The Mysterious Bell – Chapter 403
"क्योंकि इलियास मुझसे झूठ नहीं बोलेगा," उस्ताद ने कहा। "पर तेरे सामने वो वो बात कहेगा जो उसने पचास साल किसी को नहीं कही।"
मैंने सिर हिलाया।
हम बाहर निकले।
पीपल के नीचे माँ कुर्सी पर बैठी थीं। काजल उनके पास खड़ी थी। शबनम आपा ने अपनी गुमटी से एक और घड़ा पानी का मँगाकर चबूतरी पर रख दिया था। दुबे अंकल अपनी कुर्सी पर सीधे बैठे थे।
मैंने उन सबको देखा और मुझे लगा जैसे पिछले तीन दिनों में मैंने एक नहीं, दस साल जिए हों।
"क्या मिला?" माँ ने पूछा।
"सच," मैंने कहा। "थोड़ा सा।"
"थोड़ा सा ही सही," माँ ने कहा। "हाथ में हो तो बहुत है।"
उस्ताद मेरी तरफ़ मुड़े।
"चल," उन्होंने कहा। "इलियास का घर पीपल के पूरब वाली गली में है।"
हम चले।
टिंकू पीछे-पीछे आया।
"टिंकू," मैंने कहा।
"हाँ उस्ताद?"
"तू और तेरे जासूस, सब गुमटी पर जाओ। शबनम आपा तुम्हें चाय देगी। और वहाँ से नज़र रखना — कौन आता है, कौन जाता है।"
"उस्ताद—"
"टिंकू," मैंने कहा। "ये काम सबसे ज़रूरी है। तुम्हें पता है क्यों?"
"क्यों?"
"क्योंकि आज सलीम अहमद अपने घर में बंद है," मैंने कहा। "और मुझे लगता है कि कल वो कहीं और बंद होगा। और अगर कल उसका दरवाज़ा खुले, तो मुझे पता होना चाहिए कि उसके पीछे कौन खड़ा था।"
"मैं नज़र रखूँगा," टिंकू ने कहा। उसकी आँखें चमक रही थीं।
वो भागा।
मैं और उस्ताद पीपल के पूरब वाली गली में घुसे। वो गली पतली थी, पत्थर की थी, और दोनों तरफ़ की दीवारें कुछ ज़्यादा ही पुरानी थीं। एक दरवाज़ा आधा खुला था, नीले रंग का, रंग उतरा हुआ।
उस्ताद ने उस दरवाज़े पर दस्तक दी।
कोई जवाब नहीं।
दूसरी दस्तक।
कोई जवाब नहीं।
तीसरी दस्तक — और इस बार दरवाज़ा पूरी तरह खुल गया।
इलियास अली बक्श दरवाज़े पर खड़े थे। सफ़ेद कुर्ता, सफ़ेद जूते, काली अंठी। वो वैसे ही थे जैसे सलीम बक्श थे — बस एक चीज़ का फर्क था। सलीम की आँखों में चोट थी, और इलियास की आँखों में थकान।
वो हमें देखकर नहीं चौंके।
"मुझे पता था," इलियास ने कहा। "आज तुम दोनों आओगे।"
उन्होंने दरवाज़ा और खोला।
"अंदर आओ," उन्होंने कहा। "बैठो। मैं चाय रखता हूँ।"
उस्ताद ने कुछ नहीं कहा।
वो सीधे अंदर घुसे।
इलियास ने दरवाज़ा बंद किया।
"अंकुश यादव," इलियास ने मेरी तरफ़ देखते हुए कहा, "तुम्हारी घंटी ने आज सुबह से मुझे बता दिया था कि तुम आने वाले हो।"
मैंने अपनी जेब की तरफ़ हाथ किया।
"आपको कैसे पता?" मैंने पूछा।
"क्योंकि मेरी मशीन ने भी बजना बंद कर दिया है," इलियास ने कहा। "और जब मेरी मशीन चुप होती है, तो समझ लो कोई पुरानी सिलाई खुलने वाली है।"
वो रसोई की तरफ़ चले।
उस्ताद उनके पीछे नहीं गए।
वो कमरे के बीच में खड़े रहे।
और फिर उन्होंने अपनी जेब से वो पीला काग़ज़ निकाला।
"इलियास," उस्ताद ने कहा, "ये क्या है?"
इलियास रुके।
वो मुड़े।
उन्होंने काग़ज़ देखा। उनकी आँखों में कुछ बदला।
"ये," उन्होंने कहा, "मेरा लिखा हुआ है।"
"हाँ," उस्ताद ने कहा। "मैं जानता हूँ।"
"तो फिर क्या पूछना?"
"मैं ये नहीं पूछ रहा कि ये किसने लिखा," उस्ताद ने कहा। "मैं ये पूछ रहा हूँ कि तूने ये क्यों लिखा?"
