The Mysterious Bell351 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 351

7 min read November 5, 2026

सकीना बी की दुकान उसी गली में थी, जहाँ बिजलीघर की तरफ़ मुड़ने से पहले एक सिकुड़ा हुआ मोड़ आता है। गली इतनी पतली कि दो आदमी कंधा मिलाकर नहीं निकल सकते। दुकान के ऊपर लकड़ी का बोर्ड टँगा था, जिस पर बड़े अक्षरों में लिखा था — सकीना दवा भंडार। आधे अक्षर बारिश में धुल गए थे, और बाकी आधे पर धूल की ऐसी परत थी कि लगता था बोर्ड भी बीमार है।

शटर जंग खाया हुआ था। नीचे की तरफ़ ज़मीन से उँगली भर की दरार बची थी। उसी दरार से अंदर हल्की पीली रोशनी की एक लकीर बाहर आ रही थी।

मैंने साइकिल साइड में लगाई।

"टिंकू," मैंने धीरे से कहा। "सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू — चारों कहाँ हैं?"

"पीछे आ रहे हैं। सानिया ने कहा था कि वो गली के दोनों मुँह देखेंगे।"

"अच्छा। तो उन्हें यहीं बुला और कह दे कि जब तक मैं इशारा न करूँ, कोई हाँ नहीं करेगा, कोई नाम नहीं लेगा, कोई पूछेगा नहीं, और सबसे ज़रूरी बात — कोई घबराकर भागेगा नहीं। भागने वाला आदमी ही सबसे ज़्यादा शोर करता है।"

टिंकू दौड़कर गया और थोड़ी देर में चारों सायों की तरह आकर दीवार से चिपक गए। सानिया के हाथ में उसकी लाल कवर कॉपी थी, जैसे वो आज भी तारीख़ और वक़्त लिखने आई हो। गुड्डू ने मुझे देखकर बड़ी आँखें बनाईं और फिर अपना मुँह खुद ही हाथ से ढक लिया। मुझे अंदर हँसी आई, पर बाहर नहीं आई।

मैं शटर के सामने गया और खड़ा हो गया।

दो पल मैंने कुछ नहीं किया। सिर्फ़ साँस ली। जिस आदमी ने अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी सच्चाई किसी की चुप्पी में बंद कर रखी हो, उसके दरवाज़े पर खड़े होकर खुद का बहाना ढूँढ़ना पड़ता है। मेरे पास कोई बहाना नहीं था। मेरे पास सिर्फ़ एक औरत की तस्वीर थी — अस्पताल के गलियारे में बैठी, हाथ में तीन महीने पुरानी परची, जिसे कोई पैसा नहीं पूछता।

मैंने शटर पर तीन दस्तकें दीं।

अंदर कोई नहीं हिला।

मैंने फिर दीं।

फिर एक आवाज़ आई। बूढ़ी, रूखी, और डरी हुई। डर अगर बहुत पुराना हो जाए तो आवाज़ से ही पहचाना जाता है।

"दुकान बंद है। जाओ।"

"बी, मैं दवा लेने नहीं आया।"

"दवा नहीं बिकती। कुछ नहीं बिकता। जाओ, बेटा।"

"मैं काग़ज़ भी नहीं माँगने आया।"

अंदर पूरी चुप्पी हो गई। ऐसी चुप्पी जिसमें आदमी को सुनाई देता है कि सामने वाले ने साँस तक रोक ली है।

"मैं कहता हूँ, बी," मैंने शटर से सटकर कहा, "मैं सच पूछने आया हूँ।"

"सच?" उसकी आवाज़ में एक हल्की कड़वी हँसी आई। "सच बहुत पहले बिक गया, बेटा। अब यहाँ सिर्फ़ धूल बची है।"

"तो धूल में से मेरा हिस्सा देदो।" मैंने अपनी आवाज़ धीमी रखी। "बी, आज सुबह डॉक्टर इसरानी ने मुझे अस्पताल के पुराने खाते दिखाए। उसमें एक पन्ना चाकू से कटा हुआ था। उस पन्ने पर एक नाम बचा था — सलीम अहमद।"

अंदर कुछ गिरा। धातु की हल्की आवाज़। फिर कोई बहुत धीरे से, बहुत कोशिश करके बैठा। मैंने शटर की दरार से देखा — अंदर रोशनी के सामने एक साया झुका हुआ था, और उसका एक हाथ ज़मीन पर टिका था।

"बी, मैं आज अस्पताल के गलियारे में आया था। वहाँ एक बूढ़ी औरत बैठी थी, अपनी बहू की परची लिए। तीन महीने से उसका इलाज वहीं चल रहा है। उससे कोई पैसा नहीं पूछता। उसके बगल में एक आदमी बैठा था और उसके कंधे पर एक बच्चा सो रहा था। बी, अगर कल सुबह दस बजे वो बोर्ड लग गया, तो वो औरत भी उसी दिन से चुप हो जाएगी। मुझे बोर्ड की परवाह नहीं। मुझे उस औरत के चेहरे की परवाह है।"

अंदर से कोई जवाब नहीं आया।

"और एक बात," मैंने कहा। "उस कटे पन्ने पर सलीम अहमद के नाम के आगे दो शब्द लिखे थे। कोई बाकी नहीं। बी, जिस आदमी ने अपनी जान की कसम खाकर एक काग़ज़ संभाला था, उसका नाम आज किसी खाते में कोई बाकी नहीं क्यों लिखा है?"

फिर वो हुआ जो मुझे उम्मीद थी, पर जिसके लिए मैं तैयार नहीं था।

शटर के अंदर कुंडी हिली। एक लंबी, खींची हुई आवाज़ आई, जैसे कोई बूढ़ा आदमी ज़ोर लगाकर उठ रहा हो, और फिर शटर उँगली भर ऊपर उठा। उसके नीचे से एक झाँकने की जगह बनी। और उस जगह में एक चेहरा आया।

सफ़ेद दुपट्टा, जिसके किनारे पीले पड़ गए थे। चश्मा, जिसका एक काँटा धागे से बँधा था। माथे पर झुर्रियाँ इतनी गहरी कि लगता था वक़्त उन्हें उँगली से खरोंचकर गया है। और आँखें — बड़ी, पर बुझी हुई। जैसे कोई दीया जल तो रहा हो, पर बहुत देर से।

उन्होंने मुझे देखा। फिर मेरे पीछे खड़े टिंकू को देखा। फिर दीवार से चिपके चारों बच्चों को देखा।

"ये सब कौन हैं?" उन्होंने पूछा।

"ये मेरी टोली है, बी।"

"टोली?"

"हाँ। सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू और ये टिंकू — मेरा शागिर्द।"

टिंकू ने आगे आकर हाथ जोड़ लिए। "नमस्ते बी।"

सकीना बी ने उसे ऊपर से नीचे देखा। फिर कहा, "घुटने पर पट्टी क्यों है?"

"गिर गया था।"

"गिरता है तो पट्टी बाँधता है। अच्छा है।" उन्होंने शटर थोड़ा और ऊपर धकेला। "आ जाओ। पर बत्ती कम है। और बात कम करना। मैं पाँच साल से इस दुकान में किसी को नहीं बैठाया।"

मैं झुककर अंदर गया।

अंदर का मंज़र ऐसा था जैसे कोई सालों पहले का दिन थम गया हो। दीवार पर लकड़ी के शेल्फ़, जिन पर काँच की बोतलें रखी थीं। किसी पर सफ़ेद पाउडर, किसी में सूखी जड़ी-बूटी जो अब सिर्फ़ धूल बन चुकी थी। एक तरफ़ पीतल का तराज़ू, जिसके पलड़े उतर चुके थे। दूसरी तरफ़ लोहे की एक छोटी कुर्सी और उसके सामने लकड़ी का मोड़ा। कोने में एक बड़ा टिन का डिब्बा रखा था, जिस पर उभरा हुआ फूल बना था। उसी के पास एक छोटी लालटेन जल रही थी, जो पूरी दुकान को पीला कर रही थी।

और दीवार पर एक छोटी तस्वीर टँगी थी। काले फ्रेम में, धूल के नीचे, एक आदमी खड़ा मुस्कुरा रहा था। सफ़ेद कुर्ता, सिर पर टोपी, हल्की मूँछें, और हाथ में एक छोटा बक्सा — जैसे किसी दवा का डिब्बा। तस्वीर पुरानी थी, पर आदमी की आँखें आज भी हँस रही थीं।

मैंने उस तस्वीर को देखा और मुझे कुछ कहने की ज़रूरत नहीं पड़ी।

सकीना बी मोड़े पर बैठ गईं और मुझे कुर्सी की तरफ़ इशारा किया। मैं बैठ गया। टिंकू दरवाज़े के पास ही खड़ा रहा, जैसे उसे पता हो कि आज उसे अंदर नहीं, दरवाज़े पर खड़ा रहना है।

"तू शंकर का बेटा है," उन्होंने कहा। यह सवाल नहीं था।

"हाँ।"

"चेहरा नहीं मिलता। हाथ मिलते हैं।" उन्होंने मेरे हाथों पर नज़र डाली, जिन पर ग्रीस के पुराने निशान थे। "तेरे पापा के हाथ भी ऐसे ही थे। जब वो इस दुकान पर आते थे, तो मेरी अलमारी का कब्ज़ा अपने आप ठीक कर देते थे, बिना कहे। मेरे सलीम कहते थे — ये आदमी बोलता कम है, पर हाथ से ज़्यादा बोलता है।"

मैंने कुछ नहीं कहा।

"तू उस काग़ज़ को माँगने आया है," उन्होंने कहा। "सीधी बात कर। मेरी उम्र सवालों में नहीं कटेगी।"

"नहीं, बी। मैं काग़ज़ माँगने नहीं आया।" मैंने उनकी आँखों में देखा। "मैं यह पूछने आया हूँ कि उस रात क्या हुआ था। मुझे काग़ज़ से ज़्यादा उस रात की ज़रूरत है।"

वो कुछ देर मेरी तरफ़ देखती रहीं। फिर उन्होंने लालटेन की लौ छोटी कर दी, जैसे बात बाहर जाने से रोक रही हों। फिर वो उठीं, कोने में गईं, टिन के डिब्बे के पीछे से एक और छोटा डिब्बा निकाला, और उसे अपनी गोद में रखकर मोड़े पर आ बैठीं।

डिब्बा जंग लगा था। ढक्कन पर वही उभरा हुआ फूल था। उन्होंने ढक्कन खोला, तो अंदर से कपूर और पुरानी स्याही की गंध आई। वो कपड़े की एक परत हटाई, फिर दूसरी, और फिर उन्होंने मेरी तरफ़ एक मोटा, तीन बार मोड़ा हुआ काग़ज़ बढ़ा दिया।

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