The Mysterious Bell – Chapter 387
"तेरे पास वो सूची है," उसने कहा। "मनोज का टेम्पो, गिरा हुआ कोना, तेरे बच्चे — सबको पता है। मुझे भी पता है। सूची में बारह नाम हैं। बारह नाम, हर नाम के आगे रकम, और आगे लिखा है — दूर।"
"आपने लिखी है?"
"मैंने नहीं। मैं लिखता नहीं, मैं पढ़ता हूँ।" उसने कंधे उठाए। "जो चीज़ पंद्रह दिन में ट्रस्ट को जानी है, उसका हिसाब किसी को रखना होता है। और तुम्हारी इस कुर्सी का भी। कुर्सी एक, बक्सा लोहे का, औज़ार बारह, कुल तेरह।"
मेरे हाथ ठंडे रह गए, पर मैंने चेहरे पर कुछ नहीं आने दिया। मैंने उस पर्ची को याद किया जो मेरी जेब में थी। वो मेरे हाथ में आई थी, मेरे पास थी, मेरी जेब में थी। फिर भी उसे ऐसे बोल रहा था जैसे उसने खुद मेरी जेब में हाथ डालकर पढ़ ली हो।
तभी मेरे दिमाग़ में एक बात चटकी।
बारह औज़ार। और तेरहवीं चीज़।
बूढ़ी माँ ने कहा था — बक्से में बारह औज़ार हैं, और तेरहवीं चीज़ बक्से में नहीं, उनके पति के सीने में थी, जो उनके साथ अस्पताल से चली गई।
और उनके पति के काग़ज़ पर लिखा था — तेरहवीं चीज़ हुनर से मिलेगी।
तो तेरहवीं चीज़ कोई चीज़ नहीं थी। तेरहवीं — हुनर था। बारह औज़ार, और उन बारह औज़ारों को चलाने वाला हाथ। यानी हुनर।
और ट्रस्ट की सूची में तेरहवें पर कुर्सी लिखी थी।
दो तेरहवीं। एक जो सीने में थी, और एक जो कुर्सी के नीचे से गिरी।
मेरे भीतर कुछ ठंडा सा फैल गया — वो एहसास जो तब आता है जब कोई काग़ज़ किसी इंसान की जगह लेने आता है।
"कुछ सोच रहे हो?" सलीम ने पूछा।
"सोच रहा हूँ," मैंने कहा, "कि आपने कभी किसी औज़ार से अपना नाम खुदवाया है?"
वो एक पल रुका। "नहीं।"
"तो फिर आप औज़ार की बोली क्यों लगाते हैं? औज़ार वो चीज़ है जो इंसान के हाथ में आकर नाम कमाती है। काग़ज़ में आकर वो सिर्फ़ वज़न बन जाती है।"
बरामदे में खड़े लोगों में से किसी ने धीरे से कहा, "सही कह रहा है।"
सलीम ने वो आवाज़ सुनी, पर देखा नहीं। उसकी नज़र मेरे चेहरे से नहीं हट रही थी।
फिर उसकी नज़र नीचे खिसकी।
मेरे हाथ पर।
मेरी कलाई पर, जहाँ पीतल की घंटी का छल्ला उँगली में फँसा हुआ था। मैं उसे बरामदे में आते वक़्त ही हाथ में ले आया था। आदत थी। घंटी जेब में रहती थी, पर जब भी कोई बात भारी होती, मेरी उँगली उसे निकाल लेती थी, जैसे कोई चाबी को जेब में टटोलता है।
सलीम ने उसे देखा।
और उसकी मुस्कान बदल गई। पहले वो मुस्कान थी जो काग़ज़ दिखाने वाला दिखाता है। अब वो मुस्कान थी जो किसी पुरानी चीज़ को पहचानने पर आती है।
"अरे," उसने धीरे कहा। "ये तो वही है।"
मेरी उँगलियाँ घंटी पर कस गईं।
"ये घंटी," सलीम ने कहा, और एक कदम आगे आया, "तुम्हारे खानदान ने चुराई नहीं है, अंकुश।"
मेरे भीतर का मज़ाक अचानक रुक गया। ऐसे रुका जैसे कोई चलती साइकिल की चेन अचानक उतर जाए — पहिए घूमते रहते हैं, पर आवाज़ बंद हो जाती है।
"छुपाई है," उसने कहा।
मैंने कुछ नहीं कहा।
"छुपाई है," उसने दोहराया, "उस हाथ से जिसने इसे तोड़ा था। और वो हाथ आज भी ज़िंदा है। आज भी उसके जूते चमकते हैं।"
मेरी उँगली में घंटी और ठंडी हो गई।
मेरी जेब से बहुत धीमी आवाज़ आई, इतनी धीमी कि मुझे ही सुनाई दे।
"सच है।"
मैंने साँस रोक ली।
"अभी पूछ।"
मैंने सलीम की आँखों में देखा। "किसने तोड़ी थी?"
सलीम मुस्कुराया। "जब तेरे पापा की चुप्पी बोलेगी, तब पूछना।"
"मैं पूछ रहा हूँ आपसे।"
"और मैं तुम्हें बता रहा हूँ कि आज नहीं।" उसने हाथ उठाया, जैसे तराज़ू के पलड़े बराबर कर रहा हो। "आज का दिन कुर्सी का है। कल का दिन तेरे घर का होगा।"
उसने एक पल के लिए मेरे कंधे के पीछे, बरामदे के अंधेरे कोने में, बूढ़ी माँ और बेटे को देखा, फिर वापस मेरी तरफ़।
"जिस दिन सच खुलेगा," उसने बहुत धीरे कहा, इतना धीरे कि बाहर खड़ी भीड़ को सिर्फ़ उसके होंठ हिलते दिखे, "उस दिन तेरा घर हिलेगा। और तेरे पापा की चुप्पी बोलेगी। उस दिन तुम मुझे याद करोगे — कि जो आदमी तुम्हें काग़ज़ दिखाकर डरा रहा था, वो सबसे कम डरने वाला आदमी था।"
मेरी जेब से फिर आवाज़ आई, बहुत छोटी।
"अभी नहीं।"
मैंने होंठ कसे।
"आप बड़े साहब के सलाहकार हैं," मैंने कहा, "और मेरे पापा की चुप्पी का हिसाब आप रखते हैं। ये अच्छा है। हिसाब रखने वाले कभी किसान नहीं होते, वो हमेशा बटाईदार होते हैं — फ़सल का नहीं, आदमी के डर का।"
सलीम के चेहरे पर कुछ हिला। बहुत थोड़ा, बहुत तेज़ — जैसे पानी पर एक पल की लकीर। फिर फिर से वही ठंडी मुस्कान।
"तू अपने दादा की तरह बोलता है," उसने कहा। "वो भी बोलता था। और देख, आज उसकी दुकान की जगह तेरे हाथ में एक पीला नोटिस है।"
"नोटिस तो काग़ज़ है," मैंने कहा। "दुकान दीवार है। और दीवार पर लिखने वाला कोई और है।"
तभी बरामदे के दूसरे दरवाज़े से, जो नीचे वाले हॉल में जाता था, एक आवाज़ आई।
"सलीम।"
सबने सिर घुमाया।
उस्ताद अली बक्श खड़े थे। उनका मोटा चश्मा धूप में चमक रहा था और कान पर पेंसिल वैसे ही फँसी थी। उनके हाथ में कुछ नहीं था — न कैंची, न धागा, न कोई काग़ज़। सिर्फ़ खुली हथेली, जैसे कोई खाली बाज़ार में खड़ा हो।
सलीम का शरीर एक पल के लिए अकड़ गया। और उस अकड़न में मुझे एक चीज़ दिखी जो उसने आज तक नहीं दिखाई थी — वो बड़ा भाई की आवाज़ सुनकर छोटा भाई हो गया था।
उस्ताद ने एक कदम आगे रखा।
"तूने जो रास्ता चुना," उन्होंने कहा, बहुत सादा आवाज़ में, "उसका हिसाब मुझसे मत माँगना।"
बस इतना।
कोई शिकायत नहीं। कोई ताना नहीं। कोई पुरानी बात नहीं। सिर्फ़ दो वाक्य, जैसे कोई अपनी ही किताब का आख़िरी पन्ना फाड़कर रख दे।
सलीम ने उनकी तरफ़ देखा। उसके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली। फिर उसने धीरे से कहा, "भाईसाहब…"
"मैं तेरा भाई हूँ," उस्ताद ने कहा। "इसीलिए ये बता रहा हूँ। अगर ग़ैर होता, तो तेरे साथ खड़ा होता और तुझे बचाता।"
सलीम ने नज़र नीचे कर ली।
बरामदे में इतना सन्नाटा था कि दूर, नीचे की गली में किसी साइकिल की घंटी सुनाई दी — कोई बच्चा होगा, स्कूल से लौटते वक़्त हैंडल पकड़कर बजा रहा होगा।
सलीम ने साँस ली। और एक पल में वो फिर सलीम बक्श हो गया — सफ़ेद कुर्ता, ठंडी मुस्कान, सीधी कमर।
"ठीक है," उसने कहा। "भाईसाहब ने अपनी बात कह दी। अब मेरी बात भी सुन लो।"
वो मेरे पास आया। दो कदम। मैंने पीछे नहीं हटा — नहीं, ये लड़ाई का वक़्त नहीं था, ये गिनती का वक़्त था, और गिनती में पैर पीछे रखने से हिसाब बिगड़ता है।
वो मेरे बहुत पास आकर रुका। उसकी जेब से साबुन और धूप की गंध आ रही थी। वो गंध मुझे जानी-पहचानी लगी — वही गंध जो उस्ताद ने उस पीले लिफ़ाफ़े में सूँघी थी।
"ये रख," उसने कहा।
और उसने कोई काग़ज़ नहीं, एक छोटा सा बंद लिफ़ाफ़ा मेरी शर्ट की जेब में डाल दिया — इतनी तेज़ी से कि जैसे कोई रुमाल जेब में ठूँसता हो।
मैंने हाथ नीचे किया, पर उसने मेरी कलाई नहीं रोकी।
"आज रात," उसने धीरे कहा, "अस्पताल की सीढ़ी बंद होने से पहले पढ़ लेना।"
मैंने उसकी आँखों में देखा। "क्यों?"
"क्योंकि सीढ़ी बंद होने के बाद," उसने कहा, "वहाँ सिर्फ़ दीवार रहेगी। और दीवार से सवाल नहीं पूछे जाते।"
वो पीछे हटा।
उसने एक बार बूढ़ी माँ की तरफ़ देखा, फिर बेटे की तरफ़, फिर उस लोहे के बक्से की तरफ़ जो बेटे के हाथों में था। उसकी नज़र उस बक्से पर एक पल ज़्यादा रुकी, और मुझे लगा कि वो बक्सा गिन रहा है — जैसे किसी ने उसे बता रखा हो कि अंदर क्या है।
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