The Mysterious Bell – Chapter 353
मैं हँसता रहा, मज़ाक करता रहा, अपनी पुरानी साइकिल पर निकलता रहा, और मुझे लगा कि मेरा घर मेरे बस में है। और वो एक बूढ़ी औरत बाईस साल से एक जंग लगे डिब्बे में बैठी थी, जो जानती थी कि अगर मैं आज भी नहीं आया, तो यह काग़ज़ उसके साथ ही जाएगा।
"बी," मैंने कहा। "एक बात पूछूँ?"
"पूछ। आज रात तू कुछ भी पूछ सकता है।"
"जब पापा पाँच साल पहले वो अंगूठा लगा रहे थे, तो वो इस डिब्बे को याद करते होंगे?"
सकीना बी ने मेरी तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर कुछ बदला।
"पाँच साल पहले?" उन्होंने पूछा। "कौन सा अंगूठा?"
"मेरी माँ के इलाज के लिए। रणवीर के दफ़्तार में।"
उन्होंने ढक्कन बंद किया। धीरे से, बहुत धीरे से, जैसे किसी मरीज़ की आँखें बंद कर रही हों।
"बेटा, मुझे उस अंगूठे का पता नहीं," उन्होंने कहा। "पर मैं इतना जानती हूँ कि जिस आदमी ने अपना अंगूठा एक बार किसी के काग़ज़ पर लगवा दिया, वो उम्र भर काग़ज़ों से डरता है। और तेरे पापा उस रात से ही डरने लगे थे। जो बात मैंने देखी — वो यह कि वो उस सुबह से इस गली में किसी से भी सीधी नज़र नहीं मिलाते थे। मुझसे भी नहीं।"
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी वहाँ गरम थी, जैसे कोई उसे बहुत देर से पकड़े हुए बैठा हो और अब मुट्ठी खोल दी हो।
टिन।
"क्या?" मैंने धीरे से कहा।
"अब तुझे पता है।"
"क्या पता है?"
"जो दिया, वो तेरे घर का है।"
और वो चुप हो गई।
मैंने काग़ज़ को अपनी गोद में रखा और उसके कटे कोने पर उँगली फेरी। आधी मोहर। आधा सच। बाईस साल से यह काग़ज़ अपने ही धब्बे के नीचे छिपा बैठा था, और सक्सेना के पास जो काग़ज़ घूम रहा था, वो इसका जुड़वाँ था — पर झूठा जुड़वाँ, जिसने अपने भाई का आधा चेहरा उतारकर अपने चेहरे पर चिपका लिया था।
"बी," मैंने कहा। "मुझे यह काग़ज़ चाहिए।"
वो झटके से मेरी तरफ़ देखने लगीं, और उनकी आँखों में वो पुराना डर लौट आया, जो बाईस साल से इस दुकान में बंद था।
"नहीं।"
"बी —"
"नहीं, बेटा।" उन्होंने डिब्बा अपनी छाती से लगा लिया, जैसे कोई उनसे उनका बच्चा छीन रहा हो। "यह डिब्बा मेरे पास रहेगा। मैंने कसम निभाई है, तो आख़िर तक निभाऊँगी। तेरे पापा ने कहा था, जिस दिन तेरा बेटा खुद पूछेगा। वो आज आ गया, मैंने उसे सब दिखा दिया। बस। अब यह काग़ज़ यहीं रहेगा।"
"पर बी, कल सुबह दस बजे —"
"मैंने सुना है।" उनकी आवाज़ सख़्त हो गई। "बोर्ड लगेगा। दीवार गिरेगी। दुकानें बिकेंगी। बेटा, बाईस साल में मैंने उस गली में कितने बोर्ड लगते देखे हैं, कितने शटर गिरते देखे हैं। यह काग़ज़ मेरे हाथ में है तो एक चीज़ बची है। अगर यह तेरे हाथ में गया और रास्ते में कहीं खो गया, तो सब खत्म।"
"मैं इसे खोने नहीं दूँगा।"
"तू क्या जानता है खोने का?" उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ अचानक भर आई। "मैंने एक रात में सब खोया था। और जिस रात सलीम गए, उस रात मैंने डॉक्टर का दरवाज़ा खटखटाया था। वो जाग रहे थे, मैंने देखा था, उनकी खिड़की में बत्ती जल रही थी। और वो नहीं आए। दस कदम की दूरी थी, बेटा। दस कदम।"
दुकान में फिर चुप्पी।
मैंने कुछ नहीं कहा। उस वक़्त कुछ कहना ग़लत होता। कुछ दर्द ऐसे होते हैं जिनके सामने तर्क एक छोटा बच्चा बन जाता है।
वो रोईं — पूरे गले से नहीं, चुपचाप, ऐसे जैसे सालों की आदत हो। उन्होंने दुपट्टे का कोना आँखों पर रखा और उसी में बोलती रहीं।
"और वो डॉक्टर आज भी वहीं बैठते हैं। मैं उनकी गली से गुज़रती हूँ तो आँख नीची कर लेती हूँ। एक बार वो मुझे देखकर रुके थे। मैं भाग गई थी।" उन्होंने दुपट्टा नीचे किया। "तू कहता है मैं काग़ज़ दू"तू कहता है मैं काग़ज़ दूँ?" उन्होंने दुपट्टा नीचे किया और मेरी तरफ़ देखा। "तो पहले मेरी एक बात का जवाब दे। तू उस रात वहाँ था?"
"कौन सी रात, बी?"
"जिस रात सलीम गए।"
मैं चुप हो गया।
"नहीं," मैंने धीरे से कहा। "मैं तो पैदा भी नहीं हुआ था, बी।"
वो हँसीं — एक छोटी, टूटी हुई हँसी, जो गले से निकली और बीच में ही रुक गई।
"हाँ," उन्होंने कहा। "तू पैदा भी नहीं हुआ था। और तेरे पापा पैदा हो चुके थे। पच्चीस साल के थे। उस रात वो भी यहीं थे। इसी दुकान पर।"
मेरे हाथ से टिंकू का दिया हुआ चश्मा छूटते-छूटते बचा। मैंने उसे मेज़ पर रख दिया।
"पापा यहाँ थे?"
"सलीम के साथ पीछे वाले कमरे में बैठे थे। दोनों पंद्रह साल की बातें कर रहे थे, जैसे कोई बात खत्म नहीं होती।" उन्होंने दुपट्टे को हथेली में भींचा। "मैं ऊपर थी। हमारा कमरा ऊपर था उस वक़्त। मुझे खाँसी की आवाज़ आई, फिर दरवाज़ा खुलने की। मैं नीचे आई, तो सलीम जा चुके थे। तेरे पापा खड़े थे, उनके हाथ में एक काग़ज़ था। मैंने पूछा कि क्या हुआ, तो उन्होंने कहा — मुझे जल्दी है, भाभी, बाद में आता हूँ। और वो सीधे डॉक्टर साहब के घर की तरफ़ भागे।"
"और सलीम भाई?"
"उन्हें डॉक्टर साहब के दरवाज़े तक पहुँचना था। वो वहीं गिरे।" उनकी आवाज़ सपाट हो गई, जैसे सालों में उन्होंने इस वाक्य को इतनी बार दोहराया हो कि अब उसमें सिर्फ़ तथ्य बचा है, दर्द नहीं। "तेरे पापा लौटकर आए, होश में नहीं थे। उन्होंने मुझे बताया कि उन्होंने शोर सुना, बाहर आए, तो सलीम सीढ़ी पर गिरे थे। उन्होंने उनका सिर उठाया, पानी माँगा, पर तब तक —"
वो रुक गईं।
"डॉक्टर साहब की खिड़की में बत्ती जल रही थी। तेरे पापा ने दरवाज़ा खटखटाया। दो बार, तीन बार। मैं खुद वहाँ गई, बेटा। मैंने खुद अपनी आँखों से देखा कि उनकी बत्ती जल रही थी — और कुछ देर बाद बुझ गई।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"पर डॉक्टर साहब आज कहते हैं कि उन्हें नहीं मालूम था —"
"वो आज कुछ भी कहें," उन्होंने मेरी बात काट दी, और अब उनकी आवाज़ में सिर्फ़ दर्द नहीं, गुस्सा था। "बाईस साल में उन्होंने एक बार मेरी तरफ़ देखा। एक बार कहा होता कि सकीना, माफ़ कर दो, मैंने डर से दरवाज़ा नहीं खोला — तो मैं आज भी उनको भगवान मानती। पर उन्होंने कभी नहीं कहा। बस दीवारें पीली करवा लीं, ताकि अंदर से कुछ न दिखे।"
मैंने सिर झुका लिया।
मैं उस वक़्त उन्हें कुछ बताना चाहता था। कि डॉक्टर साहब ने आज मुझे खुद यह बात बताई थी। कि वो उस रात के बाद कभी सलीम भाई की आवाज़ नहीं सुन पाए, हर खाँसी में उनकी आवाज़ सुनते रहे। कि उन्होंने अपने आप को सज़ा दी — पर कभी उनसे माफ़ी नहीं माँगी, क्योंकि उन्हें लगा कि माफ़ी माँगने का हक़ उनके पास नहीं।
पर अभी वो वक़्त नहीं था।
अगर मैं अभी डॉक्टर साहब की तरफ़ से बोलता, तो सकीना बी को यही लगता कि मैं उनके साथ मिलकर उनसे काग़ज़ माँगने आया हूँ। और वो दरवाज़ा हमेशा बंद कर देतीं।
मैंने कुछ और कहा।
"बी," मैंने कहा, "मैं काग़ज़ लेने नहीं आया।"
उन्होंने झटके से देखा।
"मैं सच जानने आया था। और सच तो तुमने मुझे दे दिया।" मैंने मेज़ पर रखा चश्मा उठाकर सीधा किया। "अब यह काग़ज़ तुम्हारे यहीं रहेगा। मैंने उसे छुआ भी नहीं।"
कुछ पल के लिए कमरे में सिर्फ़ पुरानी दुकान की महक रह गई — कपूर, सीलन, सूखी दवा, और पीछे के कमरे से आती चूहों की खिसकती आवाज़।
फिर सकीना बी ने बक्सा धीरे से नीचे रखा।
अभी भी उनका हाथ उसके ढक्कन पर था, पर उनकी उँगलियाँ थोड़ी ढीली pad गई थीं।
"तू अजीब लड़का है," उन्होंने कहा। "तेरे पापा भी अजीब आदमी थे।"
"इसी बात पर सब मोहल्ला हमें पसंद करता है, बी।"
उन्होंने मुझे घूरकर देखा। फिर एक हल्की सी मुस्कान आई उनके होंठों पर, ऐसी जैसे बरसों के अंधेरे में पहली बार तेल का एक दीया जला हो।
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