The Mysterious Bell369 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 369

7 min read November 5, 2026

मैंने काग़ज़ निकाला और उस पर एक-एक नाम के आगे सही का निशान लगाने लगा।

डॉक्टर इसरानी — मरीज़ आएँगे।

सकीना बी — आएगी।

शबनम आपा — खड़ी है।

भोला भाई — आएगा।

रमेश और नसीम — दोनों आएँगे, और अब एक-दूसरे के साथ।

रेडियो वाले काका — खड़े हैं।

किराने वाले काका — बेटा लाएगा।

चूड़ी वाली बाई — बेटी के साथ आएगी।

दुबे अंकल — वो तो थाने से ही आएँगे।

सुनीता दीदी — वो सबसे पहले आएगी, क्योंकि उसने सबसे पहले सच बोला था।

शकील भाई — लिफ़ाफ़ा लौटाकर आएगा।

और मीरा — मीरा का नाम अभी खाली था।

मैंने उसकी लाइन पर उँगली रखी और कुछ देर वहीं रुक गया।

टिंकू ने देख लिया।

"उस्ताद," उसने कहा, "मीरा दीदी का निशान क्यों नहीं लगा रहे?"

"क्योंकि वो मेरी सूची में नहीं," मैंने कहा, "वो अपनी सूची में है। और अपनी सूची का निशान हर आदमी को खुद लगाना पड़ता है।"

टिंकू ने सिर हिलाया।

"पर उस्ताद," उसने फिर कहा, "एक बात है।"

"क्या?"

"इस काग़ज़ में हर आदमी के आगे पैसा लिखा है। पर सबसे नीचे जो लाइन है — जो न माने, उसका नाम दुकान के नोटिस में — उसमें पैसा नहीं लिखा। वहाँ धमकी लिखी है। मतलब जो पैसे से नहीं मानेगा, उसे डर से मनाया जाएगा।"

मैंने काग़ज़ को उलटा किया।

"और उस्ताद," टिंकू ने कहा, "अगर उसके पास डरने वाले इतने आदमी होते, तो वो एक काग़ज़ में उनके नाम नहीं लिखता। नाम वही लिखता है जिसे वो भूल जाना चाहता है।"

मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।

"तू कितना पढ़ता है?"

"मैं स्कूल नहीं जाता," उसने कहा, "इसलिए सोचता ज़्यादा हूँ।"

मैं हँसा। पहली बार उस दिन हँसा, बिना ज़ोर लगाए।

हम गली के मोड़ की तरफ़ लौट रहे थे। सूरज सिर पर आ गया था और गली की छाया छोटी होने लगी थी। बच्चे आगे चल रहे थे, अपनी-अपनी जीत गिन रहे थे — किसने कितने नाम जोड़े। गुड्डू कह रहा था उसने दो जोड़े, चिंटू कह रहा था उसकी चप्पल ने सबसे बड़ा काम किया।

मैं पीछे-पीछे चल रहा था और काग़ज़ को मोड़कर जेब में रख रहा था, जब घंटी फिर बजी।

"सुन," घंटी ने कहा।

"सुन रहा हूँ।"

"जो काग़ज़ तूने उठाया, वो चोरी नहीं थी। वो हिसाब था। और हिसाब की सबसे बड़ी बात ये है कि हिसाब रखने वाला एक दिन मिलाने बैठता है।"

"कब?"

"कल दस बजे। और उस दिन उसे मिलाना पड़ेगा, चाहे वो चाहे या न चाहे।"

मैंने जेब में हाथ डालकर घंटी दबा दी।

और तभी गली के मुँह से आवाज़ आई।

मनोज।

वो टेम्पो के पास खड़ा था, सफ़ेद कुर्ता, काग़ज़ों का बंडल हाथ में, और उसका चेहरा उस वक़्त का था जब आदमी को पता चल जाए कि उसकी चीज़ किसी ने छू ली है।

"सुनो!" वो चिल्लाया। उसकी आवाज़ गली में गूँजी और हर शटर के पीछे किसी ने कान लगा दिया। "सब सुन लो! जो कल सुबह दस बजे पीपल के नीचे आया — उसकी दुकान पर भी वही पीला नोटिस लगेगा! वही! जो अस्पताल पर लगा है, वही! नाम वही, तारीख़ वही, मुहर वही!"

गली चुप हो गई।

इतनी चुप कि गुमटी का स्टोव भी जैसे साँस रोककर बैठ गया।

बच्चे मेरी तरफ़ मुड़े। सानिया ने कॉपी सीने से लगा ली। चिंटू ने चप्पल पहन ली, जैसे भागने की तैयारी हो। रफ़ीक़ का टूटा चश्मा हाथ में आ गया।

मैंने एक कदम आगे रखा।

और फिर जितनी देर में आदमी एक बात सोचता है, उतनी देर में मेरे दिमाग़ में एक पूरी तस्वीर बन गई — उस काग़ज़ की, उस सूची की, उन ग्यारह नामों की जो कल आएँगे, और उस एक नाम की जो अभी अपनी सूची में निशान नहीं लगा पाया था।

मैंने जेब से घंटी निकाली।

और उसी पल — पूरी गली के सामने, मनोज के सामने, बच्चों के सामने — घंटी ने खुद बजकर कहा:

"अब देख, ये नोटिस किसकी दीवार पर लगता है।"

मैंने घंटी जेब में रखी और मनोज की तरफ़ देखा।

"भाई साहब," मैंने कहा, "नोटिस लगाने से पहले एक चीज़ पूछ लो — दीवार किसकी है और उस पर लिखने वाला कौन है।"

मनोज ने काग़ज़ का बंडल सीने से लगाया और कुछ कहने के लिए मुँह खोला।

पर उससे पहले, गुमटी की तरफ़ से शबनम आपा की आवाज़ आई, पीतल की थाली पर चिमटी पटकने वाली आवाज़।

"और सुन लो, मनोज जी!" वो बोलीं। "ये गली नोटिस से नहीं डरती। ये गली सिर्फ़ उस चीज़ से डरती है जो चुपचाप आती है। तुम्हारा काम चुपचाप नहीं है, भाई। तुम्हारा काम ढोल बजाकर आता है।"

गली में कहीं कोई हँसा।

फिर दूसरा हँसा।

और मनोज के हाथ से काग़ज़ का एक कोना फिसलकर ज़मीन पर गिर गया।

॥

काग़ज़ का वो कोना ज़मीन पर गिरा, और मनोज ने जैसे अपनी जान गिरते देखी हो। वो झुका, उठाया, झाड़ा, और फिर से बंडल में दबा दिया। पर उसका चेहरा वो हो गया था जो आदमी के चेहरे पर तब आता है जब उसकी बात पहली बार किसी ने हँसकर सुनी हो।

वो कुछ कहने के लिए मुँह खोला, फिर बंद कर दिया। फिर टेम्पो की तरफ़ मुड़ा, अपनी काग़ज़ों की थैली उठाई, और चला गया। गली के मुँह पर पहुँचकर उसने एक बार पीछे देखा, पर उसमें वो धमकी नहीं थी जो सुबह थी। उसमें सिर्फ़ ये था कि उसने किसी से कुछ खोया है और उसे याद नहीं आ रहा कि क्या।

शबनम आपा ने थाली पर चिमटी एक बार और पटकी, जैसे ताला लगा रही हों। फिर बोलीं, "अब जो भी हो, चाय पीकर हो। मेरा स्टोव पूरे दिन तुम लोगों की बहसें सुनकर थक गया है।"

बच्चे हँसते-उछलते गुमटी की तरफ़ भागे। मैंने काग़ज़ को जेब से निकालकर एक बार देखा। बारह नाम, बारह रकमें, और हर नाम के आगे वो एक ही शब्द — दूर। और सबसे नीचे वो लाइन। जो न माने, उसका नाम दुकान के नोटिस में।

मैंने काग़ज़ मोड़कर जेब में रखा।

सानिया ने मेरे पास आकर कहा, "भैया, अब क्या?"

"अब जो होगा," मैंने कहा, "वो सूरज ढलने के बाद होगा। और उसके लिए मुझे तुम चारों की ज़रूरत है।"

"क्या करना है?"

"कुछ नहीं। बस गली में कान लगाकर रहना। जो भी आदमी आज शाम को घर से निकले, तुम्हें पता होना चाहिए वो किसके दरवाज़े पर जा रहा है।"

सानिया की आँखें चमकीं। "यानी जासूसी।"

"यानी पहरा," मैंने कहा।

दोपहर ढलने लगी। गली में लू थी। पीपल की छाया अपनी जगह से खिसककर दुकान की तरफ़ आ गई थी, और उस छाया में बैठे बूढ़े अपनी बातें धीमी करके, एक-एक करके घर की तरफ़ लौटने लगे।

शाम सात बजे के आसपास दुकान के पीछे वाला कमरा भर गया।

एक चारपाई, एक लोहे की अलमारी, औज़ारों का ट्रंक, टूटा रेडियो एक कोने में, और सामने वो मेज़ जिस पर रात में मैं हिसाब देखता हूँ। उसी मेज़ पर आज शबनम आपा की गरम चाय के गिलास रखे थे, और एक कोने पर माँ की कटोरी में टिंकू के लिए आमचूर।

डॉक्टर इसरानी आख़िरी में आए। वो जैसे ही दरवाज़े पर दिखे, कमरे में एक भी आदमी खाँसा नहीं। साठ के पार के आदमी हरियल लुंगी जैसी ढीली धोती और उस पुराने सफ़ेद कोट में खड़े थे, जिसकी कुहनी पर टाँका डबल था। उनके हाथ में एक मोटा मैला-सा रजिस्टर था, जिसकी जिल्द लाल थी और किनारे जगह-जगह से उखड़े हुए।

"जगह है?" उन्होंने पूछा।

"आपके लिए जगह कैसी, साहब," उस्ताद अली बक्श ने चारपाई के कोने से कहा, "आप खड़े ही रहिए, हमारी टाँगें तो जवान हैं।"

डॉक्टर इसरानी हँसे। वो उस्ताद के पास बैठ गए और रजिस्टर मेज़ पर रख दिया।

"ये अस्पताल का सबसे पुराना रजिस्टर है," उन्होंने कहा, "जो मेरे पास बचा है। इसके पहले दो खाते सलीम अहमद अपने हाथ से रखते थे। बाद में जब वो मेरे साथ रहते थे तो मैं लिखता रहा। और वो रात जब हम अलग हुए, उसके बाद… उसके बाद कुछ भी ठीक से नहीं लिखा गया।"

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho