The Mysterious Bell – Chapter 343
"साहब ने कहा है," मनोज ने धीरे से कहा, "कि पीछे की ज़मीन पर कल से अपना बोर्ड लगेगा।"
"कल से?" मैंने कहा। "कल से पहले तो कुछ नहीं, मनोज भाई। कल सुबह दस बजे की सभा है। कल शाम चार बजे का बुलावा है। कल फार्मेसी की परची है। कल सब कुछ है।"
"तभी तो," उसने कहा, "आज रात हमने काम शुरू कर दिया।"
और वो मुड़ गया और मज़दूरों से कुछ कहने लगा, बिल्कुल सीधा, जैसे मैं वहाँ खड़ा ही न होऊँ।
मैं वहीं खड़ा रहा। दीवार से चादरें गिर रही थीं। धूल मेरे मुँह में जा रही थी। पीछे कहीं माँ का कमरा था, जिसमें उनकी साँस अभी-अभी थोड़ी आसान हुई थी, और यहाँ दीवार गिर रही थी।
तभी मेरी जेब में घंटी हिली।
एक बार।
और उसकी आवाज़ साफ़ थी — पिछले कुछ दिनों से ज़्यादा साफ़, जैसे उसने भी रात भर आँख नहीं बंद की हो।
"दीवार नहीं गिर रही," उसने कहा। "नींव दिख रही है।"
मैंने आँखें सिकोड़कर देखा। चादरें गिरने के बाद दीवार का जो हिस्सा खुल रहा था, उस पर पुराना पलस्तर नहीं था। वहाँ ईंटों के बीच कुछ और था — कुछ ऐसा जो मिट्टी से बाहर आ रहा था, जैसे दीवार के अंदर कोई चीज़ सालों से बंद बैठी हो।
और मैं वहीं खड़ा सोचने लगा — कि पच्चीस साल पहले इस अस्पताल की नींव किसने रखी थी, और उस नींव में दादा जगदीश यादव का क्या रखा हुआ है।
॥
जो चीज़ दीवार के अंदर से बाहर आ रही थी, वो पत्थर नहीं थी। वो लोहे के रंग की थी, मोटी, और उस पर चारों तरफ़ पुराने पलस्तर की सफ़ेद परत चिपकी हुई थी, जैसे किसी ने उसे जान-बूझकर दीवार में चुनकर ऊपर से मिट्टी और चूना पोत दिया हो।
मैं आगे बढ़ा, पर मनोज ने हाथ उठाया।
"अंकुश भाई, यहाँ मत आइए। मज़दूर काम कर रहे हैं।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा, फिर उस चीज़ की तरफ़, जो धूल और पलस्तर के बीच से धीरे-धीरे बाहर निकल रही थी।
"मनोज भाई," मैंने कहा, "ये दीवार है, कोई अलमारी नहीं कि अंदर से सामान निकलेगा।"
वो हँसा। "साहब का काम है, भाई। जो काग़ज़ पर चलता है, वही दीवार पर चलता है।"
"काग़ज़ पर क्या लिखा है?"
"जो लिखा है, वो काग़ज़ में ही अच्छा लगता है," उसने कहा। "आप कल सुबह दस बजे की सभा में देख लीजिएगा।"
उसने बंडल से एक और पन्ना निकाला और मज़दूरों को दिखाने लगा। मैं खड़ा रहा। चादरें गिरना बंद हो गई थीं, पर मज़दूर अब हथौड़े से ईंटें खटखटा रहे थे, एक-एक करके, जैसे कोई पुरानी किताब के पन्ने पलट रहा हो।
मैं उल्टा मुड़ा और अस्पताल के अंदर भागा।
नीचे वाले कमरे में माँ पलंग पर थीं। काजल उनके पास बैठी थी और उनकी कलाई पकड़े हुए थी, जैसे किसी चीज़ को जाने से रोक रही हो। पापा दरवाज़े के पास खड़े थे। उनके हाथ में वही पेचकस था, जो उन्होंने कल गुमटी पर ज़मीन पर रखा था, पर आज सुबह फिर उठा लिया था, जैसे हाथ को कुछ पकड़े रहने की आदत हो।
"क्या हुआ?" काजल ने पूछा। "तुम्हारा चेहरा कैसा है।"
"दीवार," मैंने कहा। "पीछे वाली दीवार उखाड़ रहे हैं। और उसमें से कुछ निकल रहा है।"
माँ ने आँखें खोलीं। उनकी आवाज़ रात से थोड़ी बेहतर थी, पर साँस के बीच में अभी भी वो रुकावट बची हुई थी, जैसे पानी की नली में कोई पत्थर फँसा हो।
"क्या निकल रहा है?"
"पता नहीं," मैंने कहा। "पर वो दीवार का हिस्सा नहीं लगता।"
पापा ने पेचकस जेब में रखा और बिना कुछ बोले बाहर चले गए। उनकी चप्पलों की आवाज़ गलियारे में गूँजती रही।
माँ ने मेरी तरफ़ देखा और हल्के से हाथ बढ़ाया। मैंने उनका हाथ पकड़ा।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "मैं जानती हूँ कि तुम सोच क्या रहे हो।"
"क्या सोच रहा हूँ?"
"कि ये सब मेरी वजह से हो रहा है। कि मैं यहाँ पड़ी हूँ, इसलिए तुम हार मानने की सोच रहे हो।"
मैंने कुछ नहीं कहा। क्योंकि वो सच कह रही थीं। उस वक़्त मेरे दिमाग़ में एक ही बात चल रही थी — अगर मैंने काग़ज़ पर उनका नाम लिखवा दिया, तो शायद सब कुछ ठीक हो जाए। शायद।
"तो सुन लो," उन्होंने कहा। "मेरे यहाँ दाल में पानी नहीं मिलता, और बात में भी नहीं। मैं ठीक हो जाऊँगी। या नहीं होऊँगी। पर तुम उस आदमी के काग़ज़ पर अंगूठा नहीं लगाओगे।"
"माँ —"
"तुम्हारे पापा ने लगाया था," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ काँपी, "और देखो, वो अब तक उस अंगूठे को पीठ पर ढो रहे हैं। मैं नहीं चाहती कि तुम भी पच्चीस साल तक कोई चीज़ ढोते रहो।"
मैंने हाथ पकड़े रखा। मेरी आँखें जल रही थीं, पर मैंने उन्हें जाने नहीं दिया।
"ठीक है," मैंने कहा। "पर एक बात माननी पड़ेगी।"
"क्या?"
"आज आप अस्पताल के बाहर नहीं जाएँगी। जो होगा, यहीं होगा।"
वो हँसीं, छोटी सी हँसी, जो खाँसी में बदल गई। काजल ने उनका सिर सहलाया और उनके माथे पर पानी की पट्टी रखी।
मैं बाहर आया। अस्पताल का गेट खुला था, और गली से लोग आ रहे थे। पहले दो, फिर पाँच, फिर दस। कोई सिर पर गमछा डाले, कोई हाथ में लाठी, कोई बस देखने आया था। शबनम आपा के हाथ में उसकी लोहे की चिमटी थी, और उसके पीछे पूरी गुमटी खाली छूटी हुई थी।
उस्ताद अली बक्श अपने मोटे चश्मे के साथ आए, आँखें झुकी हुईं, पर जब उन्होंने पीछे के प्लॉट की तरफ़ देखा, तो उनके होंठ सिकुड़ गए। उनके पीछे इलियास था, हाथ में वही काली थैली, जो उसने कल गुमटी पर मुझे दी थी।
दुबे अंकल अपनी कुर्सी से उठकर आए थे। उन्होंने पहले प्लॉट की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़, फिर कुछ नहीं बोले, बस एक कोने में खड़े हो गए, जैसे वो अभी फैसला सुना रहे हों।
टिंकू सबसे पहले पहुँचा था। उसके घुटने पर पट्टी के ऊपर आज धूल की एक नई परत चढ़ी थी। वो सीधा मेरे पास आया और बिना कुछ पूछे बोला —
"उस्ताद, दीवार में कोई चीज़ है। आपने देखी?"
"देखी," मैंने कहा।
"क्या है?"
"पता नहीं," मैंने कहा। "पर लगता है पच्चीस साल से किसी का इंतज़ार कर रही थी।"
गली के लोग इकट्ठे होते गए। कोई गुस्से में था। कोई डरा हुआ था। कोई सिर्फ़ देखने आया था, जैसे मेले में कुछ नया लगा हो।
मैं सीढ़ी पर चढ़कर खड़ा हो गया, जहाँ से पूरा गेट दिख रहा था। मेरे नीचे लगभग पूरी गली थी — किराने वाला बूढ़ा काका, रेडियो वाला बूढ़ा, चूड़ी वाली बाई, साइकिल पुर्ज़ों वाला भाई, भोला भाई अपनी बीवी की बैसाखी पकड़े हुए, रमेश भाई, नसीम भाई, और बहुत सारे चेहरे जिनके नाम मुझे पता थे पर जिनसे मैंने कभी ठीक से बात नहीं की थी।
"सुनो," मैंने कहा। मेरी आवाज़ तेज़ थी, और साफ़। "मैं ज़्यादा नहीं बोलूँगा। पर जो बोलूँगा, वो सच है।"
कुछ लोग चुप हो गए। कुछ नहीं हुए।
"रणवीर के नक़्शे में सिर्फ़ ये अस्पताल नहीं है," मैंने कहा। "उसमें साइकिल गली है। बाज़ार है। पीछे की झुग्गी है। स्कूल है। पुराना बिजलीघर है। सब एक ही शीट पर हैं।"
मैंने रुककर सबको देखा।
"और उसी शीट पर मेरे पापा का अंगूठा है।"
एक आवाज़ उठी, किसी औरत की। "तो अब क्या होगा?"
"अभी कुछ नहीं," मैंने कहा। "क्योंकि अभी कोई काग़ज़ साबित नहीं है। अभी सिर्फ़ एक अंगूठा है, और एक आदमी जो उसे साबित करने की कोशिश करेगा।"
"तो साबित हो जाए तो?"
"तो," मैंने कहा, "गली उसकी हो जाएगी। ये अस्पताल उसका हो जाएगा। ये दुकानें उसकी हो जाएँगी। और हम सब, हम सब उसकी ज़मीन पर किरायेदार बन जाएँगे।"
पीछे से कुछ लोग हिले। कोई बुदबुदाया। कोई पीछे हटा।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno