The Mysterious Bell – Chapter 362
और किराने वाले काका ने कहा — "बेटा, तेरे पास अपनी दुकान है। हमारे पास भी है। यही तो दिक्कत है।"
मैं वहीं खड़ा रह गया।
क्योंकि मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं था। कोई जवाब नहीं था। मैं कह सकता था कि डरो मत, पर डरना मना करने से डर जाता नहीं। मैं कह सकता था कि सब मिलकर खड़े होंगे, पर मैं कल रात खुद पापा को ढूँढ़ने अकेले निकलने वाला था।
और मेरी जेब में घंटी बजी।
मैंने उसे निकाला। पीतल का ठंडा गोला, जिस पर पुराना फूल उभरा था। वो मेरी हथेली में गरम हो गई, और उसने कहा — छोटे वाक्यों में, जैसे हमेशा कहती है।
"चिल्ला रहा है।"
मैं चुप हो गया।
"तेरा जोड़ नहीं है, ये।"
"तो क्या करूँ?" मैंने धीरे पूछा।
"बड़ा जोड़ ज़ोर से नहीं बनता। सबके अपने बोलने से बनता है। तू चुप हो, तो किसी को सुनाई देगा।"
और फिर वो चुप हो गई।
>
दस बजे मैं चबूतरी पर बैठ गया।
और आए — गिनकर सत्रह लोग। सत्रह। मैंने उम्मीद छोड़ दी थी, पर सत्रह आए। और मुझे यह भी पता था कि सत्रह में से चौदह सिर्फ़ सुनने आए हैं, बोलने को कोई तैयार नहीं।
माँ नहीं आईं।
वो अस्पताल के नीचे वाले कमरे से बोलकर कह गई थीं कि बेटा, मैं आऊँगी, पर पहले मुझे अपनी साँस पर भरोसा करना है। मुझे अपनी बात कहने के लिए ताक़त चाहिए, और आज सुबह वो ताक़त थोड़ी कम है।
काजल नौ बजे फार्मेसी गई और लौटी थी — सिर झुकाए, चेहरा लाल। उसने कहा कि उसने पूछा था कि मरीज़ के इलाज के लिए अंगूठा ज़रूरी है क्या। और दवा वाले भाई ने बस इतना कहा — "बहन, अंगूठा मेरा नहीं है। ऊपर से आता है।"
सभा नहीं हुई।
सभा माने कोई बोलता है। और आज कोई नहीं बोला।
धीरे-धीरे लोग उठने लगे। रमेश भाई ने कहा कि दुकान पर ग्राहक आने वाला है। भोला भाई ने कहा कि बीवी को खाना खिलाना है। चूड़ी वाली बाई ने कहा कि आज मंडी से माल आना है। हर आदमी के पास एक बहाना था, और हर बहाना सच्चा था। इसीलिए सबसे ज़्यादा दर्द देता है — झूठ नहीं, सच्चा बहाना।
सत्रह से ग्यारह रह गए। ग्यारह से सात।
और मैं चबूतरी पर बैठा रहा।
सूरज सिर पर आ गया था। पीपल की छाया छोटी हो रही थी, जैसे वो भी सिकुड़ रही हो। और मेरे सामने उस्ताद की दुकान से आज टिक-टिक की आवाज़ नहीं आ रही थी। मैंने सोचा, आज सब चुप है। घंटी, तंत्र, उस्ताद की मशीन, गली, पापा — सब।
मैंने अपने घुटने पर हाथ रखा, और मेरी नज़र अपने हाथ पर गई। उँगलियों में ग्रीस के निशान। हमेशा की तरह। और मुझे लगा कि आज यही सबसे ईमानदार चीज़ है — ग्रीस। क्योंकि ग्रीस वहाँ लगता है जहाँ कोई चीज़ चलती है, और आज कुछ नहीं चल रहा था।
तभी सानिया मेरे पास आई।
वो चुपचाप आई। सामने से नहीं — पीछे से, पीपल के तने की आड़ से, जैसे वो कोई गुप्त खबर लाई हो। और वो मेरे कान के पास झुकी। उसकी साँस गरम थी, और उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि मुझे भी सुनने के लिए रुकना पड़ा।
"उस्ताद," उसने कहा।
"हूँ।"
"मैं सुबह सात बजे स्कूल के पीछे वाली गली में थी।" वो रुकी। "मैंने मनोज को देखा।"
मैं उठकर बैठ गया।
"क्या कर रहा था?"
"अस्पताल की सीढ़ी पर बोर्ड लगा रहा था," सानिया ने कहा। "वो नीला बोर्ड। जिसे वो कल सुबह दस बजे लगाने की बात कह रहा था। उस्ताद, सात बजे। तीन घंटे पहले। उसके साथ दो मज़दूर थे, और उसने उन्हें वो सीढ़ी की तरफ़ भी नहीं जाने दिया।"
मेरा मुँह सूख गया।
"और फिर?" मैंने कहा। "फिर क्या हुआ?"
