The Mysterious Bell – Chapter 361
आठ बजकर पंद्रह पर रेडियो वाले बूढ़े आए, घिसी लाठी टेकते हुए। वो चबूतरी के किनारे बैठ गए, एक शब्द नहीं बोले। मैंने कहा, "काका, आपका क्या सच है?" वो मुस्कुराए और बोले, "मेरा बेटा महीने में दो बार फोन करता है। दो मिनट बात करता है। और मेरे पास दो मिनट में कहने को इतनी बात है कि हफ़्ता निकल जाए। इसलिए मैं चुप रह जाता हूँ।" और उसके बाद वो फिर चुप।
ये सच नहीं था — ये सच का सिर्फ़ किनारा था।
आठ बजकर पैंतालीस पर रमेश भाई और नसीम भाई साथ आए। साथ आना बड़ी बात थी, क्योंकि कल तक ये दोनों नल के पानी पर लड़ रहे थे। पर वो आए, दोनों ने चबूतरी पर हाथ जोड़े, और नसीम भाई ने कहा, "अंकुश, हम दोनों ने सोच लिया है कि हम तेरे साथ हैं। पर सभा में नहीं बोलेंगे।"
"क्यों?"
"क्योंकि बोलने के बाद जो होता है, वो हमें अकेले भुगतना पड़ेगा," रमेश भाई ने कहा। "तेरे पीछे गली है। हमारे पीछे कौन है?"
मुझे यह सवाल पसंद नहीं आया। इसलिए नहीं कि यह झूठा था। इसलिए कि यह सच था।
नौ बजे गली में आधी दुकानें खुली थीं और आधी बंद। और जो खुली थीं, उनके मालिक अपनी दुकान के सामने इस तरह खड़े थे जैसे उन्होंने दुकान नहीं, मोर्चा संभाला हो। चूड़ी वाली बाई अपनी दुकान का सामान अंदर कर रही थीं। साइकिल पुर्ज़ों वाला भाई बाहर निकला ही नहीं। किराने वाले बूढ़े काका ने अपनी बोरी पर हाथ रखकर दूर से मेरी तरफ़ देखा और सिर हिलाया — "कल सुबह आऊँगा" जैसा हिलाया।
और सबसे पहले जो आया, वो कोई बड़ा नहीं था।
चिंटू आया। दौड़ता हुआ, घुटने पर पट्टी लिए, हाथ में पुरानी रिम।
"उस्ताद! उस्ताद! मैं आ गया! और गुड्डू भी आ रहा है, और रफ़ीक़ — रफ़ीक़ की अम्मी ने चारपाई दी है, पर कहा है कि रोटियाँ सूखने के बाद ही लौटाना —"
और मैं वहीं बैठकर हँस पड़ा।
वो हँसी ऐसी थी जो कई घंटों के सूखे के बाद निकलती है, थोड़ी टूटी हुई, पर अपनी।
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नौ बजकर पंद्रह पर शबनम आपा आईं।
वो गुमटी से चली आ रही थीं, और उनके एक हाथ में लोहे की चिमटी थी। चिमटी उस वक़्त भी पकड़ी थी जब कुछ पकाना नहीं था। मुझे लगा कि वो आज चिमटी लेकर आई हैं यह याद दिलाने के लिए कि अगर ज़रूरत पड़ी तो हाथ भी लगा सकती हैं।
"कितने आए?" उन्होंने पूछा।
"गिनती बढ़ रही है," मैंने कहा।
"कितने?"
"अभी नौ।"
"नौ?" उन्होंने चारों तरफ़ देखा। "मुझे आठ दिख रहे हैं।"
"आप नौवीं हैं, आपा।"
वो चुप हो गईं। फिर एक लंबी साँस लेकर चबूतरी पर बैठ गईं, और उन्होंने चिमटी अपने घुटने पर रख दी, जैसे हथियार रख दिया हो।
"अंकुश," उन्होंने धीरे कहा, "मैं तुझे एक बात बताऊँ?"
"बोलिए।"
"मैं पंद्रह साल से अपनी बहन से नहीं बोली हूँ। और सच यह है कि मैं आज सभा में यही बोलने आई थी। पर सुबह उठकर मुझे लगा — क्या फ़ायदा? वो नहीं आएगी, और मैं अपना दर्द सबके सामने रखकर क्या जीत लूँगी?"
"आपा —"
"इसलिए आज सुबह मैंने चूल्हा जलाया और सोचा, आज कोई नहीं आएगा। सब डरेंगे। और मैं भी डरूँगी।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "और अगर मैं डरूँगी, तो तू अकेला बचेगा। इसलिए आई हूँ।"
और तभी टिंकू आगे आया, और उसके हाथ में वो पुरानी पीतल की बाल्टी थी।
"उस्ताद," उसने कहा, "आपकी आवाज़ गली के मुँह तक नहीं जाती। मैं लाया हूँ।"
"ये क्या है?"
"माइक।"
"टिंकू, ये बाल्टी है।"
"बाल्टी ऊपर करके बोलिए। और भीतर से —" उसने हाथ से इशारा किया, जैसे कोई सच में तार खींच रहा हो। "आवाज़ बाहर आएगी।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
वो गंभीर था। पूरा गंभीर।
"टिंकू," मैंने कहा, "मैं तेरे भरोसे पर बाल्टी में बोलूँ, और गली मुझे पागल समझे —"
"आप पहले से पागल हैं, उस्ताद," सानिया ने कहा। "इसमें नया क्या है?"
और चबूतरी पर बैठे लोग — रेडियो वाले बूढ़े, रमेश भाई, चिंटू — सब हँस पड़े।
पहली हँसी। नौ बजे की हँसी। छोटी सी, चार लोगों की, पर उस क्षण मुझे लगा कि गली में हवा फिर से चलने लगी है।
टिंकू बाल्टी लेकर गुमटी की तरफ़ मुड़ा, तो शबनम आपा ने उसे घेर लिया।
"ओए, रुक।"
वो रुका।
"पहले अपनी आवाज़ सुधार," आपा ने कहा। "अभी बाल्टी में बोलेगा तो लगेगा कि गली में बिल्ली रो रही है। और फिर गली की बात कर। तू खड़ा है और गली को उम्मीद दे रहा है — और चलता है फिसलती चप्पल में।"
"आपा —"
"बोलने से पहले साँस ले। जो डरकर बोलता है, उसकी बात सुनने वाले को भी डर लगता है।"
टिंकू ने मुँह बनाया, फिर कुछ नहीं कहा। और मुझे लगा कि आपा ने आज वाकई कुछ सिखा दिया।
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नौ बजकर पच्चीस पर मैं पीपल के नीचे खड़ा था, और मेरे सामने गली थी।
लोग खिड़कियों से झाँक रहे थे। दरवाज़ों की आड़ से देख रहे थे। दुकानों के अंदर से कान लगाए थे। कोई आगे नहीं आ रहा था, पर सब सुन रहे थे — और यही सबसे अजीब बात थी। गली में कान बहुत थे, पैर कम।
गुड्डू आया, हाथ में एक पुराना टाट का टुकड़ा और उस पर पेंसिल से कुछ लिखा हुआ। उसने वो टुकड़ा दोनों हाथों में फैलाया और बड़े नाटकीय अंदाज़ में पढ़ना शुरू किया।
"सूचना! सूचना! सूचना!"
"गुड्डू, ये क्या —"
"चुप रहिए, पढ़ रहा हूँ!"
और उसने पढ़ा — "इस गली के जो भी आदमी आज डरे हुए हैं, वो सब कल सुबह नौ बजे अस्पताल के सामने इकट्ठे होंगे। वहाँ उनका नाम अंग्रेज़ी में लिखा जाएगा, और उन्हें एक-एक कंबल दिया जाएगा, जिसमें छेद होगा, क्योंकि मुफ़्त की चीज़ में छेद तो होता ही है। और जो नहीं आएंगे, उनके नाम पर अंगूठा लगवाया जाएगा। अंगूठा खुद लगाने से अच्छा है, कोई और लगवा ले — दोस्ती है!"
पूरी गली हँस पड़ी।
किराने वाले बूढ़े काका ने दूर से लाठी उठाकर हवा में घुमाई। रमेश भाई की बीवी ने खिड़की से मुँह निकालकर कहा, "गुड्डू, तू तो बड़ा होकर वकील बनेगा!" और गुड्डू ने गर्व से कहा, "बनूँगा तो पता है न, फिर यही नोटिस असली में छपेगा, और नीचे मेरा नाम होगा।"
पर हँसी में भी एक सच्चाई थी।
और मैंने वही सच्चाई उठाई।
"सुनो," मैंने कहा, और अब मैंने आवाज़ नहीं उठाई। धीमे ही कहा। "मैं आज सबको डराने नहीं आया। मुझे इतना पता है कि आज सुबह कोई मेरे पास नहीं आएगा। और आने वालों की भी ज़ुबान नहीं खुलेगी। पर एक बात सुन लो, और सुनकर भूल जाओ, कोई ज़बरदस्ती नहीं है।"
गली चुप हो गई।
"आप सब कहते हैं कि ये अस्पताल सिर्फ़ इमारत है। ईंट है, प्लास्टर है, दो मंज़िल हैं। टूटेगी तो नई बनेगी।" मैंने पीपल के तने पर हाथ रखा। "पर मैं तुम्हें याद दिला दूँ — उस अस्पताल में गली के कितने बच्चों की पहली साँस चली है? चिंटू, तेरी अम्मी ने कहा था न कि तू वहीं पैदा हुआ? रमेश भाई, तेरी बीवी के ऑपरेशन के बाद पहला शुक्रिया किसने कहा था? डॉक्टर इसरानी ने। और वो डॉक्टर इसरानी किस काग़ज़ पर लिखे हैं? किस काग़ज़ की मोहर ने उन्हें आज सीढ़ी बंद करने का हुक्म दिया?"
किसी ने कुछ नहीं कहा।
"मैं आपसे जंग का नहीं कह रहा। मैं आपसे यह नहीं कह रहा कि रणवीर के काग़ज़ों से लड़ो। मैं सिर्फ़ यह कह रहा हूँ — दस बजे पीपल के नीचे आ जाओ। बोलो नहीं, बैठ जाओ। सिर्फ़ बैठने से किसी का अंगूठा नहीं लगता।"
और फिर वो बात आई, जिसका मुझे डर था।
चूड़ी वाली बाई ने अपनी खिड़की से कहा, और उनकी आवाज़ में एक अजीब थकान थी, जो गुस्से से ज़्यादा चुभती है।
"अंकुश, तू सच कह रहा है। पर सच से पेट नहीं भरता। रणवीर के काग़ज़ से लड़ना आसान नहीं। मेरे दुकान के काग़ज़ भी उसी दफ़्तार से आए हैं। मैं जानती हूँ कि मेरी दुकान चार दिन में बंद हो सकती है। मेरा बेटा कहता है — अम्मी, चुप रहो। तो मैं चुप हूँ।"
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