The Mysterious Bell363 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 363

7 min read November 5, 2026

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। और उनकी आँखों में मैंने वो चीज़ देखी जो मैंने पहले कभी नहीं देखी — शर्म। जैसे वो मुझसे यह कह रहे हों कि बेटा, माफ़ करना, ये इमारत मैं बचा नहीं पाया।

"अंदर आ," उन्होंने धीमे से कहा। "जल्दी।"

"क्या हुआ?"

"पीछे आ।"

हम अस्पताल के भीतर के गलियारे से होकर पीछे गए। और वहाँ जो मैंने देखा, मेरा मुँह सूख गया।

पिछली दीवार।

जिस दीवार से कल वो लोहे जैसी मोटी चीज़ बाहर आ रही थी — आज उस दीवार की लोहे की चादरें खुली पड़ी थीं, उखड़ी हुई, ज़मीन पर गिरी हुई। दो मज़दूर वहाँ खड़े थे, हाथों में लोहे के लंबे पत्ते, और उनके पीछे एक और आदमी — दुबला, काग़ज़ों का बंडल हाथ में, जेब पर नीली गोल मोहर।

मनोज।

वो मुड़ा और मुझे देखकर मुस्कुराया। न वो हँसी जिसमें मज़ाक हो, न वो जिसमें गुस्सा। सिर्फ़ वो मुस्कान जो कहती है कि तुम अब भी यहाँ खड़े हो।

"अंकुश भाई," उसने कहा। "सुबह बहुत जल्दी आ गए।"

"बोर्ड दस बजे लगना था।"

"लग गया तो।" उसने कंधे उचकाए। "काम जल्दी हो गया। अच्छी बात है ना?"

"तुमने पीछे की दीवार क्यों उखाड़ी?"

"ये दीवार असुरक्षित है," उसने काग़ज़ की तरफ़ इशारा किया। "रिपोर्ट में साफ़ लिखा है। हम तो मरम्मत कर रहे हैं, भाई। गिरने से पहले।"

तभी पीछे से मशीन की आवाज़ आई — दूर से, प्लॉट की तरफ़ से। वो धातु चबाने वाली आवाज़। और मनोज ने वो सुनी तो उसकी आँखों में वो चमक आई जो मुझे पसंद नहीं थी।

"वो क्या है?" मैंने पूछा।

"मशीन है। सुबह सात बजे वाली।" उसने काग़ज़ समेटा। "थोड़ा आगे बढ़ा दिया। साहब का काम रुकने वाला नहीं, अंकुश भाई। कभी नहीं रुका।"

"मनोज।"

"हाँ?"

"तू अभी भी उस आदमी के पीछे खड़ा है, जिसने तेरे बाप को…" मैंने कहा, फिर रुक गया, क्योंकि मुझे मनोज का बाप नहीं पता था। मैंने सिर्फ़ अपनी बात कहने के लिए कुछ गढ़ लिया था और मुझे तुरंत पता चल गया कि मैंने गलती की।

मनोज ने मेरी तरफ़ देखा। और उसकी मुस्कान थोड़ी पतली हो गई।

"तू मेरे बारे में कुछ नहीं जानता," वो धीमे से बोला। "और यही तेरी सबसे बड़ी कमज़ोरी है, भाई। तू सबको अपनी तरह ईमानदार समझता है।"

वो मुड़ा और चल दिया।

और मैं वहीं खड़ा रह गया, दीवार के उस उजाड़ स्थान के सामने, जहाँ से प्लॉट की धूल अंदर आ रही थी और मेरे जूतों पर बैठ रही थी।

तभी घंटी बोली।

"अब काग़ज़ नहीं।"

मैंने जेब में हाथ डाला।

"अब काग़ज़ नहीं," उसने दोहराया। "काग़ज़ नकल है। जा।"

और मैं समझ गया।

मैं भागा — अस्पताल के गलियारे से, गेट से, भीड़ को चीरते हुए। पीछे डॉक्टर इसरानी की आवाज़ आई कि अंकुश, सुन, पर मैं रुका नहीं। वही बूढ़ी औरत मेरा हाथ पकड़ने को आई, और मैंने पीछे मुड़कर सिर्फ़ इतना कहा — "आंटी, दो मिनट। बस दो मिनट।"

मैं अस्पताल के पीछे की गली से होकर दवा की दुकान की तरफ़ गया।

सकीना दवा भंडार।

वो दुकान जो बरसों से बंद दिखती थी। जिसका पुराना बोर्ड धूप में पीला पड़ चुका था। जिसके सामने से लोग गुज़रते थे और अंदर की तरफ़ देखते भी नहीं थे, क्योंकि बंद दुकान देखने में किसी को क्या मिलता है।

आज वो दुकान खुली थी। पर उस तरह नहीं जैसे कल खुली थी।

शटर आधा गिरा हुआ था।

और मैंने शटर के नीचे झुककर अंदर देखा तो मेरा दिल धक् से रह गया।

सामान बिखरा था।

लोहे की छोटी कुर्सी उलटी पड़ी थी। पीतल का उतरा हुआ तराज़ू ज़मीन पर गिरा था, एक पलड़ा अलग। शेल्फ से दो डिब्बे गिरे थे, और उनकी धूल फ़र्श पर सफ़ेद परत बनाकर बैठ गई थी।

और सकीना बी।

वो ज़मीन पर बैठी थीं। पीठ दीवार से टिकी, घुटने सीने से लगे, दुपट्टा सर से खिसककर कंधे पर आ गया था। उनके हाथ काँप रहे थे, और वो काँपते हाथों से अपने दुपट्टे का किनारा बार-बार सीधा कर रही थीं — जैसे अगर वो किनारा सीधा हो गया, तो सब ठीक हो जाएगा।

मैं शटर के नीचे झुककर अंदर गया।

"सकीना बी।"

उन्होंने सिर उठाया। और उनकी आँखें देखकर मुझे ऐसा लगा जैसे कोई मुझे सीने पर मुक्का मार दे।

"आ गए," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ दरार पड़ी थी। "मैं सोच रही थी कि तू आएगा या बस काग़ज़ लेने आता था।"

"बी, क्या हुआ? किसने किया?"

वो कुछ नहीं बोलीं।

मैंने टिन का बक्सा देखा।

वो खुला था। ढक्कन एक तरफ़ गिरा पड़ा था और उसके किनारे पर ज़ंग की भूरी परत छूट रही थी। बक्से के अंदर काग़ज़ बिखरे थे, कुछ फटे थे, और वो लाल कपड़े में लिपटा बंडल — वो वहीं पड़ा था, कपड़ा खुला, अंदर से कुछ गायब।

"बी।" मैं उनके पास बैठ गया। घुटनों के बल। "बी, मेरी तरफ़ देखिए।"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।

"वो आया," उन्होंने कहा। "दो आदमी थे। एक तो बाहर खड़ा रहा। और एक अंदर आया। सफ़ेद कुर्ता, बाल साफ़, जूते चमकते हुए — इतने चमकते कि मुझे लगा ये धूल में चलकर आया ही नहीं।"

"क्या कहा उसने?"

"कुछ नहीं कहा। सीधा आया। मैंने कहा, ये दुकान बंद है, बेटा। उसने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं। उसने बक्से को इस तरह खोला जैसे उसे पता था कि कहाँ रखा है।"

मेरे रोंगटे खड़े हो गए।

"उसे पता था?"

"उसे पता था," सकीना बी ने कहा। "अंकुश, वो सीधा बक्से तक गया। जैसे कोई अपनी ही अलमारी खोलता है।"

"और फिर?"

"उसने वो पीला काग़ज़ निकाला। जो मैंने तुझे दिखाया था। जिस पर आधी मोहर थी। और…" वो रुकीं। "और उसने उसे देखकर हँसा।"

"हँसा?"

"बोला — बी, ये नकल है। तुमने असली कभी देखा भी है?" सकीना बी ने अपने दुपट्टे का किनारा मुट्ठी में भींच लिया। "और मैं… मैं कुछ नहीं बोली। मैं बैठी रह गई। मेरा हाथ उठा ही नहीं।"

उनकी आवाज़ टूट गई।

"मैं डर गई, अंकुश। बाईस साल बाद भी वो नाम सुनकर मैं डर गई।"

मैंने उनका हाथ पकड़ा। उनका हाथ बर्फ़ जैसा ठंडा था।

और फिर मुझमें कुछ हुआ।

मुझे गुस्सा आना चाहिए था। मुझे उस आदमी के बारे में सोचकर गुस्सा आना चाहिए था, जो एक बूढ़ी औरत की बंद दुकान में घुसकर उसके बक्से खोल रहा था। पर मुझे गुस्सा नहीं आया।

मुझे शर्म आई।

क्योंकि वो औरत मेरे लिए, मेरी गली के लिए, मेरे पापा के लिए बाईस साल से डर के सामने चुप बैठी थी — और मैं आज सुबह चबूतरी पर बैठकर यह सोच रहा था कि लोग क्यों नहीं बोलते।

लोग नहीं बोलते, अंकुश, क्योंकि बोलने की एक क़ीमत होती है। और वो क़ीमत हर किसी के पास नहीं होती।

मैंने उनकी तरफ़ देखा और धीमे से कहा, "बी, मुझे माफ़ कर दीजिए।"

उन्होंने सिर उठाया।

"क्या?"

"मैंने आपसे कल यही कहा था कि आपको काग़ज़ दे देना चाहिए, सभा में लाना चाहिए।" मैंने गला साफ़ किया। "मैंने आपसे वो माँगा जो आपके पास नहीं था। हिम्मत। मैंने सोचा कि हिम्मत कोई चीज़ है जो माँगने से मिल जाती है। वो नहीं मिलती। वो बनती है। और वो मैंने आपके लिए नहीं बनाई।"

सकीना बी ने मेरी तरफ़ देखा। और उनकी आँखों में पानी आ गया।

"तू अजीब लड़का है," उन्होंने कहा। "मेरी दुकान टूटी पड़ी है और तू अपनी माफ़ी माँग रहा है।"

"माफ़ी माँगने से दुकान नहीं जुड़ती," मैंने कहा। "पर इससे यह तो पता चलता है कि हम दोनों एक ही तरफ़ हैं।"

वो हँसीं। छोटी, फटी हुई हँसी, पर हँसी।

"अब सुनो," मैंने कहा। "उसने क्या लिया?"

"वो पीला काग़ज़। जो उसने नकल बताया।"

"और कुछ?"

"और…" उन्होंने बक्से की तरफ़ देखा। "और वो लाल कपड़े में लिपटा बंडल छूने ही वाला था कि बाहर वाले ने उसे आवाज़ दी। और वो चला गया।"

"बाहर वाले ने क्या कहा?"

सकीना बी ने आँखें बंद कीं, जैसे वो बात फिर से सुन रही हों।

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho