The Mysterious Bell35 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 35

7 min read November 5, 2026

उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया था। सफ़ेद, जैसे किसी ने उसके चेहरे से खून का आख़िरी कतरा भी खींच लिया हो। उसके होंठ हिल रहे थे, पर आवाज़ नहीं आ रही थी। उसने बेंच का किनारा पकड़ लिया, जैसे कमरा घूम रहा हो।

"भाई?" मोहन ने कहा। "क्या हुआ?"

गिरधारी ने उसकी तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़। उसकी आँखों में जो था, वो गुस्सा नहीं था। वो कुछ और था। वो वो चीज़ थी जो आदमी के चेहरे पर तब आती है जब उसे पता चले कि वो पंद्रह साल से ग़लत आदमी को कोस रहा था।

"वो गली," गिरधारी ने कहा। "पीछे वाली गली। जहाँ उस्ताद की पुरानी दुकान है।"

"हाँ," मोहन ने कहा।

"उस गली में मेरी सब्ज़ी की ठेली खड़ी होती है।"

दुकान में सन्नाटा छा गया।

"पंद्रह साल से," गिरधारी ने कहा, और उसकी आवाज़ टूट गई। "रोज़ सुबह छह बजे। रोज़। उस नीले दरवाज़े के सामने से मैं अपनी ठेली धकेलकर निकलता हूँ। उस दरवाज़े पर लगा ताला मैंने हज़ार बार देखा है। ज़ंग लगा ताला। और मैं हर बार मन में कहता हूँ — देख, यही आदमी तेरे बाप की साइकिल खा गया। और…"

वो रुक गया। उसने अपनी आँखें मींच लीं।

"और वो साइकिल आज भी वहीं है," उसने कहा। "उस ताले के पीछे। और मैं रोज़ उसके सामने से गुज़रता हूँ।"

मेरे हाथ से चाय का कटोरा छूट गया।

वो बेंच पर गिरा, उल्टा हुआ, चाय फैल गई, और टिंकू एक पल में उठकर कपड़ा ले आया। पर मैं नहीं हिला। मैं बस खड़ा रहा और मेरे दिमाग़ में एक ही बात घूम रही थी — पंद्रह साल। पंद्रह साल से ये आदमी रोज़ उस दरवाज़े के सामने से गुज़रता रहा, और अंदर उसका बाप था।

नहीं। अंदर उसका बाप नहीं था। अंदर उसके बाप की साइकिल थी। और मुझे पता है अब तुम सोच रहे होगे कि साइकिल और बाप में क्या फ़र्क़। तुम्हें लगेगा कि दोनों एक ही बात है। पर नहीं है। बाप की साइकिल वो चीज़ होती है जो बाप के जाने के बाद बचती है, और उस पर बैठकर उसका छोटा बेटा स्कूल जाता था। उसी सीट पर। उसी हैंडल को पकड़कर।

और वो सीट पंद्रह साल से अंधेरे में पड़ी थी।

"तूने कभी नहीं बताया," मोहन ने धीरे से कहा। "कि तेरी ठेली वहीं लगती है।"

"तूने कभी पूछा नहीं," गिरधारी ने कहा, और इस बार उसकी आवाज़ में वो कड़वाहट नहीं थी जो सुबह थी। सिर्फ़ थकान थी।

"पंद्रह साल," मोहन ने कहा। "हम दोनों ने पंद्रह साल में एक बार भी ये बात नहीं की कि वो दरवाज़ा किसका है।"

"और मैंने तुझे उस दरवाज़े के सामने से गुज़रते देखा भी नहीं," गिरधारी ने कहा। "क्योंकि तू उस रास्ते से जाना छोड़ बैठा।"

दोनों एक-दूसरे को देख रहे थे, और मैं वहीं खड़ा था, और मुझे लगा कि मुझे अब बोलना चाहिए। कुछ कहना चाहिए। कुछ ऐसा जो दोनों को जोड़ दे। पर मैं चुप रहा। क्योंकि घंटी ने कहा था — आज सिर्फ़ सुनना है।

तो मैं सुनता रहा।

"कितने पैसे थे?" गिरधारी ने पूछा। "जो उसने दिए थे?"

"दो सौ पचास।"

"और तूने कहा कि किसी से उधार लिए?"

"हाँ।"

"और वो दो सौ पचास?"

मोहन ने सिर झुका लिया। "तेरी दवा में लग गए।"

गिरधारी ने कुछ नहीं कहा। उसने बस बेंच पर रखा टूटा पहिया उठाया और अपनी गोद में रख लिया, जैसे कोई बूढ़ा आदमी अपने बच्चे का पुराना खिलौना गोद में रख लेता है।

"ये पहिया ठीक होगा?" उसने पूछा।

"होगा," मैंने कहा।

"कितने पैसे लगेंगे?"

"पहले जुड़ो," मैंने कहा, "फिर हिसाब।"

वो मेरी तरफ़ देखने लगा। "तू पागल है।"

"थोड़ा बहुत हूँ," मैंने कहा। "पर सुनो, भाई साहब, आज जो तुमने कहा, वो मैं किसी को नहीं बताऊँगा। न उस बात को कि तेरी ठेली कहाँ लगती है, न उस ताले को। बस एक बात बताऊँगा।"

"क्या?"

