसी पुराने सफ़ेद कपड़े में बचा हुआ। पुराना है। बहुत पुराना। इतना पुराना कि इसकी चमक खत्म हो चुकी है।"
"किसी के कफ़न का धागा," शबनम आपा ने कहा। उसकी आवाज़ धीमी थी और उसमें कोई कड़वी सी बात भी।
किसी ने कुछ नहीं कहा। पर उस शब्द ने हवा में एक अजीब सा ठहराव डाल दिया।
"मुझे मशीन पर देखना है," उस्ताद ने कहा। "मेरे घर चलो। मेरी दुकान चलो। मेरी मशीन। अगर उस मशीन पर ये पन्ना सिला गया है, तो वहाँ कुछ न कुछ ज़रूर बचा होगा। कोई निशान। कोई धागा। कोई सुई।"
मैंने रज़ा सलीम की तरफ़ देखा। वो अभी भी वहीं खड़ा था, हाथ झुके हुए, आँखें नीची।
"तू चल रहा है?" मैंने पूछा।
"मैंने ये रजिस्टर पहुँचा दिया," उसने कहा। "मैं अपने काम पर जा रहा हूँ।"
"तेरे पास अभी भी सवाल हैं," मैंने कहा। "और तू उन्हें कहीं और ले जा रहा है?"
"मेरे पास कोई सवाल नहीं है," रज़ा सलीम ने कहा। "मैंने अपना काम कर दिया।"
"झूठ," मैंने कहा।
मैंने बहुत तेज़ कहा। मैंने बिना सोचे कहा। पर कहते ही मुझे पता चल गया कि मैं सही कह रहा हूँ।
रज़ा सलीम ने सिर उठाया।
"मेरे पास सवाल हैं," उसने कहा, और उसकी आवाज़ अब पहले से काँप रही थी, इस बार साफ़ काँप रही थी। "ढेर सारे सवाल। पर उनका जवाब आपके पास नहीं है।"
"तो किसके पास है?"
"मुझे नहीं पता," उसने कहा। "वरना मैं बहुत पहले पूछ लेता।"
वो मुड़ा और चला गया।
मैंने उसे जाने दिया। मैंने सोचा, आज वो जा रहा है, कल वो आएगा। या परसों। जो आदमी सवाल लेकर चलता है, वो लौटता ज़रूर है।
मैंने रजिस्टर उठाया।
"उस्ताद," मैंने कहा। "आपकी दुकान चलते हैं।"
उस्ताद ने सिर हिलाया।
"मीरा," मैंने कहा, "कैमरा साथ ले। पर अंदर जाने से पहले एक बात सुन ले। जो चीज़ अंदर मिलेगी, वो सिर्फ़ आपकी होगी, आपके कैमरे की, आपके चैनल की। पर उसे बाहर निकालने से पहले मुझसे एक बात पूछ लेना।"
"कौन सी बात?"
"कि उसे बाहर निकालने से किसी का नुक़सान तो नहीं होगा।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने कैमरा बंद किया। फिर उसे अपने बैग में रखा।
"ठीक है," उसने कहा।
"अच्छा," माँ ने कहा। "तो चलो। उस्ताद, आप आगे। अंकुश, तू उस्ताद के पीछे। मैं कुर्सी पर पीछे आ रही हूँ। काजल, तू मेरे साथ। फ़ालतू कोई नहीं आएगा।"
"मैं क्यों नहीं आऊँगी?" शबनम आपा ने कहा। "मुझे देखना है।"
"आप आइए," माँ ने कहा। "आपको मैं नहीं रोकूँगी। आपकी गुमटी की मेज़ अब भी मेरी याद है।"
शबनम आपा हँसी। उस हँसी में बहुत सी पुरानी बातें थीं।
हम उस्ताद की दुकान की तरफ़ चले। दुबे अंकल अपनी कुर्सी पर बैठे रहे। उन्होंने कहा, "मैं यहीं रहूँगा। जब लौटो, यहीं से गुज़रना। मुझे भी जानना है।"
हम चले। टिंकू पीछे-पीछे आ रहा था। मैंने मुड़कर देखा। सानिया, गुड्डू, चिंटू, रफ़ीक़ — सब पीछे थे। मैंने उन्हें रोका नहीं। कुछ चीज़ें बच्चों के सामने ही होनी चाहिए, ताकि वो बड़े होकर उन्हें सही तरीक़े से याद रख सकें।
उस्ताद की दुकान पीपल के पूरब वाली गली में थी। दरवाज़ा खुला था। अंदर अंधेरा था। उस्ताद गए, और उन्होंने अंदर का बल्ब जलाया।
पीली रोशनी में सिलाई मशीन सामने खड़ी थी।
वो वैसी ही थी जैसी मैंने पहले देखी थी। पुरानी, मज़बूत, काली लोहे की, सिलेंडर के आकार की। उसके नीचे धूल थी। पर आज उस पर एक अलग सी चमक थी — जैसे उसे किसी ने कल ही छुआ हो।
उस्ताद उसकी तरफ़ बढ़े।
उन्होंने अपना हाथ मशीन पर रखा। फिर उन्होंने वो धातु वाला छोटा ढक्कन उठाया जिसके नीचे सुई लगती है और धागा रखा जाता है। उन्होंने ढक्कन उठाया, और उनकी उँगलियाँ अंदर गईं।
एक पल।
दो पल।
वो रुके।
फिर उन्होंने अपना हाथ बाहर निकाला।
उनकी उँगलियों में एक छोटा सा काग़ज़ का टुकड़ा था — पीला, मुड़ा हुआ, किनारे से फटा हुआ।
उन्होंने उसे खोला।
उस पर कुछ लिखा था। उन्होंने उसे रोशनी की तरफ़ किया।
मीरा ने बिना कहे अपना कैमरा फिर से निकाला। पर इस बार उसने उसे चालू नहीं किया, बस हाथ में पकड़े रखा।
"क्या है, उस्ताद?" मैंने पूछा।
उन्होंने कुछ नहीं कहा। उन्होंने वो काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
मैंने उसे पकड़ा।
उस पर दो लाइनें थीं, छोटी-छोटी, झुकी हुई लिखाई में। पहली लाइन के ऊपर के कोने में एक छोटा सा निशान था, जो जैसे किसी अंगूठे के आधे हिस्से का हो।
पहली लाइन पढ़ी — "पन्ना काटो, पर नाम मिटे नहीं।"
दूसरी लाइन — "मशीन पर सिलो, पर हाथ मेरा मत दिखाओ।"
मैंने काग़ज़ पढ़कर उस्ताद की तरफ़ देखा।
वो सिलाई मशीन के पास खड़े थे। उनका हाथ अब भी उस पर था।
"उस्ताद," मैंने धीरे से कहा। "ये लिखाई किसकी है?"
उस्ताद ने बहुत देर तक कुछ नहीं कहा।
फिर उन्होंने अपना हाथ मशीन से हटाया। उन्होंने अपना चश्मा फिर पहना। और वो मेरी तरफ़ मुड़े, और उनकी आँखों में वो सामान था जो मैंने आज तक उनकी आँखों में नहीं देखा था — कुछ हद तक डर, कुछ हद तक शर्म, कुछ हद तक वो चीज़ जो सिर्फ़ उस आदमी की आँखों में होती है, जिसने बहुत साल पहले कोई ऐसी गलती की हो जिसे वो भूल न सका हो।
"ये लिखाई," उन्होंने कहा, "मेरे भाई की है।"
मैंने साँस रोक ली।
"इलियास की?"
उस्ताद ने सिर हिलाया।
"पर…"
"हाँ," उस्ताद ने कहा। "इलियास ने ये पन्ना काटा। इलियास ने सिला। और इलियास ने ये काग़ज़ मेरी मशीन के अंदर छिपाया।"
"पर क्यों? क्यों छिपाया?"
उस्ताद कुछ देर खामोश रहे। फिर उन्होंने सिलाई मशीन की तरफ़ देखा, जैसे वो उनसे कुछ कह रही हो।
"क्योंकि," उन्होंने कहा, "वो चाहता था कि जिस दिन कोई इस मशीन को खोले, उसे सच मिले। पर उसने ये भी सोचा कि उस दिन तक मैं ज़िंदा रहूँ, तो मैं खुद सच बताऊँ।"
मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली।
वो पहले से ठंडी हो चुकी थी।
मैंने उसे हथेली में रखा और धीरे से बजाया।
घंटी ने कहा —
"अब तू वो जगह पहुँच गया है जहाँ से आगे सिर्फ़ आदमी जा सकता है, हथियार नहीं।"
मैंने घंटी को जेब में रखा। मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
"उस्ताद," मैंने कहा, "आपने अभी पीपल के नीचे कहा था कि ये सिलाई आपकी मशीन की है पर आपके हाथ की नहीं। पर आपने ये नहीं बताया कि ये आपके भाई के हाथ की है।"
उस्ताद ने मेरी आँखों में देखा।
"मैंने कहा था न," उन्होंने कहा, "मैं खुद अपने पर शक़ कर रहा हूँ। अब करना बंद कर दिया।"
"और अब?"
"अब मुझे इलियास के पास जाना है," उस्ताद ने कहा। "उससे सीधे पूछना है कि उसने ये क्यों किया। और फिर जो जवाब मिले, उसे लेकर मुझे अस्पताल जाना है।"
"अस्पताल क्यों?"
"क्योंकि सलीम के पास घंटी की जीभ है," उस्ताद ने कहा। "अगर जीभ सलीम के पास है, तो इसका मतलब है कि एक वक़्त ऐसा था जब इलियास और सलीम ने साथ कुछ किया। और वो कुछ ऐसा था जिसके बारे में मुझे आज तक कुछ नहीं पता।"
मैंने काग़ज़ को अपनी जेब में रखा।
"तो चलिए," मैंने कहा। "पहले इलियास। फिर अस्पताल।"
उस्ताद ने अपनी दुकान का दरवाज़ा बंद किया। उन्होंने ताला लगाया। फिर वो मेरी तरफ़ मुड़े।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "एक बात याद रखना। जब हम इलियास के पास पहुँचें, तो तू मेरे बगल में रहना। मेरे आगे नहीं, मेरे पीछे नहीं। मेरे बगल में।"
"क्यों?"
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