The Mysterious Bell – Chapter 388
"माँ जी," उसने कहा, "आपकी कुर्सी अच्छी चलती है। मेरी तरफ़ से बधाई।"
बूढ़ी माँ ने उसकी तरफ़ नहीं देखा। उन्होंने सिर्फ़ अपने बेटे की कलाई पकड़ी और कहा, "बक्सा नीचे रख, बेटा। हाथ दुख रहे होंगे।"
बेटे ने बक्सा नीचे नहीं रखा। वो उसे और कसकर पकड़े रहा।
सलीम मुस्कुराया और दरवाज़े की तरफ़ मुड़ गया। चौखट पर वो रुका, और बिना पीछे देखे बोला, "भाईसाहब, आपकी दुकान के पीछे की कोठरी का ताला आज भी वही है?"
उस्ताद ने कुछ नहीं कहा।
"अच्छा," सलीम ने कहा। "फिर तो चाबी कहीं सही जगह ही होगी।"
वो निकल गया।
उसके जूतों की आवाज़ सीढ़ियों तक गई, फिर नीचे उतरी, फिर गुम हो गई। बरामदे में धूल वैसे ही तैरती रही, जैसे उसे कोई फ़र्क़ ही नहीं पड़ा।
तभी सब एक साथ बोले।
"ये क्या था?" — टिंकू ने पूछा, और मेरे आगे आ गया।
"उस्ताद, आपने उसे जाने क्यों दिया?" — बरामदे के दरवाज़े पर खड़े एक आदमी ने कहा।
"वो जेब में क्या डाल गया?" — ये आवाज़ पीछे से आई, और मैंने मुड़कर देखा।
मीरा खड़ी थी। उसके हाथ में कैमरा था, और उसके पीछे काजल, जिसकी आँखें लाल थीं और जिसके हाथ में एक प्लास्टिक की थैली थी जिसमें दवा के दो पत्ते दिख रहे थे।
मीरा ने मेरी जेब की तरफ़ देखा।
"अंकुश," उसने कहा, "जेब से निकाल।"
मैंने लिफ़ाफ़ा निकाला।
वो सादा सफ़ेद लिफ़ाफ़ा था। न नाम, न मोहर, न कोई लिखाई। सिर्फ़ एक कोना ज़रा मुड़ा हुआ, जैसे किसी ने जल्दी में जेब में डाला हो। मेरे हाथ में वो इतना हल्का लगा जैसे अंदर कुछ न हो।
"हल्का है," टिंकू ने कहा। "उस्ताद, अगर हल्का है तो इसमें कुछ है ही नहीं। ये डराने के लिए है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। "तू अब जासूसी की किताबें पढ़ने लगा?"
"नहीं, उस्ताद। मैं तो आपको देखकर सीखता हूँ।"
काजल ने मेरा हाथ पकड़ लिया। "भैया, ये हमें नहीं खोलना चाहिए। डॉक्टर इसरानी को दिखाते हैं।"
"काजल," मैंने धीरे कहा, "दवा की थैली तेरे हाथ में है और दवा भी नहीं आई, है ना?"
उसकी आँखें और लाल हो गईं।
"नहीं आई," उसने कहा। "खिड़की वाला कह रहा था कि काग़ज़ साफ़ न हों तब तक नई खेप नहीं उतरेगी। माँ की आख़िरी पत्ती आज रात की है।"
मैंने साँस ली।
और लिफ़ाफ़ा खोल दिया।
टिंकू मेरे कंधे के पास आ गया। मीरा ने कैमरा नीचे किया, पर उसकी लाल बत्ती जलती रही। बूढ़ी माँ ने कुर्सी पर झुककर देखा।
अंदर एक काग़ज़ था। मोटा नहीं, साधारण, पर ऊपर भारद्वाज कंस्ट्रक्शन की वो नीली गोल मोहर थी जो आज सुबह मैंने सूची पर देखी थी।
नीचे साफ़ अक्षरों में लिखा था —
"नूर अस्पताल की मुख्य सीढ़ी। आज रात बारह बजे से बंद। मरम्मत तब तक, जब तक नई इमारत का काम तय न हो जाए। इस दौरान कोई प्रवेश नहीं।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
मीरा ने मेरे कंधे के ऊपर से पढ़ा और धीरे से बोली, "बारह बजे। आज रात।"
"ये तो पहले से पता था," टिंकू ने कहा। "उस्ताद, वो आदमी भी यही कह रहा था। इसमें नई बात क्या है?"
मैंने काग़ज़ को थोड़ा और खोला।
और नीचे, मोटी लकीर के बाद, एक लाइन थी।
और उस लाइन में एक नाम था।
मैंने उसे दो बार पढ़ा। तीन बार पढ़ा। मेरी आँखें उस पर अटक गईं, जैसे कोई सीढ़ी का पायदान तोड़कर उस पर पैर रख दे।
"क्या है?" काजल ने पूछा। "भैया, क्या लिखा है?"
मेरे होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।
तभी बरामदे के आख़िरी कोने से, जहाँ छाया सबसे गहरी थी, एक हल्की आवाज़ आई — किसी के जूते का तला फ़र्श पर सरकने की आवाज़।
मैंने सिर उठाया।
डॉक्टर निहाल इसरानी खड़े थे। उनके हाथ में वही पुराना टेप लिपटा स्टेथोस्कोप था, और उनका चश्मा नाक पर फिसला हुआ था। उन्होंने बस एक नज़र उस काग़ज़ पर डाली, और मुझे लगा कि उन्हें पहले से पता था कि उसमें क्या लिखा है।
"डॉक्टर साहब," मैंने कहा।
वो पास आए और बिना कुछ कहे मेरे हाथ से काग़ज़ लेकर पढ़ने लगे। जैसे-जैसे उनकी नज़र नीचे जाती गई, उनका चेहरा वैसे ही ढीला पड़ता गया, जैसे बरसों से तना हुआ कोई धागा अचानक ढीला कर दिया गया हो।
"ये… ये नाम," उन्होंने धीरे कहा।
"हाँ," मैंने कहा। "ये नाम।"
काजल ने काग़ज़ खींच लिया और उसे पढ़ने लगी। उसकी आँखें घूमती गईं, फिर उसके हाथ काँपने लगे। "भैया, ये… ये पापा का नाम है।"
मीरा काग़ज़ के पीछे आई। उसने एक बार पढ़ा और सिर उठाकर मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश," उसने कहा, "काग़ज़ पर लिखा है कि सीढ़ी बंद होने के बाद उसकी चाबी किसे दी जाएगी। और नीचे लिखा है — 'सीढ़ी की चाबी सौंपने वाला: शंकर यादव।'"
बरामदा चुप हो गया।
मैंने काग़ज़ को अपने हाथ में वापस लिया और उस लाइन को फिर पढ़ा। पढ़ी हुई लाइन पर भी आँख फिसलती है, ये मुझे आज पता चला।
सीढ़ी की चाबी सौंपने वाला — शंकर यादव।
मेरे पापा।
और माँ की आटे के डिब्बे में पिछले बाईस साल से एक चाबी रखी हुई है।
मेरी जेब में घंटी हिली। एक बार। छोटी, साफ़ आवाज़, जैसे कोई मेरे कान के पास आकर बोला हो।
"चाबी।"
मैंने आँखें बंद कर लीं।
"अब समझा?"
मैंने साँस धीरे छोड़ी।
टिंकू ने मेरी कुहनी पकड़ी और धीरे से कहा, "उस्ताद, ये कुर्सी का हिसाब था या घर का?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा, फिर बूढ़ी माँ की तरफ़, जो मेरी आँखों पर ही तक रही थी, फिर काग़ज़ की तरफ़।
"दोनों," मैंने कहा। "आज सुबह से जो भी चल रहा है, वो एक ही सीढ़ी पर जाकर मिल रहा है।"
मैंने काग़ज़ को तीन बार मोड़ा और अपनी शर्ट की जेब में रख लिया — ठीक उसी जेब में जहाँ सलीम ने लिफ़ाफ़ा डाला था, और जहाँ अब उस काग़ज़ ने एक और चीज़ की जगह ले ली थी।
काजल ने धीरे से पूछा, "अब क्या करेंगे?"
मैंने व्हीलचेयर की तरफ़ देखा। बूढ़ी माँ ने अपनी साड़ी का पल्लू सीधा किया, और बेटे ने बक्सा अपनी छाती से नहीं, अब घुटनों पर रख लिया था।
"अब?" मैंने कहा। "अब ये कुर्सी अपना काम कर चुकी। अब इस काग़ज़ को अपना काम करने देंगे।"
डॉक्टर इसरानी ने मेरी तरफ़ देखा। "अंकुश, तेरे पापा से पूछा?"
मैंने सिर हिलाया। "नहीं।"
"तो पूछ," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो थकान थी जो सिर्फ़ उन लोगों की होती है जिन्होंने बहुत साल उन मरीज़ों को देखा है जिनके पास कोई और नहीं था। "पूछ, और सीधा पूछ। क्योंकि आज रात बारह बजे के बाद, जो सीढ़ी बंद होगी, वो सिर्फ़ सीढ़ी नहीं होगी। वो रास्ता होगा।"
मैंने एक पल सोचा।
फिर मैंने उस पुराने बरामदे में खड़े सब लोगों को देखा — बूढ़ी माँ, उसका बेटा, टिंकू, मीरा, काजल, डॉक्टर साहब, और दरवाज़े पर खड़े वो लोग जो देखने आए थे और अब चुप थे।
"बारह बजे तक," मैंने कहा, "हम सब वहाँ होंगे। और सीढ़ी अपनी चाबी से ही बंद होगी।"
मेरी जेब में घंटी फिर हिली, और इस बार उसकी आवाज़ में वो धीमी हिम्मत थी जो तब आती है जब कोई बहुत पुरानी चीज़ आख़िरकार अपना रास्ता देख लेती है।
"देख," उसने कहा। "अब घर।"
॥
अस्पताल के पुराने बरामदे से बाहर निकले तो शाम की रोशनी पीली पड़ चुकी थी। गली के मुँह पर लगी बत्ती हवा में हिल रही थी और उसके नीचे नींबू-मिर्ची वाला अपना ठेला समेट रहा था। उसने मुझे देखा, कुछ कहने को मुँह खोला, फिर बंद कर लिया। कल वही मुझे सभा का ताना मार रहा था। आज चुप था। चुप्पी भी एक तरह का ताना होती है, तुम जानते हो ना।
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