"कि उस गली में एक दरवाज़ा है जिसे खोलना है," मैंने कहा। "और मुझे तुम दोनों में से कोई भी वहाँ अकेले नहीं जाने दूँगा।"

तभी खिड़की के बाहर चार सिर उभरे।

सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू। चारों की आँखें बड़ी, और चारों की साँसें रुकी हुईं, जैसे वो काफ़ी देर से चिपके बैठे हों।

"उस्ताद," सानिया ने फुसफुसाया, "वो सफ़ेद कुर्ते वाले दो आदमी पीछे के प्लॉट पर हैं। दो और ट्रक मिट्टी डालकर गए। और वो बड़ा आदमी उनको कह रहा था कि जल्दी करो, काग़ज़ वाला हफ़्ता ख़त्म हो रहा है।"

मैंने एक गहरी साँस ली।

"ठीक है," मैंने कहा। "तुम लोग घर जाओ।"

"पर उस्ताद…"

"सानिया," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में वो चीज़ थी जो शायद पहले कभी नहीं थी। "तुम चारों ने आज बहुत काम किया है। अब अगला काम घर जाकर अपनी किताबें खोलना है। और जो देखा, किसी को मत बताना। अभी मत बताना।"

वो चारों चले गए, और मैंने देखा कि चिंटू जाते-जाते पलटा और उसने दुकान की तरफ़ हाथ हिलाया, जैसे कोई छोटा सिपाही अपने अफ़सर को सलामी दे रहा हो।

मैंने बेंच के नीचे देखा। वो बैग वहीं पड़ा था। पुराना बैग, जिसकी एक पट्टी टूटी हुई थी और दूसरी सिली हुई थी। वो बैग अब मुझे बैग नहीं लग रहा था। मुझे वो एक बंद दरवाज़ा लग रहा था। और मुझे पता था कि आज रात मुझे वो दरवाज़ा खोलना है, चाहे अंदर कुछ भी हो।

"तुम दोनों आज यहीं रुक जाओ," मैंने कहा। "घर नहीं जाओगे। आज रात किसी से कुछ नहीं बोलना, और कल सुबह उस्ताद की दुकान।"

"उस्ताद तो हमें बोलते ही नहीं," मोहन ने कहा।

"वो बोलेंगे," मैंने कहा। "क्योंकि मैं इस बार सवाल नहीं पूछूँगा।"

रात नौ बजे के आसपास मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में गया। टिंकू बाहर बेंच पर लेट गया था, चादर ओढ़कर। गिरधारी और मोहन घर की तरफ़ चले गए, और मैंने देखा कि वो दोनों साथ-साथ चल रहे थे, पर बीच में एक फुट का फ़ासला था। फ़ासला अभी पूरा नहीं मिटा था। उसके लिए माफ़ी नहीं, वक़्त चाहिए।

मैंने कमरे का बल्ब जलाया। वो गुनगुनाता रहा, जैसे हमेशा करता है।

मैंने बैग को मेज़ पर रखा।

और मेरी जेब में घंटी ने फिर करवट ली।

"कुछ बोलना है?" मैंने पूछा।

"अभी नहीं," घंटी ने कहा।

"कब?"

"जब तुम उस गली में खड़े होगे," घंटी ने कहा, "तब।"

मैंने बैग के ऊपर हाथ रखा। चमड़ा ठंडा था। मेरी उँगलियाँ उसकी टूटी पट्टी पर रुक गईं।

और मुझे लगा जैसे किसी ने बहुत दूर, किसी और गली में, एक पुरानी साइकिल की घंटी बजाई हो।

इस बार दो बार।

जैसे कोई कह रहा हो — जल्दी कर।

॥

रात नौ बजे के आसपास मैंने कमरे का दरवाज़ा बंद कर दिया। बाहर टिंकू बेंच पर चादर ओढ़कर लेटा था और मुझे पता था कि वो सो नहीं रहा, बस आँखें बंद करके सुन रहा है। ये उसकी आदत है। जब कुछ बड़ा होने वाला होता है, तो वो सोने का नाटक करता है, ताकि कोई उसे हटा न दे।

मैंने बैग मेज़ पर रखा था। पुराना चमड़े का बैग। एक पट्टी टूटी हुई, दूसरी सिली हुई। बकसुआ पीतल का, पर इतना घिसा कि उस पर कुछ लिखा था या नहीं, पता ही नहीं चलता। बैग से एक गंध आ रही थी, पुराने काग़ज़ की और साथ में लौंग की। जैसे किसी अलमारी में सालों से कपड़ों के बीच लौंग रखी हो और वो अलमारी कभी खुली ही न हो।

मैंने उसकी पट्टी पकड़ी। मेरी उँगलियाँ रुक गईं।

तुम सोच रहे होगे कि इतनी सी चीज़ से क्या होगा, तो सुन लो। मैं साइकिल के पंचर ठीक करने वाला आदमी हूँ। मैंने सैकड़ों ट्यूबों में हवा भरी है, सैकड़ों बियरिंग के छर्रे जमाए हैं, और मुझे पता है कि किसी भी टूटी चीज़ को खोलते वक़्त सबसे ज़्यादा डर उस पहले पेंच में लगता है, जो आसानी से खुल जाए। क्योंकि तब लगता है कि अंदर कुछ ऐसा है जो बाहर आने के लिए बेसब्र बैठा था।

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