सानिया ने एक बार पीछे देखा, जैसे कहीं कोई सुन न रहा हो। और फिर उसने वो बात कही जो उसने सात बजे से अंदर दबाकर रखी थी, जो उसने किसी को नहीं बताई थी, जो वो मुझे अकेले में बता रही थी।
"उस्ताद, बोर्ड के पीछे," उसने कहा, "एक सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी खड़ा था।"
और मेरी जेब में घंटी ने एक बार खुद बजकर कहा, कि अब आगे का रास्ता किसी काग़ज़ से नहीं, किसी आदमी से मिलेगा।
सानिया ने मेरी आँखों में देखा, और उसकी आवाज़ काँपी।
"और उस्ताद — उसकी उँगली में काली अंगूठी चमक रही थी।"
॥
मैं चबूतरी से ऐसे उठा जैसे किसी ने मेरी रीढ़ में तार खींच दिया हो। मेरा घुटना पत्थर पर रगड़ खा गया और जेब में पड़ी घंटी खनक कर एक छोटी सी आवाज़ दी, जैसे कोई नींद में करवट ले।
"तू यहीं रह," मैंने टिंकू से कहा।
"उस्ताद, मैं साथ…"
"टिंकू।" मैंने उसका कंधा पकड़ा और उसकी आँखों में देखा। "सुन। आज तेरा काम यहीं है। शबनम आपा के पास बैठ। अगर मैं साँढ़े दो बजे तक न लौटूँ, तो आपा को बोल देना कि मैंने जो बात कही थी, वो अब कर दें। और सानिया…"
सानिया ने सिर उठाया।
"तू स्कूल की तरफ़ जा। देख, आज कोई बच्चा छत के पास न जाए। कोई भी। समझी?"
"समझी, उस्ताद।"
मैंने शबनम आपा की तरफ़ देखा। वो खड़ी थीं, चिमटी हाथ में, और उनके चेहरे पर वो भाव था जो मैंने उनके चेहरे पर सिर्फ़ तब देखा था जब बबलू चूड़ियों वाले काका की गुमटी उलट रहा था।
"जा," उन्होंने बस इतना कहा। "और अंकुश — सुन।"
मैं रुका।
"आज किसी से अकेले मत भिड़ना। गली का नाम अभी तेरे पीछे खड़ा है, चाहे वो बोल न रही हो।"
और मैं भागा।
गली में उस वक़्त दस बजकर कुछ मिनट हुए थे। धूप सिर पर थी और पत्थरों से लौटकर आ रही थी। मैं नंगे पाँव जैसा दौड़ा — चप्पल पीछे छूट गई थी, मुझे याद भी नहीं कब। नाली के ऊपर का पत्थर का पुल, उस्ताद की दुकान का बंद शटर, शबनम आपा की गुमटी पर रखी बेंच, भोला भाई की दुकान — सब पीछे छूटते गए।
और जैसे-जैसे मैं अस्पताल के पास पहुँचा, एक आवाज़ सुनाई देने लगी।
मशीन की आवाज़।
वो लंबी, कर्कश, धातु को चीरती हुई आवाज़ — जैसे कोई बड़ी चीज़़ ईंट को चबा रही हो। और उसके नीचे दूसरी आवाज़ — लोगों की।
मैं गली के मुँह पर पहुँचा और रुक गया।
अस्पताल के गेट पर भीड़ थी।
सिर्फ़ चार-पाँच नहीं। बीस-पच्चीस लोग। कोई बैठा था ज़मीन पर, कोई सीढ़ी पर झुका था, कोई खड़ा था हाथ में पुरानी पर्ची दबाए। वही बूढ़ी औरत जिसकी बहू का इलाज तीन महीने से यहाँ चल रहा था — वो अपनी पुरानी पर्ची सीने से लगाए खड़ी थी। वही आदमी जिसके कंधे पर बच्चा सो रहा था — वो बच्चे को और कसकर पकड़े हुए था, जैसे भीड़ में कोई उसे छीन लेगा।
और सबकी नज़रें एक ही जगह थीं।
अस्पताल की सीढ़ी पर।
वहाँ, जहाँ कल तक पुराना पत्थर दिखता था, अब एक बड़ा नीला बोर्ड लगा हुआ था। चमकदार। एकदम नया। सफ़ेद अक्षरों में कुछ लिखा था, और मैंने पढ़ा — भारद्वाज कंस्ट्रक्शन। नई शुरुआत, नए सपने।
और नीचे छोटी लाइन में — यह स्थान अब गली के विकास के नाम।
मेरे पेट में कुछ ऐसा घूमा जैसे कोई चीज़ ऊपर से नीचे गिर गई हो।
डॉक्टर इसरानी सीढ़ी के पास खड़े थे। साठ के पार, सफ़ेद कोट, हाथ में पुराना स्टेथोस्कोप जिसकी नली पर टेप लिपटा था। वो लोगों को समझा रहे थे। कह रहे थे कि घबराने की कोई बात नहीं है, अंदर का काम चलता रहेगा, दवा मिलती रहेगी, कोई मरीज़ पीछे नहीं हटेगा।
पर उनका हाथ काँप रहा था।
मैंने देखा — उन्होंने अपना दायाँ हाथ जेब में डाल दिया, क्योंकि वो काँप रहा था और वो नहीं चाहते थे कि कोई देखे। डॉक्टर साहब जिसकी आवाज़ साठ साल से किसी को डरने नहीं देती, आज अपना हाथ जेब में छिपा रहे थे।
मैं आगे बढ़ा।
"डॉक्टर साहब।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno