The Mysterious Bell – Chapter 396
"तो आज छू लीजिए," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो कड़क थी जो किसी को बहाना नहीं बनने देती। "एक बार छू लो, शंकर। बाईस साल का हिसाब एक ही रात में नहीं उतरता, पर शुरुआत तो कहीं से होगी।"
पापा ने चाबी ली। उन्होंने उसे कुंडे की तरफ़ बढ़ाया। चाबी का सिरा कुंडे के छेद पर रखा।
और फिर वो घुसी नहीं।
पापा ने हिलाया। घुमाया। ज़ोर लगाया। चाबी छेद पर टकराकर रह गई, जैसे कोई अजनबी दरवाज़े पर आकर खड़ा हो और अंदर वाला पहचानने से इनकार कर दे।
"नहीं जा रही," पापा ने कहा। उनकी आवाज़ में एक अजीब सी राहत थी, जो मुझे अच्छी नहीं लगी।
"तो ये इसकी नहीं है," काजल ने कहा।
"नहीं, ये इसकी है," माँ ने कहा। "पर ताला एक नहीं है।"
सबने उनकी तरफ़ देखा।
माँ ने अपनी साड़ी के कोने में हाथ डाला, फिर कमर से झुककर कुर्सी के साथ जुड़ी छोटी थैली से कुछ निकाला। मैंने देखा — उनके हाथ में एक और चाबी थी। इससे बड़ी, मोटी, और उस पर ज़ंग के धब्बे थे, जैसे किसी पुराने ज़माने के ताले की हो।
"मैंने ये बाईस साल संभाली है," माँ ने कहा। "आटे के डिब्बे में, नीचे, दालों के पीछे। हर बार जब आटा निकालती थी, उँगली उस पर लगती थी। और हर बार लगता था कि किसी दिन…"
वो पूरी बात नहीं कह पाईं।
"किसी दिन क्या, माँ?" काजल ने पूछा।
"किसी दिन इसकी ज़रूरत पड़ेगी," माँ ने कहा, और चाबी पापा की तरफ़ बढ़ा दी। "ले। और अब देर मत कर।"
पापा ने वो चाबी ली। इस बार उनका हाथ कम काँप रहा था। शायद इसलिए कि अब वो अकेले नहीं थे।
उन्होंने चाबी छेद में डाली।
और चाबी अंदर चली गई।
एक आवाज़ आई — धातु का धातु से टकराना, फिर कुंडे के अंदर किसी पुरानी स्प्रिंग का कराहना।
"घुमाओ," माँ ने कहा।
पापा ने घुमाया।
पहला घुमाव — कुछ नहीं हुआ।
दूसरा घुमाव — दरवाज़े के नीचे से धूल की एक पतली लकीर फ़र्श पर गिरी, जैसे किसी ने नींद में करवट ली हो।
तीसरा घुमाव —
क्लिक।
और फिर वो आवाज़, जो मैं ज़िंदगी भर नहीं भूलूँगा। दरवाज़ा खुला नहीं — पहले कराहा। लकड़ी फूली हुई थी, इसलिए वो ज़मीन से अलग होने के लिए ज़ोर लगा रही थी। पापा ने कंधा लगाया। टिंकू दौड़कर आया और उनके पीछे से धक्का दिया। तीन लोगों के ज़ोर से दरवाज़ा ज़मीन से उठा और फिर बड़ी मुश्किल से अंदर की तरफ़ घूमा।
और तभी धूल निकली।
इतनी धूल कि मुझे लगा कि बाईस साल की सारी साँस एक ही बार में बाहर आ गई। काजल खाँसने लगी। टिंकू ने मुँह कमीज़ में छिपा लिया। रफ़ीक़ और चिंटू पीछे हट गए। माँ ने आँखें बंद कर लीं पर हटीं नहीं।
धूल जब बैठी, तो अंदर से एक गंध आई।
बंद कमरे की गंध। पुरानी लकड़ी। कपूर। और कुछ ऐसा जो मैं पहचानता था पर नाम नहीं बता सकता था — जैसे किसी पुराने कपड़े में लिपटी हुई दुआ, जो बरसों से बोली नहीं गई।
मैंने लालटेन आगे की।
अंदर का कमरा छोटा था। छह फुट चौड़ा, शायद आठ फुट लंबा। एक तरफ़ दीवार पर छोटी खिड़की थी, जिसे अंदर से लकड़ी के पटिये से बंद किया गया था। फ़र्श पक्का था, पर सीलन से उस पर हरी परत जमी थी। कोने में मकड़ी का जाला इतना मोटा था कि उस पर धूल की परत जम गई थी, जैसे कोई सफ़ेद चादर टँगी हो।
और सामने, दीवार से सटा, एक पुराना संदूक रखा था।
लकड़ी का, ढक्कन पर पीतल की पट्टियाँ, और पट्टियों पर छोटे-छोटे फूल खुदे हुए। उस पर रस्सी बँधी थी, पर रस्सी उतनी ही पुरानी थी जितना संदूक — जगह-जगह से उधड़ी, रेशे बाहर निकले हुए।
"ये…" काजल ने धीरे से कहा, "ये तो हमारे घर में ही था।"
"हमारे घर के अंदर एक कमरा था जो हमने कभी नहीं देखा," मैंने कहा। "तो ये भी हमारा ही है।"
संदूक के बगल में, दीवार से टिकी, एक तस्वीर थी। लकड़ी के फ्रेम में, काँच टूटा हुआ, और उस पर धूल की इतनी मोटी परत कि पहले तो कुछ दिखा ही नहीं।
मैंने अपनी आस्तीन से उसे पोंछा। धूल गई, और काँच के नीचे से चेहरे बाहर आए।
काजल ने लालटेन करीब की।
और मेरा हाथ वहीं रुक गया।
तस्वीर में तीन आदमी खड़े थे।
बीच में — जगदीश यादव। मेरे दादा। मैंने उनकी कोई तस्वीर नहीं देखी थी, पर पहचान लिया। उसी चेहरे की बनावट मेरे पापा के चेहरे पर है, और मेरे चेहरे पर भी कहीं छिपी बैठी है। वो जवान थे। मूँछें घनी, बाल घने, कमीज़ की बाँह मोड़ी हुई, और आँखों में वो हँसी जो किसी बात को गंभीरता से नहीं लेती।
उनके दाईं तरफ़ — एक जवान आदमी, दुबला, चश्मा पहने, और कान पर पेंसिल खोंसी हुई।
"उस्ताद," टिंकू ने फुसफुसाया, और उसकी आवाज़ काँप रही थी। "ये… ये उस्ताद अली बक्श हैं ना?"
हाँ। दाढ़ी नहीं, झुर्रियाँ नहीं, झुकी कमर नहीं। पर वो चश्मा, वो कान पर टँगी पेंसिल, वो आदत — ये उस्ताद ही थे। जवान उस्ताद।
और बाईं तरफ़ —
मैंने तस्वीर को और करीब लाया।
एक तीसरा आदमी। लंबा, साफ़ चेहरा, सफ़ेद कुर्ता, और हाथ में एक छड़ी जैसी पतली चीज़। उसकी उम्र उस वक़्त तीस के आसपास रही होगी। और उसके चेहरे पर वो मुस्कान थी जो दिखावे की नहीं, आदत की थी।
"ये कौन है?" काजल ने पूछा।
मैंने बहुत देर तक देखा। फिर मैंने कहा, "सलीम।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
"सलीम बक्श?" काजल ने कहा, जैसे यक़ीन न आ रहा हो।
"हाँ। जवान सलीम।"
माँ ने तस्वीर की तरफ़ देखा और उनके होंठ सिकुड़ गए। पापा ने देखा ही नहीं। उन्होंने नज़र फ़र्श पर टिका दी थी, जैसे तस्वीर में आग लगी हो।
और तीनों के बीच में —
मैंने देखा और मेरा सीना एक झटके से ठंडा हो गया।
तस्वीर में साइकिल खड़ी थी।
काली साइकिल। हैंडल पर हाथ रखे हुए। और हैंडल के बीच में वो छोटी, गोल, पीतल की घंटी — जैसे बिल्कुल मेरी घंटी। एक ही आकार, एक ही रंग, एक ही पुरानी चमक।
मेरा हाथ अपने आप जेब की तरफ़ गया।
और घंटी जेब में ठंडी नहीं थी। वो गरम थी। गरम, जैसे किसी ने उसे उँगलियों में दबाकर रखा हो।
"उस्ताद," टिंकू ने मेरी आस्तीन खींची। "वहाँ कुछ और भी है।"
मैंने लालटेन का रुख़ किया।
संदूक के बगल में, दीवार के कोने में, फ़र्श पर एक छोटा लकड़ी का बक्सा रखा था।
बहुत छोटा। मेरी हथेली भर का। ऊपर से ढक्कन, जिस पर कोई नक्काशी नहीं, बस एक पतली लकीर। और बक्से के ऊपर, कपड़े का एक मैला टुकड़ा पड़ा था, जो उस पर चिपक गया था, जैसे बरसों में उससे जुड़ गया हो।
मैंने कपड़ा हटाया। बक्से पर धूल जमी थी, और मैंने उसे उँगली से पोंछा।
और फिर मैं वहीं बैठ गया।
क्योंकि बक्से का आकार…
मैंने जेब से घंटी निकाली। मेरी घंटी। जिसके नीचे का हिस्सा थोड़ा चौड़ा है, और जिस पर छोटे फूल खुदे हैं, और जिसके अंदर की जीभ अब भी महसूस होती है जब वो हिलती है।
बक्से का ऊपरी हिस्सा बिल्कुल वैसा ही था। गोल, थोड़ा चौड़ा, फूलों जैसा उभार।
मैंने हाथ बढ़ाया। डर रहा था, ये मैं साफ़ कह सकता हूँ। मेरे हाथ से औज़ार गिरते नहीं, पर उस वक़्त मेरी उँगलियाँ काँप रही थीं, जैसे पहली बार किसी टूटे हुए पहिये की तीलियाँ जोड़ रहा होऊँ।
मैंने बक्से का ढक्कन उठाया।
और अंदर देखा।
अंदर कपड़े की परत बिछी थी, जो अब पीली पड़ चुकी थी। और उस पर एक घंटी रखी थी।
दूसरी घंटी।
मेरी घंटी की जुड़वाँ। एक ही आकार, एक ही पीतल, एक ही फूलों वाली नक्काशी।
पर इसकी जीभ नहीं थी।
अंदर का हिस्सा खोखला था, और जहाँ जीभ लटकनी चाहिए थी, वहाँ बस एक छोटा-सा टूटा हुआ छल्ला बचा था, जैसे किसी ने जीभ को ज़ोर से खींचकर निकाल दिया हो।
"उस्ताद," टिंकू ने धीरे से कहा, "ये बजेगी नहीं?"
"नहीं बजेगी," मैंने कहा। "इसकी जीभ ही नहीं है।"
"तो फिर ये…"
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