The Mysterious Bell370 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 370

6 min read November 5, 2026

शबनम आपा ने मेज़ पर चाय रखते हुए कहा, "डॉक्टर साहब, आप वो रात दोबारा मत खोलिए, जब तक कोई पूछे नहीं।"

"आज कोई नहीं पूछेगा," उन्होंने कहा, "आज मैं खुद खोलूँगा।"

उन्होंने रजिस्टर खोला। पन्ने भूरे थे, किनारे पीले। हर पन्ने पर दो कॉलम — तारीख़ और हिसाब। बीच में एक पन्ने पर उन्होंने उँगली रखी।

"ये ज़मीन का पन्ना है। देखो।"

मैंने झुककर देखा। पन्ने पर पुरानी स्याही में लिखा था — गली के बुज़ुर्गों ने मिलकर ज़मीन दी, किसने कितना हिस्सा छोड़ा, किसने नाम लिखवाया। नीचे सात नाम थे और उनके आगे सिर्फ़ हिस्से थे, रकम नहीं। सबसे नीचे एक हस्ताक्षर था जो लिखाई में थोड़ा अलग था — अक्षर टेढ़े, पर बने हुए, जैसे लिखने वाले ने अपने हर अक्षर पर मेहनत की हो।

"ये सलीम का हाथ है," डॉक्टर इसरानी ने कहा, "ये उसने खुद लिखा था। और इस पन्ने की दूसरी तरफ़ जो लिखा है, वो मैंने आज से पहले किसी को नहीं दिखाया।"

उन्होंने पन्ना पलटा। दूसरी तरफ़ पेंसिल से, बहुत छोटे अक्षरों में, चार लाइनें थीं। डॉक्टर इसरानी ने उन्हें पढ़ा।

"—ज़मीन किसी एक की नहीं, सबकी। कोई इसे बेच नहीं सकता, कोई इसे बंधक नहीं रख सकता; यही काग़ज़ी शर्त है। और ये काग़ज़ सिर्फ़ सात लोगों की मंज़ूरी से खुलेगा। अगर सातों मिलें, तो शर्तनामा खुद बोलेगा। अगर किसी एक का अंगूठा या हस्ताक्षर झूठा हो, तो काग़ज़ चुप हो जाएगा — किसी की गवाही नहीं करेगा।"

कमरा चुप हो गया।

उस्ताद ने अपना चश्मा उतारा और पोंछने लगे, जैसे कुछ सुनने से बच रहे हों।

शबनम आपा ने कहा, "सात लोग? सात कौन?"

"इस पन्ने पर सात नाम हैं," डॉक्टर इसरानी ने कहा, "चार मर चुके हैं। दो बूढ़े अभी ज़िंदा हैं, एक—"

वो रुके।

"एक कौन?" मैंने पूछा।

डॉक्टर इसरानी ने रजिस्टर मेरी तरफ़ सरकाया। मैंने देखा। नामों की सूची में आख़िरी नाम जगदीश यादव था। यानी मेरे दादा का नाम। और उसके आगे हिस्सा नहीं लिखा था; सिर्फ़ लिखा था कि हिस्सा बराबर होगा, एक भी कम नहीं, और नीचे सलीम के हस्ताक्षर।

मैंने कुछ नहीं कहा।

"तेरे दादा का हिस्सा इस ज़मीन में नहीं था," डॉक्टर इसरानी ने कहा, "उनका हिस्सा इस काग़ज़ में था। वो इसके गवाह थे। काग़ज़ जो भी करेगा, उसकी मंज़ूरी से करेगा।"

"इसीलिए सक्सेना उस काग़ज़ पर मेरा अंगूठा चाहता था।"

"हाँ।"

कमरा फिर चुप। पर इस बार चुप्पी में डर नहीं था। चुप्पी में वो तरह का सन्नाटा था जो हिसाब के पहले आता है।

तभी दरवाज़े पर माँ की आवाज़ आई।

"मैं भी सुन लूँगी।"

सब मुड़े। माँ दरवाज़े पर खड़ी थीं। माँ की साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा था, और उनके हाथ में वही हिसाब की कॉपी थी और उसी कॉपी के नीचे वो छोटा पीला लिफ़ाफ़ा दबा हुआ था। पर उनका चेहरा अजीब तरह से साफ़ था। जैसे आदमी बहुत दिन बाद बिस्तर से उठे और पहली बार बिना डरे खड़ा हो।

काजल उनके पीछे थी। उसने आते ही कहा, "डॉक्टर साहब, इन्हें नीचे आना मना था। सीढ़ियाँ, हवा, साँस—"

"मैंने तुझे नहीं पूछा," माँ ने कहा। फिर डॉक्टर इसरानी की तरफ़ देखकर बोलीं, "डॉक्टर साहब, आप बताइए। कल सभा में जाने से मेरी जान को खतरा है क्या?"

डॉक्टर इसरानी ने धीरे से रजिस्टर बंद किया।

"सुशीला जी," उन्होंने कहा, "सच बोलूँ?"

"आप वैसे भी झूठ बोलना नहीं जानते।"

"हाँ, खतरा है।"

"कितना?"

