The Mysterious Bell – Chapter 401
खून मेरे सिर की तरफ़ दौड़ गया।
मैंने रज़ा सलीम का गिरेबान पकड़ लिया।
"ये क्या है?" मैंने कहा। मेरी आवाज़ मेरी नहीं लग रही थी। "ये क्या है, रज़ा सलीम? तुम क्या लाए हो मेरे पास? असली रजिस्टर लाने को कहा था। और तुम ये लाए हो? ये क्या है?"
"अंकुश!" उस्ताद की आवाज़। सख़्त।
मेरा हाथ ढीला नहीं हुआ। मेरा हाथ और कसने लगा।
"ये रजिस्टर सलीम अहमद के हाथ का है," मैंने कहा। "वो बोल रहा था कि आज सच खुलेगा। और तुमने ये लाकर रख दिया है? तुम सब मिले हुए हो? सब एक ही खेल है?"
"अंकुश!" माँ की आवाज़। कड़क।
मैंने उनकी तरफ़ नहीं देखा। मैंने रज़ा सलीम का गिरेबान पकड़े ही रखा। उसने कोई कोशिश नहीं की छुड़ाने की। वो बस वैसे ही खड़ा रहा, मेरे हाथ में, खुली गर्दन, नीची नज़र।
"छोड़ उसे," उस्ताद ने कहा। उनकी आवाज़ शांत थी, पर उसमें वो चीज़ थी जो पहली बार सुनाई दी — जैसे कोई हुक्म। "बेटा, छोड़। वो इसका आदमी नहीं है। वो बस पहुँचाने वाला है।"
मैंने अपने हाथ हैरानी से देखे। वो काँप रहे थे। उस पल मुझे समझ नहीं आया कि मैंने क्या किया। मैंने रज़ा सलीम को छोड़ा।
उसने अपनी गर्दन सहलाई, फिर खाँसा, फिर अपने कपड़े ठीक किए। उसने कुछ नहीं कहा। कोई शिकायत नहीं। बस खड़ा रहा, और उसकी आँखों में वो सामान था जिसे मैं पहचान नहीं पाया — डर नहीं, शर्म नहीं — कुछ और।
उस्ताद ने वो पन्ना गौर से देखा।
उन्होंने झुका हुआ चश्मा पहना, फिर हटाया, फिर फिर पहना। फिर उन्होंने चश्मा उतारकर अलग रख दिया और बिना चश्मे के वो पन्ना देखने लगे, जैसे बिना चश्मे के वो उसे और अच्छे से देख पा रहे हों।
उन्होंने उँगली सिलाई पर फेर दी।
धीरे। बहुत धीरे। जैसे घाव पर नहीं, दर्द पर।
मैंने अपनी आँखें उनके चेहरे से नहीं हटाईं।
वो कुछ नहीं बोले। बहुत देर तक कुछ नहीं बोले।
दुबे अंकल ने अपनी कुर्सी पर थोड़ा सा हिलकर अपना वज़न बदला। शबनम आपा ने अपनी पीतल की थाली को थोड़ा सा और आगे खिसका दिया। मीरा के कैमरे की लाल बत्ती बिना रुक जल रही थी।
"उस्ताद जी," माँ ने धीरे से कहा। "कुछ बोलिए।"
उस्ताद ने अपनी उँगली सिलाई से हटाई।
"ये सिलाई मेरे हाथ की नहीं है," उन्होंने कहा।
फिर वो सीधे खड़े हुए। उन्होंने रजिस्टर उठाया, उसे रोशनी की तरफ़ किया — यानी डगमगाती सुबह की रोशनी की तरफ़, जो पीपल की पत्तियों से छनकर आ रही थी।
"पर ये सिलाई," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ काँपी, "मेरी मशीन की है।"
मैं खड़ा था और मुझे लगा जैसे ज़मीन मेरे पैरों के नीचे कुछ सेंटीमीटर धँस गई हो।
"क्या मतलब है, उस्ताद?" मैंने पूछा।
"मतलब ये है कि सिलाई किसी और ने की, पर उसने उस मशीन पर की जो मेरी है," उस्ताद ने कहा। "मेरी सिलाई मशीन पर। मेरी दुकान में। मेरी मर्ज़ी के बिना या… या शायद मेरी मर्ज़ी से?"
आख़िरी शब्द उन्होंने ऐसे कहा जैसे ख़ुद से पूछ रहे हों।
"उस्ताद," माँ ने कहा, "आप पर शक़ नहीं कर रहा कोई।"
"मैं कर रहा हूँ, बहू," उस्ताद ने कहा। उन्होंने गर्दन उठाई और सीधे माँ की आँखों में देखा। "मैं ख़ुद अपने पर शक़ कर रहा हूँ। पचास साल से ये सिलाई मेरे सामने थी, इस रजिस्टर में, इस शहर में। और मुझे पता नहीं था?"
"आपको कैसे पता होता?" रज़ा सलीम ने कहा। उसकी आवाज़ अब पहले से कुछ साफ़ थी। "ये रजिस्टर सलीम साहब के पास था। किसी और के पास नहीं।"
"तो सलीम के पास ये सिलाई देखने के बाद भी सवाल नहीं उठा?" उस्ताद ने पूछा। "उसने मुझसे कभी नहीं कहा?"
"वो मुझे नहीं बताते," रज़ा सलीम ने कहा। "मैं सिर्फ़ उनका मुंशी हूँ।"
मैंने अपने आप को सँभाला। मैंने फिर से उस पन्ने पर नज़र डाली। कटी हुई जगह। सिली हुई जगह। एक अलग पन्ना, जो शायद किसी और रजिस्टर से निकाला गया था, जिस पर किसी और का हिसाब लिखा होगा, और इसे यहाँ सीकर अंदर कर दिया गया।
"यहाँ दादा का नाम होना चाहिए था," मैंने कहा। "जगदीश यादव। सात अंगूठों वाली शर्त।"
"हाँ," उस्ताद ने कहा। "यहाँ। बिल्कुल यहाँ। मुझे याद है। जब ये रजिस्टर भरा जा रहा था, मैं इस मेज़ के पास ही खड़ा था। मैंने अपनी आँखों से देखा था ये नाम लिखते हुए।"
"तो अब क्या है यहाँ?" मीरा ने पूछा। उसने अपना कैमरा आगे किया।
"अब यहाँ किसी और का हिसाब है," उस्ताद ने कहा। "किसी और दुकान का। कोई और नाम।"
"किसका?" मैंने पूछा।
"पता नहीं," उस्ताद ने कहा। "ये नाम मैंने नहीं देखा। ये शायद बाद में जोड़ा गया।"
मैंने रज़ा सलीम की तरफ़ देखा।
"सलीम अहमद ने ये क्यों नहीं कहा?" मैंने पूछा। "वो जानता है? वो जानता है कि उसके रजिस्टर में पन्ना कटा हुआ है?"
"मुझे नहीं पता," रज़ा सलीम ने कहा। "मैंने आपको पहले ही बताया — मैं सिर्फ़ पहुँचाने वाला हूँ।"
"तुम्हारे हाथ क्यों काँप रहे हैं, रज़ा सलीम?" दुबे अंकल ने पूछा। उन्होंने पहली बार बोला था। उनकी आवाज़ शांत थी, पर उसमें वर्दी वाली जाँच थी।
रज़ा सलीम ने कुछ नहीं कहा।
"ये बंडल तुम लाए," दुबे अंकल ने कहा। "ये तुमने खोला? तुमने इसके अंदर देखा?"
"नहीं," रज़ा सलीम ने कहा। "मैंने बंद रखा। जैसे दिया था, वैसे ही लाया।"
"तो हाथ क्यों काँप रहे हैं?"
रज़ा सलीम ने अपने हाथ ऊपर उठाए। उन्हें देखा। फिर धीरे से नीचे किए।
"क्योंकि सलीम साहब ने ये देते वक़्त कहा था — ये इसे ले जाओ और जो सामने आए, उसी को दिखाओ। और मुझसे कहा कि मैं वहाँ नहीं रुकूँगा। मैं अंदर जाऊँगा, बंद दरवाज़ा खोलूँगा और भीतर बैठूँगा।"
"कहाँ?"
"मैं नहीं जानता," रज़ा सलीम ने कहा। "वो सिर्फ़ इतना कहे कि पाँच बजे तक कोई उनसे न मिले। अगर कोई मिलने आए तो बोल दूँ कि वो बैठक में हैं, मिल नहीं सकते। और मुझे ये भी कहा कि जब मैं वापस पहुँचूँ तो दरवाज़ा खटखटाऊँ, और अंदर से जवाब आए तभी अंदर जाऊँ।"
मैं चुप हो गया।
कुछ देर तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पीपल के पत्ते हल्की हवा में हिल रहे थे। दूर किसी ने रेडियो चालू किया होगा — कोई पुराना गाना आ रहा था, धीमी आवाज़ में। स्कूल के बच्चों की आवाज़ आ रही थी, जो हर सुबह की तरह आती थी।
मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली।
वो पहले से गरम नहीं थी, पर बाहर आते ही फिर गरम हो गई।
"बोल," मैंने धीरे से कहा। "कुछ तो बता। कटा हुआ पन्ना कहाँ है?"
घंटी बजी।
एक बार। फिर एक बार। जैसे कोई बहुत धीरे, बहुत अंदर से हमारी तरफ़ आ रहा हो।
"जो काटा जाता है," घंटी ने कहा, "वो फेंका नहीं जाता।"
मैंने इंतज़ार किया।
"क्योंकि फेंकी हुई चीज़ कोई उठा सकता है।"
मैंने फिर इंतज़ार किया।
"छुपाई हुई चीज़ को कोई ढूँढ नहीं सकता।"
घंटी बंद हो गई।
मैंने घंटी को जेब में रखा और आगे बढ़कर रजिस्टर को फिर से देखा। सिलाई। किनारे। टाँके। और उस सिलाई के ऊपर नीचे, कहीं कोई निशान?
मैंने उँगली उन टाँकों पर फेरी। बड़े-छोटे टाँके। फर्क साफ़ था।
"उस्ताद," मैंने कहा। "अगर ये सिलाई आपकी मशीन की है, तो ये धागा किसका है? ये धागा आपकी दुकान का धागा है?"
उस्ताद कुछ पल चुप रहे। फिर वो झुके और उन्होंने भी अपनी उँगली सिलाई पर फेरी।
"ये धागा," उन्होंने कहा, "मेरी दुकान का नहीं है।"
"तो किसका है?"
उन्होंने धागे को उँगली और अँगूठे के बीच पकड़ा। हल्का खींचा। फिर गौर से देखा।
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