इलियास कुछ देर खड़े रहे।
फिर वो एक लकड़ी की कुर्सी की तरफ़ बढ़े और उस पर बैठ गए।
उनके हाथ उनके घुटनों पर थे। उनकी पीठ झुकी थी।
"बैठ जाओ तुम दोनों," उन्होंने कहा। "ये बात लंबी है। और शायद तुम इसे सुनकर खुश न हो।"
हम बैठे।
इलियास ने गला साफ़ किया।
"मैंने ये काग़ज़ इसलिए लिखा था," उन्होंने कहा, "क्योंकि जिस रात ये पन्ना कटा, मैं वहीं था। और मैंने पहला कातरा अपनी आँखों से देखा।"
इलियास ने अपने घुटनों पर रखे हाथों में एक को और कस लिया।
"और उस रात," उन्होंने कहा, "जिसने पन्ना काटने को कहा, वो मैं था नहीं।"
उस्ताद ने अपनी गर्दन उठाई।
"तो कौन था?" उन्होंने पूछा।
इलियास ने देखा उनकी आँखों में।
"तुम," इलियास ने कहा।
कमरे में हवा रुक गई।
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
वो सिलाई मशीन के पास बैठे थे और अचानक वो एक बहुत बूढ़े आदमी लगने लगे।
"मैं?" उस्ताद ने कहा। उनकी आवाज़ फटी हुई थी। "मैंने कब कहा?"
"तुमने उस रात खुद नहीं कहा," इलियास ने कहा। "पर तुमने उस रात से पहले ही ये बीज बो दिया था। तुमने कहा था — भाई, अगर ये घंटी और ये रजिस्टर हमारे पास रहे, तो हमें भी उसी रास्ते पर चलना पड़ेगा जिस पर हमारे बुज़ुर्ग चले। और उस रास्ते से हमारी माँ को क्या मिला? बस दर्द। माँ तो दवा की देर से चली गई।"
उस्ताद ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
"तूने वो पन्ना काटा," उन्होंने कहा।
"हाँ," इलियास ने कहा। "मैंने काटा। पर उस रात मेरा हाथ भी काँप रहा था। मैंने पहला कातरा गलत जगह लगाया। फिर दूसरा। फिर तीसरा। जब पन्ना कट गया, तो मैंने उसे सिलने की सोची। पर सिलाई का हाथ मेरा ठीक नहीं चल रहा था। तो मैंने जो किया…"
वो रुके।
उन्होंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
"…मैंने उसे उसी मशीन पर सिला जो तुम्हारी थी। क्योंकि मैं जानता था कि तुम्हारी मशीन की सिलाई पर कोई शक़ नहीं करेगा।"
कमरा खामोश हो गया।
उस्ताद ने अपने हाथ सिलाई मशीन से हटा लिए, जैसे उसने उन्हें छूकर जला दिया हो।
उन्होंने अपना चश्मा उतारा। उन्होंने अपनी आँखों को अपनी हथेली में छिपा लिया।
"मुझे पता था," उस्ताद ने धीरे से कहा।
इलियास ने उनकी तरफ़ देखा।
"क्या?"
"मुझे शक़ था," उस्ताद ने कहा। "बहुत साल पहले से। पर मैंने शक़ नहीं किया। क्योंकि मैं डरता था। क्योंकि अगर मैंने शक़ किया, तो मुझे तुझसे बात करनी पड़ती। और मैं तुझसे बात करने से डरता था।"
उन्होंने अपना हाथ आँखों से हटाया।
"बड़े भाई का सबसे बड़ा डर क्या होता है, पता है?" उन्होंने इलियास से कहा। "कि छोटा भाई एक दिन बड़ा होकर उससे सवाल करेगा। और वो सवाल का जवाब न दे पाए।"
इलियास ने कुछ नहीं कहा।
उनकी आँखें नम थीं।
"अब बड़ा हो गया," इलियास ने धीरे से कहा। "अब सवाल कर रहा हूँ। पर जवाब मुझे नहीं चाहिए। जवाब तुम्हें चाहिए।"
उस्ताद उठे। वो इलियास की तरफ़ बढ़े। उन्होंने अपना हाथ अपने भाई के कंधे पर रखा।
"अब आगे का सफ़र आसान नहीं है," उस्ताद ने कहा। "अब सलीम से मिलना है।"
इलियास ने सिर हिलाया।
"मैं जानता हूँ," उन्होंने कहा। "और मैं तैयार हूँ।"
"पर एक बात पहले," उस्ताद ने कहा। "तूने जो अंदर वो निशान देखा था — असली पन्ने पर। वो असली पन्ना आज कहाँ है?"
इलियास ने भी अपनी जेब से कुछ निकाला।
एक काग़ज़ की पुड़िया।
"यहाँ," उन्होंने कहा। "पचास साल मेरे सीने से चिपका रहा।"
उन्होंने पुड़िया खोली।
अंदर वो कटा हुआ पन्ना था — छोटा, मुड़ा हुआ, किनारे फटे हुए, पर नाम साफ़ पढ़ा जा सकता था।
आख़िरी नाम — जगदीश यादव।
और उसके नीचे एक लाइन — "हिस्सा बराबर। सातों मिलें तो शर्तनामा बोले। कोई अंगूठा झूठा हो तो चुप।"
मेरे हाथ फिर से ठंडे हो गए।
मैंने घंटी जेब से निकाली।
वो गरम थी।
"बोल," मैंने कहा।
घंटी ने कहा, "अब तेरे पास जगदीश यादव का नाम है। और कल तेरे पास सात अंगूठे भी होंगे। पर उनमें से तू जानता नहीं कौन सा अंगूठा झूठा है।"
"कैसे पता चलेगा?"
"जब वो अंगूठा बोलेगा," घंटी ने कहा। "अंगूठा चुप नहीं रह सकता, अंकुश। एक दिन बोलेगा।"
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