The Mysterious Bell – Chapter 352
काग़ज़ पीला था। इतना पीला कि लगता था उसने सारा रंग अपनी उम्र में खर्च कर दिया। किनारों पर उँगली लगाते ही लगा कि वो अब काग़ज़ नहीं, सूखा पत्ता है।
"खोल," उन्होंने कहा। "अब खोल। देर हो गई है।"
मैंने उसे खोला।
ऊपर की तीन लाइनें मोटी नीली स्याही में लिखी थीं, और लिखने वाले का हाथ काँप रहा था, या शायद बूढ़ा था, या दोनों।
"यह ज़मीन जिस पर नूर अस्पताल खड़ा है, इस गली के लोगों ने मिलकर दी है। जिन्होंने दी, उनके नाम नीचे हैं। शर्त यह है कि यह ज़मीन कभी बिकेगी नहीं, कभी गिरवी नहीं रखी जाएगी, और जब तक इस गली का एक भी आदमी इलाज के लिए यहाँ आता है, अस्पताल का दरवाज़ा बंद नहीं होगा।"
मेरी आँखें नीचे सरकीं।
"जिस दिन यह शर्त टूटेगी, ज़मीन उन्हीं के बच्चों की हो जाएगी जिन्होंने दी थी। और जिसने शर्त तोड़ी, उसका नाम इस गली में नहीं लिया जाएगा।"
नीचे नामों की दो कतारें थीं। मैंने उँगली से पढ़ा। पहला नाम — नूर मोहम्मद। दूसरा — बंसीधर। तीसरा — निसार। चौथा — कलीम। पाँचवाँ — रामदीन। छठा — जगदीश यादव।
मेरी उँगली वहीं रुक गई।
मैंने उस नाम को दो बार पढ़ा। फिर तीसरी बार। फिर मैंने आँखें बंद कर लीं।
"तेरे दादा," सकीना बी ने कहा। "हाँ। उन्होंने भी ज़मीन में हिस्सा दिया था। दो हज़ार रुपये और साइकिल वाली ज़मीन का एक कोना। तेरे दादा उस वक़्त गली के सबसे भरोसेमंद आदमी थे। मेरे सलीम उन्हें अपने बड़े भाई जैसा मानते थे।"
मैंने काग़ज़ को अपनी गोद में रखा और पहली बार ध्यान दिया कि उसका ऊपर का दायाँ कोना फटा हुआ है। फटा नहीं — काटा हुआ। सीधी कैंची या चाकू से। और ठीक उसी कटे हिस्से पर, थोड़ा सा, पुरानी नीली मोहर का आधा हिस्सा बचा था। इतना आधा कि पढ़ा न जाए, बस यह पता चले कि वहाँ कुछ था।
"यह कौन काट गया?" मैंने पूछा।
"अकेले काग़ज़ नहीं कटा था, बेटा।" सकीना बी ने धीरे से कहा। "उस रात उस काग़ज़ की एक नकल बनी थी। दो लोगों ने मिलकर बनाई थी — मेरे सलीम और एक काग़ज़ों वाला आदमी, जो उस वक़्त भारद्वाज के दफ़्तर में काम करता था। नकल में सब कुछ था, सिर्फ़ मोहर नहीं थी।"
"तो?"
"तो उन्होंने कहा कि यह काग़ज़ भारद्वाज के दफ़्तर में सुरक्षित रहेगा। असली को संदूक में रखो, नकल दफ़्तर की तिजोरी में।" उन्होंने अपना दुपट्टा ठीक किया। "मेरे सलीम को शक हुआ। उसने आधी रात को अपने हाथ से असली काग़ज़ का वो कोना काटा जिस पर मोहर थी, और कटा कोना नकल के साथ दफ़्तर भेज दिया, ताकि नकल असली जैसी दिखे। असली काग़ज़ के पास मोहर का आधा हिस्सा रह गया, और दफ़्तार के पास मोहर का आधा हिस्सा।"
"आधा सच, आधा झूठ," मैंने धीरे से कहा।
"अब समझा?" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "जो काग़ज़ सक्सेना तेरे सामने लहराता है, वो नकल है। उस पर असली मोहर का आधा हिस्सा चिपका है। इतना काफ़ी है कि अदालत में दो महीने लग जाएँ, और दो महीने में पूरी गली खाली हो जाए।"
"और असली?"
"असली उसी रात खत्म हो गया," उन्होंने कहा। और उनकी आवाज़ ऐसी हो गई जैसे किसी ने गला हल्का दबा दिया हो।
"कैसे?"
वो चुप बैठी रहीं। लालटेन की लौ के सामने उनका चेहरा पीला पड़ता जा रहा था। और फिर उन्होंने वो कहा जो मैंने अपने पूरे जीवन में कभी सोचा भी नहीं था।
"उस रात मेरे सलीम कोई चीज़ दफ़्तार नहीं भेज रहे थे। वो काग़ज़ अपने सीने से चिपकाए हुए घर आए, काँपते हुए, और बोले — बी, आज रात भारद्वाज के आदमी इस दुकान तक आएँगे। मेरे हाथ में यह काग़ज़ नहीं रह सकता। इसे किसी ऐसे आदमी को देना है जिसके हाथ साफ़ हैं, जो औज़ार जानता है, जिसके घर की दीवारें गली की दीवारों जैसी हैं।"
मेरी साँस रुकी।
"और बेटा," उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, "उस रात मेरे सलीम ने वो काग़ज़ जिसके हाथ में दिया, वो कोई और नहीं थे। तेरे पापा थे। शंकर यादव।"
दुकान में इतनी चुप्पी बैठ गई कि लालटेन की लौ की आवाज़ सुनाई देने लगी।
मैंने मुँह खोला, पर कुछ नहीं निकला। मुझे लगा ज़मीन मेरे पैरों के नीचे से थोड़ी सरक गई है। सिर्फ़ थोड़ी — पर सरकी है।
"मेरे पापा?" मैंने कहा। आवाज़ बहुत छोटी निकली।
"हाँ। और वो तो काग़ज़ लेकर उसी रात वापस भी आए।" सकीना बी ने मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया, जैसे मुझे सँभालना हो। "आधी रात से पहले। चेहरा पसीने में डूबा हुआ, हाथ काँपते हुए। उन्होंने कहा — बी, मेरे घर का ताला कच्चा है। मेरे घर में दो बच्चे सो रहे हैं। अगर भारद्वाज के आदमी मेरे घर पर काग़ज़ ढूँढ़ने आए, तो मेरा बेटा पूछेगा कि ये क्या है, और मैं उसे क्या जवाब दूँगा?"
मैंने आँखें नीची कर लीं। मेरे गले में कुछ ऐसा अटका जो न नीचे उतर रहा था, न ऊपर आ रहा था।
"उन्होंने वो काग़ज़ मेरे हाथ में रखा," सकीना बी बोलीं, "और अपने ही हाथ से इस डिब्बे में रखा, और ढक्कन बंद करके उस पर हाथ रख दिया। और फिर उन्होंने मुझसे वो कसम ली जो मैंने आज तक नहीं तोड़ी।"
"क्या कसम?"
वो मेरी तरफ़ देखने लगीं। उनकी आँखों में पानी था, पर वो बह नहीं रहा था। इतने सालों से रोका हुआ पानी आसानी से नहीं बहता।
"तेरे पापा ने कहा — बी, यह काग़ज़ मेरे हाथ में नहीं रह सकता, क्योंकि मेरे हाथ पर पहले से एक अंगूठा है जो मैंने लगाया था। अगर मैं यह काग़ज़ खुद लेकर बाहर आया, तो दुनिया कहेगी कि शंकर यादव ने झूठा काग़ज़ बनाया और अपना पीछा साफ़ किया।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। "कौन सा अंगूठा?"
"वो मुझे नहीं बताया। सिर्फ़ इतना कहा कि एक दिन उसका बेटा खुद जानेगा। और जब वो जानेगा, तो पहली बात मुझसे पूछेगा, उससे नहीं।" उन्होंने डिब्बे का ढक्कन उँगली से सहलाया। "और फिर उन्होंने यह कसम ली, बेटा। यही वो कसम है जिसने बाईस साल तक मेरी दुकान का शटर बंद रखा।"
"क्या कसम, बी?"
"तेरे पापा ने कहा — बी, उस दिन तक यह काग़ज़ किसी को मत देना, जिस दिन मेरा बेटा अंकुश खुद इस दुकान पर आकर तुमसे पूछे कि सच क्या है। उससे पहले नहीं। मुझसे भी नहीं। अपने आप से भी नहीं।"
मेरे हाथ काँपने लगे।
"मैंने कहा — शंकर, ये तेरा बेटा है। ये कभी नहीं आएगा, क्योंकि इसे कभी पता नहीं चलेगा कि कुछ गुम हुआ है। तो उन्होंने कहा — तो फिर यह काग़ज़ बंद ही रहे। बी, मेरा बेटा जब आए, तब आए। मेरी ज़ुबान से सच सुनकर नहीं आएगा। वो खुद खोजकर आएगा, और जब आएगा, तो तू उसे सब दे देना, और एक बात कहना।"
"क्या बात?"
"यह कहना," उन्होंने धीरे से कहा, "कि उसका पापा डरपोक आदमी था, पर झूठा नहीं था।"
मैंने सिर नीचे कर लिया।
लंबी देर तक कोई कुछ नहीं बोला।
टिंकू दरवाज़े पर खड़ा था, इस कदर चुप कि मुझे लगा वो अंदर आ गया है। मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें बड़ी थीं, और मैंने उसकी तरफ़ देखकर सिर हिलाया कि सब ठीक है — हालाँकि सब ठीक नहीं था।
मेरे अंदर एक बात बन रही थी और मैं उसे हज़म नहीं कर पा रहा था।
मेरे पापा ने उस रात वो काग़ज़ अपने हाथ से डिब्बे में रखा था। पूरी बाईस साल वो जानते थे कि असली काग़ज़ कहाँ है। वो हर दिन उस गली से गुज़रते थे, जहाँ वो दुकान बंद पड़ी थी। और मेरे सामने वो ऐसे बैठते थे जैसे उनके पास कुछ नहीं है, जैसे वो सिर्फ़ एक झुकी कमर वाले पुराने मिस्त्री हैं जो अपने औज़ार में खोए रहते हैं।
और मैंने उनसे कभी नहीं पूछा।
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