The Mysterious Bell – Chapter 36
बैग का बकसुआ खुला।
पहले कपड़ा निकला। मैंने उसे खोला। सफ़ेद, मोटा खादी का कपड़ा, जिस पर हल्के पीले दाग पड़ गए थे। उसे सूँघा तो साबुन और धूप की गंध आई, जैसे इसे धोकर किसी छत पर सुखाया गया हो और फिर कभी मोड़ा ही न गया हो।
कपड़े के नीचे एक काग़ज़ था। मोटा काग़ज़, जो किसी रजिस्टर से फाड़ा हुआ लग रहा था, क्योंकि एक किनारे पर लाल कपड़े की जिल्द का थोड़ा सा रेशा अभी भी चिपका था। उस पर उम्मीद से ज़्यादा साफ़ लिखाई थी। ऊपर कुछ नाम, नीचे तारीख़ें, और बीच में एक लाइन जो बार-बार आ रही थी। मैंने उसे पढ़ा और मेरा हाथ काँप गया।
वो लाइन थी — तीस दिन के अंदर।
मेरे हाथ में काग़ज़ था और मैं उसे दूसरी बार पढ़ रहा था। तीस दिन के अंदर। किस चीज़ के? किसका? किसके लिए?
काग़ज़ के नीचे एक चाबी थी। छोटी, जंग लगी, और उसके छल्ले में पुराने कपड़े का टुकड़ा बँधा था, जिस पर कोई अक्षर स्याही से लिखा था। स्याही फैल गई थी, इसलिए साफ़ नहीं दिख रहा था।
और उसके नीचे, सबसे नीचे, कपड़े में लिपटा हुआ पीतल का एक छोटा टुकड़ा था।
बस इतना सा। इतना छोटा कि हथेली में आ जाए और बंद कर दो तो पता भी न चले। उसका एक किनारा टूटा हुआ था, जैसे किसी चीज़ से ज़बरदस्ती तोड़ा गया हो।
मैं कुर्सी पर बैठ गया। मेरी जेब में घंटी थी। मैंने उसे बाहर निकाला और मेज़ पर रख दिया, उस पीतल के टुकड़े के ठीक सामने।
दोनों का रंग एक जैसा था।
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
घंटी चुप रही।
"मैंने पूछा, ये क्या है?"
"अभी नहीं," घंटी ने कहा। उसकी आवाज़ रोज़ से धीमी थी, जैसे बोलने में उसे भी तक़लीफ़ हो रही हो।
"तू हर बार अभी नहीं कहती है," मैंने कहा। "और मैं हर बार मान जाता हूँ। आज नहीं मानूँगा। बता, ये पीतल का टुकड़ा किसका है?"
"जब तुम उस गली में खड़े होगे," घंटी ने कहा, "तब।"
मैंने मुँह खोला कि कुछ कहूँ, फिर बंद कर दिया। ये उसकी आदत है। वो पूरा जवाब नहीं देती। वो सवाल के अंदर एक छोटा सा दरवाज़ा खोलती है और चुप हो जाती है, और मुझे उस दरवाज़े से खुद निकलना पड़ता है।
मैंने तीनों चीज़ें वापस बैग में रखीं। काग़ज़, चाबी, और पीतल का टुकड़ा। फिर बैग को लोहे की अलमारी में रखकर ताला लगा दिया। मेरे पास एक ही अलमारी है और उसका ताला भी ढीला है, पर आज उसकी आवाज़ भी मुझे किसी ताले जैसी लगी।
रात भर मैंने आँखों में आँखें डालकर छत को देखा। घंटी मेरे सिरहाने रखी थी और उसकी ठंडक तकिये तक पहुँच रही थी।
सुबह पहले पक्षी आए, फिर गली के पत्थरों पर पहली साइकिल की आवाज़ आई। मैं उठा, मुँह धोया, और कमरे से बाहर आया। टिंकू बेंच पर बैठा था, चादर कंधों पर लपेटे, बाल बिखरे हुए। उसके घुटने पर पट्टी खुल गई थी और वो उसे ध्यान से बाँध रहा था।
"उस्ताद," उसने कहा, "आज दुकान नहीं खुलेगी?"
"नहीं।"
"तो बोर्ड पर क्या लिखूँ?"
"लिख दे — आज काम से बाहर।"
वो उठा, टुकड़े का गत्ता उठाया और चॉक से लिखने लगा। फिर रुककर बोला, "उस्ताद, अगर कोई पूछे कि कब तक बाहर?"
"कह देना, जब तक अंदर न आ जाएँ।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो सवाल था जो वो पूछना चाहता था पर पूछ नहीं रहा था। मैंने उसके सिर पर हाथ रखा।
"आज तुम हमारे साथ नहीं चलोगे," मैंने कहा।
"क्यों?"
"क्योंकि आज वहाँ बड़े लोगों की बात है।"
"मैं बड़ा हो जाऊँगा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो बच्चों की आवाज़ में होती है जब उन्हें लगता है कि उन्हें सिर्फ़ उम्र की वजह से रोका जाता है।
"हो जाओगे," मैंने कहा। "पर आज नहीं। आज तुम यहाँ रहो और अगर कोई काग़ज़ वाला आदमी आए तो कहना कि मालिक शहर में है।"
"शहर में कहाँ?"
"कह देना, उसी तरफ़ जहाँ उनको जाना चाहिए," मैंने कहा। "बाकी तुम संभाल लोगे।"
उसका चेहरा चमक गया। बच्चों को ज़िम्मेदारी देने से बड़ी खुशी कोई नहीं होती। वो बोर्ड उठाकर बाहर की तरफ़ भागा।
साढ़े आठ बजे गिरधारी और मोहन आए। दोनों के कपड़े वही थे, बस गिरधारी ने कमीज़ बदल ली थी। उसके हाथ में वो टूटा पहिया फिर था। मैंने उसे लेने की कोशिश की तो उसने नहीं दिया।
"ये मेरे पास रहेगा," उसने कहा। "जब साइकिल मिलेगी, तब लगाएँगे।"
मोहन कुछ नहीं बोला। उसने सिर्फ़ मेरी तरफ़ देखा और आँखों से पूछा कि आज क्या होगा। मैंने कंधे उचकाए। मेरे पास जवाब नहीं था। मेरे पास सिर्फ़ एक पता था।
हम तीनों निकले। गली के मोड़ पर शबनम आपा की गुमटी से भाप उठ रही थी। उन्होंने हमें देखा और चिमटी हवा में उठाकर रोक दी।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "इधर आ।"
मैं गया।
"उस्ताद की दुकान पर जा रहे हो?"
"हाँ।"
"वो नहीं खोलेंगे," उन्होंने कहा, और ये उन्होंने इतने यक़ीन से कहा जैसे उन्होंने खुद उस ताले को पचास साल से पहरा दे रखा हो।
"तो मैं बैठ जाऊँगा," मैंने कहा।
वो एक पल मेरी तरफ़ देखती रहीं, फिर बोलीं, "बैठ जाना। पर मेरी एक बात याद रखना। उस्ताद के सामने बहुत मत बोलना। उनका मन आज भी उसी दिन पर अटका हुआ है। जो आदमी पचास साल से एक दिन में खड़ा हो, उसे आज के दिन की ज़रूरत नहीं होती। उसे बस एक ऐसा आदमी चाहिए जो उसके साथ चुप खड़ा रहे।"
मैंने सिर हिलाया। उन्होंने मुझे चाय का गिलास थमा दिया, बिना पूछे।
"पैसे?" मैंने पूछा।
"आज नहीं," उन्होंने कहा। "आज का हिसाब बाद में।"
पीछे की गली में जाने के लिए बिजलीघर से पहले मुड़ना पड़ता है। वो गली और भी पुरानी है। वहाँ सुबह भी देर से आती है, क्योंकि दोनों तरफ़ की इमारतें ऊँची हैं और उनके बीच आसमान सिर्फ़ एक पतली पट्टी की तरह दिखता है। फ़र्श पर पत्थर की पट्टियाँ हैं, जिनके बीच से घास निकली हुई है। एक तरफ़ पुराने रंगने की दुकान है, जहाँ से नीले और लाल रंग की बदबू आती है। दूसरी तरफ़ मिट्टी के बर्तन रखने की जगह है, जहाँ आज सिर्फ़ टूटे घड़े पड़े हैं।
उस्ताद की पुरानी दुकान इसी गली के आख़िर में है। लकड़ी का दरवाज़ा, जिसका रंग उतर चुका है। सामने एक ऊँची सीढ़ी, जिसकी दो सीढ़ियाँ टूटी हैं और उनकी जगह ईंट रखी हुई है। और दरवाज़े से अंदर जाकर बाएँ हाथ पर एक और दरवाज़ा है, नीला, जिसका रंग नीचे से उतर गया है और ऊपर से नहीं। उस पर ज़ंग लगा ताला लटका था।
दुकान खुली थी।
मैं रुक गया। मेरे पीछे गिरधारी भी रुक गया। टिक-टिक की आवाज़ आ रही थी। सिलाई मशीन की आवाज़।
मैंने अंदर झाँका।
उस्ताद अली बक्श सिलाई मशीन पर झुके बैठे थे। उनके हाथ में कपड़ा था, पर वो सिलाई नहीं कर रहे थे। सुई ऊपर-नीचे हो रही थी और कपड़ा वहीं रुका हुआ था। उन्होंने मुझे देखा और सुई रुक गई। कमरा एक झटके में चुप हो गया, इतना चुप कि दूर किसी छत पर कबूतर के पंखों की आवाज़ आई।
"आ गए," उन्होंने कहा। ये सवाल नहीं था।
"आ गए," मैंने कहा।
वो उठे। उनकी कमर इतनी झुकी हुई थी कि उठने में उन्हें दो बार रुकना पड़ा। उन्होंने चश्मा उतारा, कपड़े से पोंछा और फिर से लगा लिया। मुझे लगा कि वो शायद इसी बहाने अपने वक़्त को दो हिस्सों में बाँट रहे हैं — उस वक़्त में जब दरवाज़ा बंद था, और उस वक़्त में जब खुलेगा।
"मैंने शबनम से कहा था कि तुम्हें सब बता दूँ," उन्होंने कहा। "पर वो औरत किसी की बात सुनती कहाँ है।"
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