"अगर आप ज़ोर लगाएँ, चढ़ाई चढ़ें, धूप में चले जाएँ, बिना दवा रहे, तो। अगर आप आराम से बैठकर, मुँह ढँककर, दस मिनट बोलकर लौट आएँ — तो उतना खतरा नहीं, जितना आज रात चुप रहने में है।"

माँ ने काजल की तरफ़ देखा।

काजल ने अपना हाथ माँ की कलाई पर रखा, "अम्मी—"

"काजल, तू सुन। मैं तेरी उम्र में हर सुबह तीन बजे चूल्हा जलाती थी और उस आदमी के लिए टिफ़िन बनाती थी जिसने मुझे छोड़कर जाना नहीं चाहा, पर गया। मैंने उस वक़्त भी खाना बनाया। आज मैं खड़ी होकर एक बात बोलूँगी। अगर मुझसे वही सबसे बड़ा काम लगता है, तो मुझे जाने दे।"

काजल ने अपना हाथ खींच लिया। उसकी आँखों में पानी था। पर वो बोली नहीं।

डॉक्टर इसरानी ने कहा, "मैं आपके साथ रहूँगा। वो गाड़ी—"

"वो गाड़ी का पहिया टूटा है," माँ ने कहा, "डॉक्टर साहब, आप ऐसा ब्यूरोक्रेसी वाला वादा मत कीजिए।"

फिर सब हँसे। पहली बार उस दिन कमरे में हँसी आई।

तभी पीछे से धातु की घिसटने की आवाज़ आई।

हम सब मुड़े।

पापा दरवाज़े में खड़े थे। उनके दोनों हाथों में एक तह की हुई लोहे की व्हीलचेयर थी। लकड़ी की सीट, दोनों तरफ़ पुराने कपड़े वाले हाथ के सहारे, और बाँये पहिए में तीलियाँ छह जगह से टूटी हुई। उसका बल्ली ज़ंग खा चुका था और पहिया ज़मीन पर टिकाने से किसी कोने पर अटकता था।

पापा चुपचाप उसे कमरे के बीच लाए और लगभग मेरे पैरों के पास रख दिया।

"शंकर जी, ये?" माँ ने कहा।

"यही ले चलूँगा," पापा ने कहा, "तेरे लिए।"

फिर वो घुटनों के बल बैठ गए और अपने औज़ार थैले से रिंच निकालने लगे। उनका थैला वही पुराना चमड़े का था, जिसकी सिलाई तीन जगह से फटी थी। उन्होंने पहिया दबाया, तीसरी बार घुमाया और बीच वाले बोल्ट पर रिंच रखी।

कमरे में कोई नहीं बोला।

मैं चुपचाप उनके पास बैठ गया। मेरे हाथ जैसे अपने आप बढ़े। मैंने पहिया पकड़ लिया, जिससे घूमते वक़्त वो हिले नहीं।

हम दोनों बिना कुछ बोले, एक ही पहिए पर लग गए।

पापा रिंच घुमाते, बोल्ट खुलते, ज़ंग टूटकर गिरती। मैं हाथ की हथेली से पहिया सहारा देता, थोड़ा ऊपर उठाता, थोड़ा नीचे। हमारे हाथों के बीच सिर्फ़ धातु थी, और उस धातु में एक-एक अंगुल कह रहा था कि हम दोनों वही कर रहे हैं जो हमें करना चाहिए।

उस्ताद कुछ कहने लगे थे, पर शबनम आपा ने धीरे से उनका हाथ दबा दिया। कमरे में शब्द बंद हो गए।

पापा ने छह बार पहिए को घुमाया।

"टेढ़ा है," उन्होंने कहा।

"तीसरी तीली दबी है," मैंने कहा।

"और?"

"और बोल्ट का चूड़ा घिस गया है। वो नया लगेगा।"

"नया नहीं लगाऊँगा।"

"क्यों?"

"क्योंकि यही पहिया इसके साथ बना है। नया लगाया तो ये गाड़ी ये गाड़ी नहीं रहेगी।"

मैं मुस्कुराया।

पापा ने मेरी तरफ़ देखा, पहली बार उस शाम, पहली बार उस हफ़्ते में, शायद पहली बार बहुत महीनों में।

"तू क्या सोच रहा है?"

"सोच रहा हूँ कि आपको बोलना कम पड़ता है, पर जब बोलते हैं तो आप एक ही बात में अस्पताल की ज़मीन से लेकर साइकिल के पहिए तक घूम जाते हैं।"

पापा ने मुझे देखा। फिर हँसे। वो हँसी उनके चेहरे पर बहुत दिन बाद आई, और वो बहुत देर नहीं रुकी — एक पल, एक झुर्री, और ग़ायब। पर आई।

माँ दूर दरवाज़े पर खड़ी देख रही थीं। मैंने उनकी तरफ़ देखा तो उन्होंने चेहरा दूसरी तरफ़ कर लिया और अपने पल्लू से आँखें पोंछ लीं।

काजल ने माँ का हाथ पकड़ लिया।

"अम्मी, आप बैठिए।"

"बैठूँगी," माँ ने कहा, "पर कल तक नहीं। कल नीचे ही बैठूँगी जब ये गाड़ी चलेगी।"

पापा ने पहिया कसा।

फिर हमने साथ-साथ वो लोहे का छोटा बोल्ट निकाला, जो अंदर से दबा हुआ था। पापा ने मुझे थमाया। मैंने उसे उलटा करके बाहर निकाला, और ज़ंग साफ़ करने के लिए ट्रंक से वो पुरानी रेती उठाई।

मैं रेती चला रहा था, और घंटी — जो जेब में थी — बजी।

"सुन," घंटी ने कहा।

मेरा हाथ रुक गया।

"बोल।"

"जब एक पहिया बैठता है, तो दूसरा आप से आप बैठ जाता है। पर सिर्फ़ तब जब दोनों पर हाथ एक ही वक़्त में हों।"

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